Home » यादें, स्मृति-शेष, है कुछ खास...पहला पन्ना

मैंने कहा – पंजा लड़ाओगे दारा सिंह!

20 July 2012 One Comment

दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित. कृपया प्रकाशन के लिए न उठाएं!

– चण्डीदत्त शुक्ल

chandidutt@gmail.com

सबसे बुरा होता है – भरोसे का टूट जाना। यकीन चाहे प्रेम पर हो या विश्वास हो इस बात का कि हमारी हिफाजत करने वाला कोई आसपास है। कल सुबह, जब यकायक पता चला कि दारा सिंह भी नहीं रहे तो दिल से हूक-सी उठी, `अरे पहलवान! आप भी चले गए?’ लगा, जैसे- हिंदुस्तान की ताकत ही चली गई। रामायण में `हनुमान’ का किरदार जीवंत बनाने वाले दारा सिंह अपनी ज़िंदगी में किसी संजीवनी बूटी की तलाश नहीं कर पाए और नसों को तोड़ देने वाली एक रहस्यमय बीमारी से जूझते हुए आखिरी सांस ली। शायद, मौत सबसे बड़ा सच है। दुनिया को अपनी ताकत का लोहा मनवाने वाली शख्सियत भी इस सच के आगे हार गई।

एक पुराना वाकया याद आ रहा है। तब मेरी उम्र दस या ग्यारह साल रही होगी, जब गृह जनपद गोंडा के टॉमसन इंटर कॉलेज के मैदान में एक प्रदेश स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। उसमें रुस्तम-ए-हिंद दारा सिंह भी आए थे। नहीं, वे कुश्ती लड़ने नहीं, बल्कि चीफ गेस्ट के तौर पर शिरकत करने पहुंचे थे। उद्घाटन के बाद एनाउंसर ने मज़े-मज़े में कह दिया था — है कोई! जो सिंह साहब से हाथ मिलाना चाहे। (नोट कीजिएगा, पंजा लड़ाने नहीं, सिर्फ हाथ मिलाने की बात)। बाकी तो समझदार थे, उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मैंने बाल-सुलभ उत्साह में कह दिया – मैं मिलाऊंगा हाथ!

यह कहते समय मैं बैरिकेडिंग के दूसरी तरफ, दारा सिंह के घुटनों के पास ही खड़ा था। दारा सिंह जोर से हंस दिए थे। मैंने सिर ऊपर कर देखा। पहा़ड़ जैसा एक आदमी। उन्होंने हंसकर हाथ बढ़ाया और मेरे कंधे पर हल्की-सी चुटकी भर ली थी… वल्लाह… दस दिन तक दर्द बना रहा था…। अब भी वह लम्हा याद कर हंसी आ जाती है, पर आज जब पता चला कि दुनिया भर को `मर्द को दर्द नहीं होता’ का जोशीला नारा देने वाले दारा सिंह इस दुनिया में नहीं हैं तो न यकीन हुआ, न कुछ समझ में आया कि क्या कहा जाए!

यह बात सही है कि वे बुजुर्ग हो चले थे और उनका जाना उन्हें दर्द से मुक्ति दिला गया, लेकिन यह भरोसा कैसे कोई करे कि हिंदुस्तान की ताकत के प्रतीक दारा सिंह अब हमारे बीच नहीं हैं। देशी मुक्के के जोर से दुनिया कैसे दहलेगी? यह सब पढ़कर हो सकता है, आप कहें कि गन-बम-रसायन की खतरनाक ताकत के सामने दारा सिंह के पहलवानी जोर का मैं मुरीद क्यों हो रहा हूं, लेकिन यह दरअसल, नास्टेल्जिक होना ही है। बिना बालिग हुए पिता बनना, कुश्ती की खातिर मुमताज का प्रेम ठुकरा देना, पारंपरिक परिवार के संस्कारों से बाहर निकलकर आधुनिक सोच अख्तियार करना – दारा सिंह सचमुच कद्दावर थे और उनमें यह ताकत भी थी कि वे अपने विचारों को नया कलेवर दे सकें। वह दौर याद आता है, जब दारा सिंह नाम का ही मतलब बन गया था – जोश और हिम्मत। बाद के दिनों में हिंदी सिनेमा ने भी उनकी इसी छवि को भुनाया और वे बरसों-बरस पंजाबी लहजे में `भारतमाता की जय’ कहते हुए ललकारते रहे।

कल रात की ही बात है। फिल्म `सिकंदर-ए-आजम’ में मुमताज के साथ रूमानियत बिखेरते दारा सिंह पर फिल्माया एक गीत – `पिला ली तूने तो’ देख रहा था और एक रात भी नहीं बीती कि ये ख़बर आई। शायद, ख़ुदा को भी ख़बर नहीं थी इस बात की कि दारा सिंह और ताजमहल न होंगे तो हिंदुस्तान की शान में बट्टा लग जाएगा।

One Comment »

  • anu said:

    बहुत सुन्दर लेखन………..
    as always…
    already read in paper
    regards

    anu