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कहानी / छुट्टन मियां फूल वाले

20 September 2012 2 Comments

-दुष्यन्त

“5 नम्बर वाले कपूर की लड़की आजकल छत पर कुछ ज्यादा ही रहती है। (मैं उनकी दूरदृष्टि से हतप्रभ और प्रभावित था, अक्सर होता हूं ) कमला नगर का एक लौंडा अपनी फटफटिया से घर के चक्कर काटता है….., बस मामला पटरी पे है, समझो मियां।´´

“बाअदब बामुलाहिजा होशियार! छुट्टन मियां तशरीफ ला रहे हैं।´´ आधी सही, आधी गलत उर्दू में यह जुमला न सिर्फ छुट्टन मियां का फेवरेट था, बल्कि मुहल्ले के सारे लोग भी छुट्टन मियां की याद आये या वो खुद हाजिर हो जायें (या यू कहें टपक जायें) तो दोहराते थे और वाकई बड़े ही खुलूसोमुहब्बत के साथ।

तो हुजूर! छुट्टन मियां फूलवाले इस मुहल्ले के पिछले 25 बरस से बाशिन्दे थे। पहले वो कहां थे? सवाल पैदा होता है, माने खड़ा होता है, मुहल्ले का बच्चा-बच्चा (बुजुर्ग भी, पर क्या करें मुहावरे में यूं ही कहा जाता है) जानता था, क्योंकि वो खुद इस बात को खुदा जाने कितनी बार दुहरा चुके थे। उनके लफ्जों में “हमारे पुरखे मुगलिया सल्तनत के जमाने के बादशाहों को फूल माने गुलाब, गेंदा, चमेली, गुलमोहर, मोगरा, वगैरह-वगैरह। (उनकी लिस्ट कई देर तक चलती, जितने फूलों के नाम उन्हें पता थे।) जनाब! यूं कहिये कि हमारे फूल दीवाने-आम-ओ-खास, हरम-ओ-दरबार की जीनत थे, फिर अंग्रेज आये और हमारी बर्बादी आई उनके साथ। अब ना वो कद्रदान रहे और ना हमारी वो इज्जत, शान-ओ-शौकत…। फिर लखनऊ, कभी हैदराबाद, कभी यहां तो कभी वहां और न जाने कहां-कहां शाम के आखरी चरागों की मानिंद जलते रहे, टिमटिमाते रहे…..।´´ उनके लफ्ज बासी मुहावरे जैसे होते हुए भी पुरअसर होते, वैसे भी उन्हें अपने कहन के अंदाज और लफ्जों की फिक्र क्यों हो भला!

वो अपनी तवारीख को कुछ यू बयां करते थे जैसे ये छुट्टन मियां के पुरखों की तवारीख न हो, गोया किसी बादशाह की ताजपोशी से लेकर जम्हूरियत आने से शान-ओ-शौकत के दफ्न होने की दास्तां हो या कि शेरशाह या हुमायूं बादशाह का किस्सा।

उनके इस किस्से की इब्तदा जिस कसक के साथ होती थी, इंतिहा उसी शिद्दत से इक उम्मीद के हमकदम कि – “मियां, देखना हमारा वक्त फिर आयेगा, पाचों उंगलियां, एक-सी थोड़ी ना होती हैं, दिन फिरेंगे, देख लियो, हम कह रहे हैं, लिख लो कागज पर।´´

छुट्टन मियां जब भी मेरे घर पूजा की खातिर फूल देने आते तो कहते “तुम ठहरे शायर और किस्सागोई करने-कहने वाले। हम जानते हैं – तुमसे और तुम्हारे फन से दुनिया वाकिफ हैं।´´ अपनी तारीफ भला किसे पसन्द नहीं होती, हमें लगा हमारे फन के सच्चे कद्रदान-ओ-तनकीद निगार तो यहां छुपे बैठे हैं और हम हैं कि यहां-वहां चराग लेकर खोजते फिरते हैं। यानी मुहावरे में कहें तो `जिसको ढूंढ़ा गली-गली, वो मिला पिछवाड़े की गली।´ इतने में उन्होंने हमें ख्वाब की दुनिया से बुलाया, बुलाया क्या सरकार! झकझोर कर वहां से `किडनैप´ कर लाये। “कहां खो गये भई! जब किसी शेर की एक लाइन लिखते हो तो उम्मीद होती है ना दूसरी भी बन जायेगी, लिख मारोगे।´´ बात तो उनकी सही थी और मैंने हां भी भर दी क्योंकि मैं उन्हें अपना सच्चा कद्रदान मान चुका था, पर उन्हें ये कैसे बताऊं कि शेर में लाईन नहीं `मिसरा´ होता है और वो लिक्खा या बनता नहीं, कहा जाता है खैर, जाने भी दीजिये। क्या रक्खा है इन वाहियात किस्म की बातों में।

तो सरकार! हम कहां थे? हां तो हम छुट्टन मियां की बात कर रहे थे, हमारे मुहल्ले के फूल वाले छुट्टन मियां, चार बच्चों के बाप जिनमें से नरगिस, आरिफ और सलमा तो तकरीबन 20, 15 और 12 बरस के होंगे, सब से बड़ी बेटी नगमा की शादी किये सात-आठ बरस हो चुके हैं। खुद की उम्र कोई चौवन पचपन बरस, ज्यापदा से ज्यानदा। रंग सांवला, पुराने मॉडल का बड़े फ्रेम वाला नजर का चश्मा और सिर पर फैज टोपी। गोया आला दर्जे के रोमानी और मुहल्ले भर की हर अच्छी-बुरी, खुशी-गमी की खबर रखने वाले। मुहल्ले वाले तो उन्हें `छुट्टन समाचार´ या `छुट्टन न्यूज नेटवर्क´ यानी लोकल सी.एन.एन. तक कह डालते थे और ये बात उन्हें खुद भी मालूम थी, तुर्रा ये कि अव़्वल तनकीद निगार याने समीक्षक। तनकीद निगार इसलिये कि वो खुद को अब भी मुगलिया वहम में उर्दूदां समझते हैं, कहलवाना भी पसंद करते हैं। ये दीगर बात है कि ये मोहतरम ज और ज़, ग और ग़ में, क और क़ का फर्क मानते हैं, पर जानते नहीं और ये भी शायद उन्हें मालूम नहीं कि मुगल अपने साथ उर्दू नहीं तुकी जबान लाये थे। मैं उनके वहम को बने रहने का स्पेस दे देता हूं, ना टोक कर, बिना स्वार्थ ये कर ही जाता हूं मैं।

मुझे याद पड़ता है, इसी साल जुलाई के महीने में किसी सुबह की बात है, कॉलेज जाने के व़क्त में घण्टा भर था, पर अभी नहाना बाकी था। शैंपू कल ही खत्म हुआ था, किराने की दुकान से शैंपू लाने के लिए जीने से उतरा ही था कि `बाअदब बामुलाहिजा, होशियार! छुट्टन मियां तशरीफ ला रहे हैं।´

“अस्लामवालिकुम, छुट्टन मियां और सुनाओ! सब खैरियत से है?´´ मैंने सवाल भी दाग दिया।

“वालिकुमअस्लाम, सब दुआ है आप लोगों की और रहमत उस परवरदिगार की।´´ स्टीरियो टाइप लहजे में छुट्टन मियां का बेहद नपा-तुला सा जवाब।

“खैर! मुहल्ले की सुना दो, कुछ नई-ताजी!´´ मैंने सब्जी मंडी से सब्जी के रेट पूछ डाले या फिर सेंसेक्स का अप डाउन पूछ डाला। बस फिर क्या था, गोया छुट्टन मियां के फेवरिट मुद्दे पर उनसे रिपोर्ट मांगी गई थी और तनकीद उनका शौकिया शगल था ही बरसों से।

“जनाब! क्या-क्या बतायें? क्या-क्या हो रहा है?´´ थोड़े चटखारे लेते हुए छुट्टन मियां बनारसी पान की पीक थूकते हुए बोले, हमें अंदाज हो गया कि फेहरिस्त लम्बी है। हम कुछ कहते इससे पहले ही 20-22 बरस का एक लौंडा (ये छुट्टन मियां का फेवरेट शब्द है, इसलिए साभार इस्तेमाल कर रहा हूं, बिना उनकी इजाजत के) जो पास में खड़ा था, दो तथाकथित विद्वान बुजुर्गों की बातचीत के बीच में आ टपका और बोला “छुट्टन चचा! किस-किस का इश्क चल रहा है अगल-बगल, जरा बताओ ना, मैं भी तो बाखबर रहूं ।´ हमें बड़ी हैरानी हुई कोई `चचा´ कहे इतने अदब के साथ और ऐसा सवाल भी करे, खैर मूकदर्शक बने हम प्रतिक्रिया को उत्सुक थे। छुट्टन मियां की बांछें खिल गईं, वे भूल गये कि वो गोया मुझसे मुखातिब थे।

“अरे भई! इश्क और मुश्क तो वैसे भी छुपाये नहीं छुपते और उस पर तुर्रा ये कि हमारी बुढ़ाती आंखों से तो बिल्कुल भी नहीं।´´

“अरे, छुट्टन मियां। अभी आप कहां बुढ़ा रहे हो, अभी तो जवान हो, क्या हुआ जो दो चार बाल कलम में सफेद हो गये तो।´´ मैंने अनायास कह कर मानों उन्हें अपना हमउम्र बना लिया, ये जानते हुए भी कि बालों में उनका खिजाबी रंग साफ जाहिर होता है और वे फ्री-फ्लो दांडी नमक की तरह बहने लगे।
“5 नम्बर वाले कपूर की लड़की आजकल छत पर कुछ ज्याहदा ही रहती है। (मैं उनकी दूरदृष्टि से हतप्रभ और प्रभावित था, अक्सर होता हूं ) कमला नगर का एक लौंडा अपनी फटफटिया से घर के चक्कर काटता है….., बस मामला पटरी पे है, समझो मियां।´´
वो थोड़ा-सा रूक कर बोले –
“वैसे लड़का दिखता ठीक है और खाते-पीते घर का भी लगता है। इश्क फिर कहां बुरी बात है जनाब?´

वे फिर थोड़ा-सा रूककर चश्मे को ऊपर खिसकाते और टोपी को ठीक से अपनी जगह बिठाकर पीक थूकते हुए बोले। ये उनका तनकीद का सबसे `आइडियल पोज´ था। मुझे लगा ये रिपोर्ट तो अब लंबी खिंचेगी। लिहाजा यह कहते हुए – “छुट्टन मियां आज बस यहीं तक! कॉलेज खुल गये हैं और नया प्रिंसिपल भी कड़क है, 10 बजे फर्स्टड ईयर की क्लास लेनी है, इजाजत चाहूंगा, खुदा हाफिज।´´ कहते हुए मैंने उनके जवाब का इंतजार किये बिना ही विदा ले ली। हालांकि मुझे अच्छी। तरह से यह मालूम था कि `फर्स्टत इयर´ के स्टूडेन्ट्स कहां पहला पीरियड लेते हैं। नया-नया कॉलेज का चस्का होता है, मगर हमें तो अपनी हाजरी बजानी पड़ती है, हुजूर!….. और इतना तफ्सील से मुहल्ले का इश्कनामा सुनना मुझे जरा नागवार ही गुजरा था। कमाल देखिये कि वो लड़का बड़े ही इत्मीनान से छुट्टन मियां से तफ्सील का मजा ले रहा था।

वैसे मैं उनकी इस बात का कायल था, था क्या, आज भी हूं कि आजादी के वक्त उनके वालिद ने हिन्दुस्तान की सरजमीन को नहीं छोड़ा और यह सब बकौल उनके `किसी डर या शक-शुब्हे के बिना अपनी जमीन से बेपनाह मुहब्बत की वजह से था।´ वो बताते हैं कि “मैं उस वक्त तीन-चार साल का रहा होऊंगा, वालिद यहीं फूलों का काम करते थे। वालिद के छोटे भाई यानी हमारे चचाजान करीम हमारे दादा के बेहद लाडले थे, दादा ने उन्हें पढ़ने के लिए अलीगढ़ भेजा था और हमारे वालिद साहब चार पांच जमात पढ़कर फूलों के पुश्तैनी धंधे में लग गए थे।´´ वो कहे जा रहे थे और मैं सुने जा रहा था। ‘करीम चाचा अलीगढ़ से पढ़कर आए और शहर में बस गये और हमारा परिवार गांव में ही रहा। आजादी के वक्त चचाजान ने पाकिस्तान जाने का फैसला किया था। मुझे आज भी याद है कि पूरा गांव करीम चाचा को मनाने शहर गया था, लेकिन करीम चाचा टस से मस ना हुए। दादा और वालिद ने उन्हें बहुत समझाया, अम्मी, आपा, खाला सब लोगों ने करीम चाचा को रोकने की बहुत कोशिश की, मगर वो फैसला कर चुके थे। दादा और वालिद के आसुओं का उनके ऊपर कोई असर ना हुआ और चचाजान पाकिस्तान चले गए।´´

मैं सोचता हूं – छुट्टन मियां जिस तरह हिंदुस्तान की तहजीब-ओ-रवायत से वाबस्ता हैं, उनके पुरखे हिन्दुस्तान के बंटवारे पर पाकिस्तान जा भी नहीं सकते थे। कभी-कभी उनकी इस वतनपरस्ती को सलाम करने को जी चाहता है, मगर फिर सोचता हूं, उनके करीम चचा भी तो उसी खानदान का हिस्सा थे। खैर, छुट्टन मियां से मैंने हिम्मत जुटा कर पूछ ही लिया कि हर तरफ हिन्दू-मुस्लिम एक दूसरे के खिलाफ जिस तरह आग बरसा रहे थे, दंगों की खबर आम थी, आपके वालिद को डर नहीं लगा जरा सा भी, छुट्टन मियां ?

“डर काहे का, सब घर, गांव, मुहल्ले के ही तो लोग थे और फिर अपने ही मुल्क के बांशिदे। तमाम उम्र जिनके बीच चाचा, भाई और बेटे के रिश्तों से जुड़े रहे, उनसे काहे का डर, शायर मियां।´´
“फिर भी, उस वक्त तो वे हिन्दू थे और आप मुसलमान´´ मैं भी हल्के से कितनी बड़ी बात बोल गया, इस बात का अंदाजा उस वक्त हुआ जब लफ्ज मेरी जुबान से फिसल चुके थे।
“एक दिन में पहचान तो नहीं बदल जाती, रिश्ते तो खत्म नहीं हो जाते।´´
ये बात कई दिनों तक मेरे कानों में गूंजती रही। `एक दिन में पहचान तो नहीं बदल जाती, रिश्ते तो खत्म नहीं हो जाते।´

मुश्किल से यही कोई महीना भर ही बीता था कि मुझे 15 दिन के लिए एक वर्कशॉप में कलकत्ता जाना पड़ा। लौटा तो हालात काफी हद तक बदल चुके थे। सुबह सुबह जब फूल देने एक अधेड़ महिला पहुंची तो मेरा माथा ठनका। मैंने पूछताछ की तो पता चला छुट्टन मियां ने अपना फूल का काम छोड़ दिया है, छोड़ क्या दिया, कहना चाहिए कि वक्त ने छुड़ा दिया।

सुनने में आया ठीक एक खालिस अखबारी खबर की तरह, नहीं-नहीं, खबरिया चैनल की खबर की तरह कि शहर जब दंगों की जद में था, उनकी बेटी नरगिस की कुछ औरतखोर जानवरों ने इज्जत लूट ली, क्योंकि वो मुसलमान थी और वो जानवर हिन्दू.। इस तरह से एक औरत ने मुसलमान होने की सजा पाई या मुझे माफ कीजिए. औरत होने की, या तो उसका खुदा जानता है या उनका ईश्वर। नरगिस उस वहशी हादसे से जिसमें कम से कम 5 लोग मुब्तला थे, अपने आपको बाहर न निकाल पाई और उसने सल्फॉस की गोलियां खाकर अपनी जान दे दी। छुट्टन मियां का अपनी दिमागी हालत पर काबू ना रहा, मुमकिन भी नहीं था और वे पागल हो गये और जुमले में तब्दीली आ गई –
“बाअदब बामुलाहिजा होशियार! छुट्टन मियां फूल वाले उर्फ पागल तशरीफ ला रहे हैं।´´
कहानी को यहां समाप्त माना जा सकता है और नहीं भी।

आगे जो हुआ उसे आपकी इच्छा पर छोडता हूं कि जोडा जाए या नहीं, आप यहां पर ही विराम लेकर स्किप करके अपने काम में लग सकते हैं।
और दूसरा रास्ता है कि कहानी का उत्तरांश पढकर निर्णय करें कि कहानी यहां समाप्त हो या न हो।

किसी दिन वो अपने आप ठीक हो गए जब उन्हें याद आया कि आजादी के बाद करीम चचा ने एक खत उन्हें लिखा था, पाकिस्तान में दक्षिणी पंजाब के रहीमयारखान कस्बे से और लिखा था कि उनके पडौसी हिंदू घर की जवान लडकी को मुसलमानों ने उठा लिया और उसकी आबरू का वही हश्र हुआ जो आबरू मुहावरे के साथ जुडा होता है। वो परिवार फिर पाकिस्तान में नहीं रहा, करीम चचा खुद हिंदुस्तान जाने वाली रेल में उन्हे विदा करके आए।

इस इलहाम के बाद कि हादसा किसी कौम का नहीं होता, छुट्टन मियां ने अपने पुश्तैनी फूलों के धंधे को मुसलसल रखा। एक फैसला उन्होंने जरूर किया कि अगर लडकी वालों की ओर से फूलों की मांग आए, घर सजाना हो, फेरे हों या कि निकाह पढा जाना हो, आधे रेट पर फूल और गुलदस्ते जाएंगे, आधे रेट पर ही घर सजेगा।

अब कहानी के अंत का आखिरी फैसला अफसानानिगार आप छोडता है।

अपने दिलदार शायर-इश्क-मिजाज़, सिनेमची डॉ. दुष्यंत कथाकार भी हैं. उनकी ताज़ा किताब राजकमल से आई है और दूसरी बस प्रिंटिंग मशीन पे चढ़ने ही वाली है… प्रकाशन का नाम बाद में बताएंगे, पर ताज़ा ख़बर ये है कि दुष्यंत बाबू की एक कहानी जनसत्ता में सोलह सितम्बर को शाया हुई है। तो मेहरबान, कदरदान, पढ़िए, सोचिए और मस्त हो जाइए…

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2 Comments »

  • Krishna said:

    वोहुत खूब मियां …हिन्दी उर्दूं की ऐसी गुथ्थम गुथ्थी की वाह …

  • Gargi Mishra said:

    बाअदब बामुलाहिजा होशियार! छुट्टन मियां फूल वाले उर्फ पागल तशरीफ ला रहे हैं।´´
    कहानी को यहां समाप्त माना जा सकता है और नहीं भी।…..

    एक किरदार , उसका रोज़गार , तौर तरीकों का एक इज़हार,
    एक मुल्क , एक जुबां , एक तारीफ , एक टीस और एक मुकम्मल कहानी …
    कहानी कहीं कहीं बहुत गुंधी हुई लगी पर लेखक के ये बार बार कहने से की “कहानी का अंत यहाँ समझा जा सकता है ” ने उत्साह बनाये रखा ..समय और मन ज़ाया ना हुआ .. शुक्रिया और ढेरो
    बधाई ..