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न ख़बर हैं, न गब्बर (विलेन) हैं, शायर हैं निदा फाजली!

16 January 2013 No Comment

बेबाक : खंजर ना बने खबर

– दुष्‍यंत

निदा फाजली को जिस दिन देश का बडा स्‍तम्‍भकार हमारे समय का कबीर बता रहा था, उसके अगले दिन इंटरनेट और टीवी पर एक विवादास्‍पद बयान के लिए उन्‍ही निदा को खबर बनाया जा रहा था। कबीर को भी उनके समय में कम ही लोगों ने समझा था, तो क्‍या निदा को भी कम ही लोग समझते हैं।

‘पाखी’ दिल्‍ली से प्रकाशित चर्चित मासिक साहित्यिक पत्रिका है, प्रेम भारद्वाज उसके संपादक है, पिछले सालों में कई शानदार अंकों के जरिए उन्‍होंने ‘पाखी’ की पहचान खडी की है। उन्‍होने मशहूर कथाकार ज्ञानरंजन पर अपने विशेषांक में उनकी तुलना अमिताभ के एंग्री यंगमैन से कर दी जिस पर निदा फाजली ने टिप्‍पणी करते हुए पत्र लिखा कि एंग्रीयंगमैन की छवि सलीम जावेद की कलम से निकली है, पर हमने सलीम जावेद को भुला दिया। उसी तरह कसाब हाफिज सईद के दिमाग की उपज है। कसाब को फांसी दे दी गई पर सईद आजाद घूम रहा है। निदा के उस पत्र की स्‍कैन्‍ड प्रति पाखी के ब्‍लॉग पर संपादक प्रेम भारद्वाज की टिप्‍पणी के साथ उपलब्‍ध है। पर बदकिस्‍मती ये कि मेरे हमपेशा कुछ जाहिल दोस्‍तों ने इसका सरलीकरण करते हुए मान लिया कि निदा ने अमिताभ की तुलना कसाब से कर दी है। उन दोस्‍तों के लिए अकसर कहा जाता है, आज भी दोहरा देने की इजाजत दीजिए कि निदा साहब! ‘इन्‍हें माफ कर दीजिए, वे नहीं जानते कि क्‍या कह रहे हैं।’

सवाल ये बडे हैं, सदियों से खडे है, आईने में जडे हैं, इनके लिए सुकरात, कबीर और निदा लडे हैं। और लडाई अभी लंबी चलेगी, यकीन मानिए, मीडिया के महारथियों और शब्‍दों के शिवों के बीच दूरियां अनंत हो गई हैं। उनके दरम्‍यां आवाजाहियां खत्‍म सी हो गई हैं। और यह नितांत निर्मम और क्रूर सा समय है, जब हमने यानी इक्‍कीसवीं सदी के समाज ने एक दूसरे को समझने बात करने की बजाय किनारा करने, हदबंदियां करने और मोर्चा खोलने की आदत डाल ली है। गांव शहर की गलियां सरहदों में तब्‍दील हो रही हैं, और मिसाइलें सब ने तान रखी हैं। अपना भी अपना नहीं, पराया अपना होगा नहीं। हम वो सुन लेते हैं, जो किसी ने कहा ही नहीं।

तुरंत निर्णयात्‍मक हो जाना हमने खूबी की तरह अपना लिया है, यह तेज कदम चलने के लिए बिना देखे सोचे चलने जाने जैसा है। रास्‍ता छोटा हो, चाहे उसके लिए हमें कुछ भी करना पडे, गिरना पडे, मरना पडे। बहरहाल, निदा फाजली का बयान कसाब को रचने वाले सईद के जिंदा रहने पर सवाल खडा करता है। अमिताभ की नहीं एंग्री यंगमैन की छवि की बात करता है, उस छवि के निर्माताओं को भूलने की शिकायत दर्ज करता है, उन्‍‍हें यानी सलीम जावेद को याद रखने की अहमियत स्‍थापित करता है। जो इसे अमिताभ और कसाब की तुलना मान ले उस पर और उसकी समझ पर हमें दया आनी चाहिए। यहां मुझे आनंद प्रधान के हवाले से एक बात साझा करनी है कि एक अमेरिकी अखबार के मालिक को क्‍यूबा से रिपोर्टर ने तार भेजा- ‘यहां युद्ध की कोई संभावना नहीं है’ तो मालिक ने जवाब लिखा- ‘तुम तस्‍वीरें भेजो, युद्ध मैं करवा दूंगा।’ महोदय, यह बात 1897 की है, और हम 2013 में दाखिल हुए हैं। इसके बडे गहरे अर्थ हैं पर बिलकुल जाहिर हैं।

इतिहास के पन्‍ने गवाह हैं कि रचनात्‍मक और विचारशील व्‍यक्ति अकसर अपने समय में ना समझे जाने का दंश भोगता है। सत्‍ताएं चाहें वे किसी भी तरह की हों, राजनीतिक हों, आर्थिक हों, सामाजिक हों, उन्‍हें सब कुछ अपने अनुसार चाहिए, जो उनके अनुसार नहीं वह बागी है, विद्रोही है, अपराधी है। उनकी आंखों से दिखने वाला और उनके दिमागों में चमकने वाला खयाल ही दुरूस्‍त खयाल होता है। लंबी फेहरिस्‍त है, जिन्‍हें उनके रहते समझा नहीं गया, और यह और लंबी होती जा रही है जब हमारे उत्‍तरआधुनिकतावादी समय में भी कुछ लोगों को नहीं समझा जा रहा, आने पाली पीढियां हमें माफ कर सकेंगी क्‍या ! बहुत बडा और निहायत वाजिब सा सवाल है। मुझे याद दिलाना जरूरी लग रहा है कि पश्चिम में एक दार्शनिक है स्‍लावेज जिजेक, उन्‍हें हमारे समय का सबसे खतरनाक दार्शनिक माना जाता है।

उदार लोकतंत्र के पतन पर उनकी 400 पेज की ताजा किताब ‘लिविंग इन द एंड टाइम्‍स’ ने पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका की नींदें हराम कर दी हैं,यह भी नासमझी का मामला है, तर्क से भागना है। वैसे भी कहा जाता है कि किसी भी विचार का वह स्‍वीकार ज्‍यादा स्‍थाई होता है जब उसे दिल और दिमाग दोनों से स्‍वीकार करें। यानी नासमझी या भावुक प्रतिकार तर्क से भागना है। हम लाख्‍ा कहें और मानें कि ऐसे समय में जी रहे हैं जब कई शताब्दियां एक साथ दुनिया के अलग अलग इलाकों में सांस ले रही हैं, हमें यह भी मानना चाहिए कि तकनीक के चरम, विज्ञान की पराकाष्‍ठा और भौतिकता के धर्म बनने का समय है तो हमें तर्क को मानना ही पडेगा। वैसे, निदा साहब के बयान का मसला केवल नासमझी भर नहीं है, सनसनी से अपने मीडिया प्रॉडक्‍ट की बिक्री बढाने की मंशा का मामला भी है। क्‍या इस बात पर शर्म करना काफी है कि इस तरह तो टीआरपी और बिक्री की यह अंधी दौड वाकई भयावह होती जाएगी।


लेखक जयपुर में रहते हैं। चर्चित संपादक-पत्रकार हैं। फ़िल्मों से भी अच्छा राब्ता है। कई इनाम-इकराम मिले हैं। खरी-खरी कहते-सुनते-पढ़ते हैं। इतिहास में अच्छी रुचि। ज्यादा ब्योरे के लिए यहां जाएं.

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