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अलविदा – सुनील दा : कस्तूरी की महक के कुछ पल!

23 October 2012 No Comment

दुष्यंत

बंगाली के अत्यंत सुकोमल कवि और सबसे ज्यादा पठित कथाकारों में से एक सुनील दा का आज जाना क्या मायने रखता है, इसका ठीक-ठीक मूल्यांकन होने में समय लगेगा। सुनील गंगोपाध्याय से बस एक मुलाकात रही मेरी। वे दिल्ली के सर्दी के दुर्लभ धूपीले दिन थे। तब वे साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष भी नहीं हुए थे। कल्पनालोक में विचरण करते हुए बंगाली मेधा के बावले से प्रेमी युवक के रूप में उनसे मिलना एक ख्वाब सा था। कुछ क्षण ही रहे होंगे जब उनका सामीप्य मेरे जीवनानुभवों में शामिल होकर विराट बन गया था। उनकी कहानियों के अनुवाद पढे थे, कुछ बंगाली कविताओं को अनुवाद के साथ सुना था।

अभिजात्य दंभ से भरी फिरोजशाह रोड का वह सौम्य सा किनारा- रवींद्र भवन। उन्हें सहेजे हुए जब साहित्य अकादमी सभागार में उनके एक पाठ में पहुंच गया था और पाठोपरांत चाय के वक्त मिलने का अवसर भी पा लिया था। जिस जगह वे खडे थे, एक आभामंडल महसूस किया मैंने और उसी के प्रभाव में उन्हें किसी से बात करते हुए सुनता रहा। अंग्रेजी और बंगाली लहजे की हिंदी बहुत प्यार बोलते थे वे, सुना था उनके बारे में, इस समय भी यही हो रहा था। मुझे लगता है कि पिछले सालों में उनकी सक्रियता बढी, बंगाल से बाहर ख्याति भी, पर व्यक्तित्व का वह रूप वही रहा। उत्साही युवा की तरह मिला और उन्होंने संरक्षक भाव में मुझे लगभग गले सा लगा लिया, ‘ अच्छा बिज्जी के राजस्थान से हो, मिलते हो कभी उनसे?’

मैंने कहा कि नहीं, तो नाराजगी से बोले- ‘कुछ तो शेम आना चाहिए तुमको’। फिर पुचकार भी दिया, ‘इस बार उधर जाओ तो जरूर मिलना। तुम लोग अपने ही हीरे की कदर नहीं करते’। तो मैंने जवाब दिया – ‘दादा! जीवन में पहले कथाकार वही हैं जिन्हें मेरे पिता ने पढकर सुनाया। फिर उनके लेखन को लेकर कुछ बात हुई, फिर उन्होंने पूछा-‘ तुम्हारा औरा बताता है कि तुम लिखते हो, लिखते रहो।’ एक नौसिखिए को तो इतना कहा जाना भी बहुत था, किसी इनाम की तरह।

जब मेरी कविताओं की पहली किताब आई तो उन्हें भिजवाई, फोन आया-” खूब भालो, खूब भालो” कहते हुए आशीर्वाद देते रहे। शायद यही मेरी पूंजी है अब। मुझसे पूछा कि बंगाली कवियों में मेरे सिवा किसे पढा या पसंद करते हो। मैं कहा- ‘दादा बडे चतुर हो ! अपने नाम को छोडकर!’ कहते हुए मैंने टैगोर, जीवनांनद दास और बिनॉय मजूमदार के नाम ले लिए। फिर उन्होंने कई कवियों के बारे में बताया, सही मायनों में आधुनिक कई बंगाली कवियों से परिचय करवाया। दक्षिण कोलकाता के उनके घर जाकर दूसरी मुलाकात का संयोग नहीं हुआ, जिसकी योजना बंगाली कथाकार मित्र सोमा बंदोपाध्याय ने बनाई थी, पर पूरी ना हो सकी। जीवन में मनचाहा सब कब होता हैं पर कस्तूरी की महक कुछ क्षण भी बहुत होती है। उनका वह साथ ऐसा ही था। अपनी टूटी फूटी बांग्ला में उन्हें विदा देते हुए कहूं तो – ”खूब भालो जीबोन! दादा ! ”

दुष्यंत।हिंदी-राजस्थानी के बहुचर्चित कवि-कथाकार और उपन्यासकार। ओजस्वी वक्ता और शानदार इंसान। सिनेमा और पत्रकारिता में गहन रुचि और कामधाम। श्रीगंगानगर में जन्म और फिलहाल, जयपुर में बसेरा। कविताकोश सम्मान समेत कई अलंकरणों से अभिनंदित।

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