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हर भाषा का अपना सॉफ्टवेयर होता है – डॉ. सैनी

17 September 2012 No Comment

हिंदी दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में युवा कवियों ने बांधा समां

जयपुर। हर भाषा का अपना सॉफ्टवेयर होता है और साथ ही उसकी अपनी प्रकृति और अपना मिजाज होता है। उसी के अनुरूप अभिव्यक्ति में प्रभावोत्पादकता बनती है। हिन्दी दिवस के अवसर पर जगन्नाथ यूनिवर्सिटी के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र में स्थित सिटी कैम्पस के जिम्स कॉन्फ्रेंस हॉल में जनसंचार विभाग, जगन्नाथ विश्वविद्यालय और जेएनआईटी के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी-कल, आज और कल विषयक् संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी के निदेशक डॉ आर.डी. सैनी विचार व्यक्त कर रहे थे।
सैनी ने कहा कि भारत से बाहर दुनिया के अनेक देषों में करोड़ों लोग हिन्दी का प्रयोग करते हैं और यही नहीं, हिन्दी के फलक के विस्तार में लगातार वृद्धि हो रही है। देश-विदेश में हिन्दी-लेखन और प्रकाशन पहले से अधिक हो रहा है। इंटरनेट क्रान्ति के बाद हिन्दी नई पीढ़ी में भी अपनाई जा रही है। हिन्दी के सर्वग्राही स्वरूप को देखते हुए यह कहना अतिष्योक्ति नहीं होगा की आने वाले समय में हिन्दी पूरी दुनिया पर राज करेगी।

संगोष्ठी के अध्यक्ष और आकाशवाणी केन्द्र, जयपुर के कार्यक्रम प्रमुख हरीश करमचन्दानी ने हिन्दी और वर्तमान परिदृष्य विषय पर विचार व्यक्त करते हुए हिन्दी के प्रति हीनता के भाव को त्यागने का आव्हान किया। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा और गौरव है और इसके लिए भी हमें इस तरह से चिंता करनी पड़ रही है।

जगन्नाथ गुप्ता इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एण्ड टैक्नोलाजी के निदेशक प्रोफेसर वाईसी भट्ट ने तकनीकी शिक्षा और हिन्दी विषय पर अपने यूरोप प्रवास के रोचक अनुभवों को साझा किया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि विज्ञान और तकनीक से जुड़े पाठ्यक्रमों को हिन्दी माध्यम से संचालित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है और इसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

संगोष्ठी में विशिष्ट अतिथि और मुख्य वक्ता के तौर पर जाने-माने रचनाकार आलोक श्रीवास्तव ने हिन्दी की विकास-यात्रा को सिलसिलेवार और प्रभावी ढंग से रखा। उन्होंने कहा कि हिन्दी के विस्तार में सबसे बड़ी बाधा है – इससे पैदा होने वाले रोजगार के अवसरों की कमी का होना। उन्होंने लम्बे समय तक की गुलामी और उस कारण से बनी मानसिकता को विकृति बताया, जिस वजह से हिन्दी को लेकर देषवासियों में कोई विशेष उत्साह और सम्मान देखने को नहीं मिलता। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि हमें अंग्रेजी हटाओ के नारे को छोड़कर समय की मांग को देखते हुए हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर समान अधिकार प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर होना होगा।

इस अवसर पर जगन्नाथ विश्वविद्यालय के वाइस चान्सलर प्रोफेसर (डा.) वीके अग्रवाल ने हिन्दी के साथ दोयम दर्जे के बर्ताव को लेकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रभाषा को तिरस्कृत और उसकी उपेक्षा करके कोई भी राष्ट्र तरक्की नहीं कर सकता।

संगोष्ठी में दो रोचक सत्रों का आयोजन भी किया गया जिसमें काव्यपाठ और प्रष्नोत्तरी शामिल रहे। काव्यपाठ के सत्र में युवा कवि और अहा ! ज़िंदगी के फीचर संपादक चण्डीदत्त शुक्ल ने अपनी प्रेम कविता – `हर बार उभर आते हैं मेरे चेहरे पर तुम्हारे प्रेम के निशान’ और युवा कवयित्री श्रीमती अनीता नायर ने स्त्री विमर्श पर आधारित कविता कर ना सकी खुद से बात कभी, तो फिर क्या है! के जरिए समां बांध दिया। डॉ. संजय मिश्र ‘नवनीत‘ ने भी अपनी दो रचनाओं अव्यक्त और वक्त की रौ में को पेश किया।

संगोष्ठी के अन्तिम सत्र में हिन्दी भाषा, साहित्य, पत्रकारिता और हिन्दी सिनेमा से जुड़े रोचक प्रश्न संभागियों से पूछे गये और उन्हे प्रोत्साहन स्वरूप राजस्थान की संस्कृति पर आधारित पुस्तकें प्रदान की गईं। इससे पूर्व जनसंचार विभागाध्यक्ष डॉ. संजय मिश्र ने विषय प्रवर्तन और स्वागत भाषण दिया। संगोष्ठी में उपस्थित सभी सैकड़ों प्रतिभागियों ने हिन्दी भाषा की अस्मिता और सम्मान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का संकल्प लिया।
जेएनआईटी के वाइस प्रिंसिपल डॉ. रोहित जैन ने अतिथियों का स्वागत किया। संगोष्ठी का संचालन जनसंचार विभाग की माधुरी वशिष्ठ ने किया।

(जयपुर से डॉ. संजय मिश्र की रपट)

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