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कहानी / दफन नदी

28 April 2012 No Comment

कथा के बारे में – ये एक कहानी है, पर महज कहानी नहीं। बचपन में बिछड़े दो दिलों की, दो मुल्कों की, यादों के एक बक्से की सच्ची दास्तां है। कहानी से एक अंश – इरशाद का कहना था कि यहां खुदाई की जाए तो जमीन के नीचे सोया हुआ पूरा एक शहर निकल सकता है। इसके लिए वे जूझ रहे हैं। पुरानी यादों को जगाना चाहते हैं। मुझे लगा मैं भी पाकिस्तान में अपनी पुरानी यादों को जगाने आया हूं, जहां की धरती से मेरे पापा जी और चाई जी के रिश्ते जुड़े हैं ….. और जहां सलमा के रूमानी प्यार के जज्बात दफन हैं।
और सचमुच, ये बेहद मासूम कहानी उसी भावभूमि में ले जाकर आहिस्ते से खड़ा कर देती है, जहां प्यार की नदी दफन है, जहां मचलते हैं यादों के अरमान।

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लेखक के बारे में –

ईशमधु तलवार। हिंदी पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, हिंदी पत्रकार के तौर पर अपनी लेखनी से देश की सीमाओं के पार भी विख्यात विरले पत्रकारों में उनकी गिनती होती है..देश के पहली पंक्ति के हिंदी अखबारों में रिपोर्टर, चीफ रिपोर्टर, संपादक आदि महत्वपूर्ण भूमिकाओं में काम किया, नाम कमाया, दोस्त कमाए…वहीं साहित्यिक दुनिया में कथाकार, नाटककार और व्यंग्यकार के रूप में उन्हें हिंदी की वरिष्ठ पीढी के मौलिक और प्रभावी लेखकों में गिना जाता है… इन दिनों देश के सबसे बड़े मीडिया समूह ईटीवी में संपादकीय सलाहकार हैं।

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और अब कहानी
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– ईशमधु तलवार

कैसी होती है सुबह… हर सुबह जैसे एक नया एहसास होता है… सामंती किलों की भव्य प्राचीरों से पत्थर के गलियारों में डर-डरकर उतरती सुबह… समुद्री तटों पर झाग उफनाती सफेद-नीली सुबह… तारकोल की सड़कों पर सरपट दौड़ते, हांफते वाहनों के बीच ट्रैफिक सिग्नल्स पर घर्र-घर्र करती सुबह… रहीमयार खान में सुबह होटल की खिड़की खोली तो लगा, मैं पाकिस्तान में नहीं, हिंदुस्तान में ही हूं। दूर तक पसरे खेत, दरख्त और गांव… लगा, जैसे सामने मेरे गांव बगड़ की तरह भूरी मिट्टी से बने घरों के छान-छप्परों से फिसलकर रेत की गालियों में झरने की तरह सुबह गिर रही है। एक जैसी सुबह…

लाहौर से एक थकान भरी यात्रा के बाद रात को हम रहीमयार खान पहुंचे थे। मैं जल्दी से उठकर तैयार होता हूं और अपने साथियों के साथ डाइनिंग हॉल में नाश्ते के लिए एक टेबल पर जाकर बैठ जाता हूं। डाइनिंग हॉल में गहमागहमी है। तभी दस-बारह लोगों का एक ग्रुप डाइनिंग हॉल में प्रवेश करता है। इनमें एक महिला का अंदर आना था कि जैसे मखमली गुलाब की खुशबू अचानक पूरे माहौल में तैर गई। गोरी-चिट्टी मांसल देह की इस महिला के चेहरे से शहद के छत्ते की तरह लावण्य टपक रहा था। मैंने पास बैठे अपने मेजबान इरशाद से पूछा – ये कौन है! इरशाद मुस्कराया। कटीली मुस्कान। फिर कहा- ‘शाम को इसी का ग्रुप कल्चरल आइटम पेश करेगा। यह बहुत अच्छी नृत्यांगना है। इसका नाम सलमा है।’

रहीमयार खान में हम एक गोष्ठी में भाग लेने आए हैं। इसमें भारत-पाकिस्तान की जमीन में दफन एक नदी पर चर्चा होनी है। राजस्थान के रेगिस्तान में दफन यह नदी सरस्वती कहलाती थी, जिसका नाम पाकिस्तान के चोलिस्तान में जा कर हाकड़ा हो गया। मुझे अचानक लगा कि मेरे दिल में दफन एक नदी अचानक हिलोरें लेकर बहने लगी है। इस नदी की लहरों ने उछालकर मुझे मेरे गांव बगड़ में पहुंचा दिया। मेवात की पट़टी का गांव – बगड़।

खेत के धोरों में उठती भाप मेरी आंखों के सामने तैरने लगती है। कच्चे मकान की दीवार के पास खड़े होकर हम धूप सेंक रहे हैं। मेरे पास मांडूली खड़ी है। मैं रोज सुबह इसी तरह इस दीवार के पास आ कर धूप सेंकता हूं। मुझे देख कर मांडूली भी आ जाती है। बगड़ की सुबह कुछ ऐसे ही शुरू होती है। हम दोनों मुंह से भाप निकाल कर रोमांचित हो रहे हैं। मांडूली मुझसे पूछती है – ‘सर्दीन में मुंह सू भाप क्यूं निकले‘, मैं कहता हूं – ‘पतो नांय।‘ होड़ लग गई है कि कौन ज्यादा भाप निकालता है। सामने कुएं पर बैल चरस से पानी खींच रहे हैं। चमड़े का बड़े आकार का झोलानुमा चरस पानी से भर कर झूमता-इठलाता हुआ ऊपर आ रहा है।

महबी चाचा कुंए के किनारे बने ढाणे पर झूमते चरस को अपनी ओर खींचता है और उसे ढाणे की शिला पर टिका देता है। फिर जोर से आवाज़ लगाता है – ‘छोड़ दे कीली।‘ बैलों के जुए से बंधी लाव (रस्से) पर बैठकर झूलते हुए गूणी में ढलान पर नीचे पहुंचा आदमी बैलों के जुए के पास लकड़ी की कीली बाहर खींचता है। इसके साथ ही ऊपर कुएं पर पत्थर की शिला पर टिके चरस से पानी चारों ओर फूट पड़ता है। ताजा पानी से भाप ऊपर उठ रही है। मैं इस भाप के धुंधलके में भीगकर कहीं खो गया हूं। कई दृश्य आंखों में तैरने लगे है।

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मेरे पापा शहर से
मेरे लिए ट्राईसाइकिल ले कर आए हैं। गांव के बच्चों ने पहली बार ऐसी छोटी साइकिल देखी है। ट्राईसाइकिल की पीछे की सीट पर मांडूली बैठी है और मैं पीछे से धक्का लगाकर साइकिल को दौड़ा रहा हूं। उसे मौजी खिला रहा हूं। तभी अचानक चाईजी प्रकट होती हैं। वे डांट लगाती हैं – ‘क्या कर रहा है? यह छोटे बच्चों की साइकिल है। बड़े बच्चों की नहीं। ऐसे तो यह टूट जाएगी।‘ मांडूली साइकिल से उतरी और चिड़िया की तरह फुर्र हो गई। डांट से वह भी डर गई थी! मैं चाईजी के आंचल से लिपट कर नाराज होता हूं – ‘हमें आप खेलने क्यों नहीं देती?‘ मेरी आंखों में आंसू आ गए। चाईजी ने आंसू पोंछे। समझाया- ‘बेटे, साइकिल टूट जाएगी तो फिर तू क्या चलाएगा‘ वे अपने साथ मुझे घर ले आईं।

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शाम ढल चुकी है।
रात गहराने लगी है। अचानक पापाजी ने आदेश दिया – ‘जा, बंध पर कालेखां का खाना दे कर आ।‘ मैं डर गया। बंध (बांध) घर से कोई तीन-चार किलोमीटर दूर है, जहां हमारे खेत हैं। शाम होते ही रास्ते में सन्नाटा पसर जाता है। फिर रास्ते में ‘फंसी नीम‘ भी पड़ती है। कहते हैं, उसमें भूत होते हैं। चाईजी के पास मैने धीरे से जाकर कहा – ‘मुझे डर लगता है। मैं वहां कैसे जाऊंगा।‘ चाईजी ने मेरी सिफारिश की तो पापाजी दहाड़े – ‘जाएगा कैसे नहीं? घर से बाहर निकाल दूंगा। कोई भूत-वूत नहीं होते।‘ पापा जी की डांट से मेरी घिग्घी बंध गई। उनकी तेज आवाज़ से ही हम डर जाते थे। चाई जी ने मुझे प्यार से समझाया – ‘देख, अपने साथ लाठी ले जा… और मैंने जो तुझे हनुमान चालीसा सिखाई है, उसे रास्ते में पढ़ते हुए जाना। तब कोई भूत नहीं आएगा।‘ पास बैठी लड्डो भी बोली – ‘गोठड़ी वाले पीर को याद करना। उससे भी भूत भाग जाते हैं।‘ मैंने खाने की पोटली कंधे पर लटकाई। हाथ में लाठी उठाई और चल दिया। बाहर निकलते ही मांडूली मिल गई। मैंने उससे कहा – ‘मांडूली बंध पे जा रहा हूं। तू भी मेरे साथ चल। मुझे अकेले डर लगता हैं।‘ मांडूली मेरे साथ चलने, खेलने को हमेशा तैयार ही रहती थी, लेकिन वह बोली – ‘एक शर्त पर चलूंगी। तू मुझे तेरी साइकिल पर घुमाएगा।‘ मैंने कहा – ‘हां यार, जरूर घुमाऊंगा। घर के बाहर तो चाईजी देख लेती हैं। अपने गांव से बाहर जा कर कल साइकिल चलाएंगे।‘ मांडूली मेरे साथ हो गई। इससे ही मेरा डर काफी कम हो गया था। रास्ते में घुप्प अंधेरा था।
गीदड़ों की हुकी-हुकी की आवाज़ आ जाती थी। झिंगुरों की आवाज़ भी अंधेरे में भयावहता पैदा कर रही थी। मांडूली गीत गा रही थी – ‘अरां, सरपंची मेरा बाबा लू मिलेगी मेरी मांई री …।‘ जैसे ही ‘फंसी नीम‘ पास आने लगी, उसने गाना बंद कर दिया। हम दोनों ने चुप्पी साध ली। यह नीम बीच में से फटी हुई थी और इसके दो विशाल तने थे। हवा में इसकी टहनियां झूम रही थीं। मैंने मांडूली से धीरे से कान में कहा – ‘देख, पेड़ के ऊपर कुछ हिल रहा है। भूत हो सकता है।‘ वो बोली, ‘चिन्ता मत कर। ऐसा करते हैं – पेड़ के पास से अपन दौड़ कर निकलेंगे।‘ पेड़ के पास आते ही हमने दौड़ लगाई तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। काफी देर तक दौड़ते चले गए। हम थक गए थे। रास्ते में एक बड़ा-सा पत्थर था। हम उस पर बैठ कर सुस्ताने लगे। मांडूली के पास बैठने से लगा कि एक बड़ा सहारा मेरे पास है। मेरा डर लगभग खत्म हो गया। जो चांदनी अब तक डरा रही थी, वह अब अच्छी लग रही थी। मांडूली चांदनी रात में एक धवल मूर्ति की तरह लग रही थी। मेरा दिल भी जैसे चांदनी में पिघलने लगा था। मैंने कहा – ‘मांडूली एक बात कहना चाहता हूं।‘ वो बोली ‘ कह।‘ मैंने कहा- ‘मांडूली तू मुझे बहुत अच्छी लगती है। मैं तुझसे शादी करना चाहता हूं।‘ मांडूली चौंकी – ‘ऐं ऽऽऽऽ ! शादी? तू पहले बड़ो तो हो जा।‘ मैं सोचने लगा – आखिर मैं बड़ा कब होऊंगा?

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बंध पर मजदूर काले खां
का खाना दे कर हम लौटे तो गांव में घुसने से पहले ही सामने मांडूली के अब्बाजान महबी चाचा खड़े दिखाई दिए। जैसे वह हमारा इंतजार कर रहे थे। आते ही उन्होंने तेज स्वर में सवाल दागा – ‘कहां गया हागा?‘ मैंने बताया – `काले खां की ब्यालू देबा गया।‘ वह फिर दहाड़े – ‘तो या छोरी कू साथ क्यूं ले गयो?‘ मैंने कहा – ‘मोकू अकेला कू डर लग ऱयो होगो – या मारे याकू साथ ले गयो।‘ उसने तेजी से मांडूली का हाथ पकड़ कर खींचा और अपने साथ लेकर चल दिया।! मैं पीछे- पीछे धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए चल रहा था।

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घर में हम बहन-भाई उछल कूद रह हैं। चाई जी खुली रसोई में चूल्हे में लकड़ी झोंककर खाना बना रही हैं। उनका ब्लाउज पसीनों में भीगा है। यह तो हमें शहर में आकर पता चला कि घरों में नौकर खाना बनाते हैं और साब का खाना दफ्तर लेकर जाते हैं। हमारे यहां तो नौकरों का खाना भी चाई जी बनाती थीं। नौकर भी कोई एक-दो नहीं, आठ-दस। उनको खेतों पर खाना पहुंचाने का काम भी हम करते। चाई जी का पूरा दिन रसोई में ही बीत जाता। पाकिस्तान के रिनाला खुर्द में रह कर उन्होंने जो कहानी-कविताएं लिखीं – उनकी वह पूरी रचनात्मकता बगड़ के चूल्हे में जल कर राख हो गई। इधर से उधर दौड़ती रहतीं। फिर हमारे पीछे दौड़तीं। मैं आगे-आगे भाग रहा हूं, वे पीछे-पीछे हाथ में गिलास का दूध ले कर भाग रही हैं – ‘काके, दूध पी ले।‘ मैंने जिद की -‘नहीं, यह दूध नहीं पीउंगा। मूंछों वाला दूध पीउंगा। मुंह पर सफेद मूंछें बननी चाहिएं।‘ चाई जी दूध में झाग पैदा करने के लिए उसे एक गिलास से दूसरे गिलास में ऊपर से धार बना कर डाल रही हैं। लाड़ लड़ा रही हैं। मैंने उनसे पूछा- ‘चाई जी, मैं बड़ा कब होऊंगा?‘

वे बोलीं – `जल्दी-जल्दी जितना दूध पिएगा, उतना ही बड़ा होगा।‘ मैंने गिलास मुंह से लगाया और एक सांस में दूध खींच गया। चाई जी अवाक मुझे देखती रह गईं, पूछा – `क्या करेगा तू बड़ा होकर?‘ मैंने कहा – ‘शादी करूंगा।‘ चाई जी की जोर से हंसी छूटी। हंसते-हंसते उन्होंने मज़ाक में कहा-‘तेरी शादी तो हम काठेडणी से कर देंगे।‘ मैं नाराज होकर चाई जी पर धीरे-धीरे मुक्के चलाता रहा। वे बचाव करती रहीं और हंसती रहीं। काठेडणी एक बूढ़ी औरत थी, जो हमारे यहां बरतन साफ करने आती थी और उसकी नाक कटी हुई थी।

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एक दिन मैं लड्डो का खाना
लेकर खेत पर गया। लड्डो मेरी धर्म बहन थी, जो मम्मी से कुछ कम उम्र की ही रही होगी! वह खेतों पर मदद के लिए आ जाती थी। मैं जब खेत पर पहुंचा तो वह नमाज पढ़ रही थी। मैं जा कर पेड़ के नीचे बैठ गया। बाद में मैंने लड्डो से पूछा- ‘लड्डो भैण (बहन), नमाज पढ़वा सू कांई होय।’ लड्डो ने बताया – ‘यासू अल्लाह मुराद पूरी करे। जो मांगो, वो मिल जाए।‘ मैंने चौंक कर कहा – ‘ अच्छा ऽऽऽऽ ! फिर मोकू भी नमाज सिखा दे। मैं भी पढूंगो।‘ उसने पूछा – ‘ तू कांई करेगो सीख के?‘ मैंने कहा- ‘ मैं भी अल्लाह सू कुछ मांगूगो।‘ उसने फिर पूछा – ‘कांई मांगेगो?‘ मैं शर्मा गया। मैंने कहा – ‘बाद में बताऊंगो।‘ मैं वहां से चला आया।

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पापाजी बहुत सख्त थे।
उनका आदेश पत्थर की लकीर होता था। उन्होंने जो कह दिया, वो कह दिया। एक दिन हरिया नहीं आया। हरिया भेड़-बकरियां चराने आता था। पता चला कि हरिया को बुखार आ गया और काफी दिन चढ़ने के बावजूद भेड़-बकरियां बाड़े में बंद हैं। पापा जी ने मुझसे कहा – ‘ जा भेड़-बकरियों को जंगल में घुमा ला।‘ चाई जी को यह बात पसंद नहीं आई। वे बोलीं ‘ ये नाजुक सा लड़का भेड़-बकरियां चराने कहां जाएगा? मेरा बेटा अब क्या ये काम भी करेगा?‘ पापाजी बोले -‘तेरा बेटा अनोखा है क्या? गांव में दुनिया के बच्चे भेड़-बकरियां नहीं चराते क्या?‘ चाई जी ने तर्क दिया-‘फिर शुरू से ही इसे ऐसे पालते। जंगल के फूल और गमले के फूल में फर्क नहीं होता क्या?‘ पापाजी लगभग चिल्लाए -‘जंगल में जाएगा तो जंगल का फूल हो जाएगा।‘ फिर मेरी तरफ मुखातिब होकर बोले- ‘चल रे, जल्दी जा।‘ वैसे, मैं मन ही मन खुश हो रहा था। एक तो इसलिए कि स्कूल से छु़ट्टी मिलेगी। फिर मुझे मालूम था कि ढेर (जंगल) में मांडूली से भी मुलाकात होगी। वह भी वहां भेड़-बकरियां चराने जाती थी। मैने चाई जी की लहरिया की साड़ी से सिर पर पगड़ी बांध ली। हाथ में लाठी ली और भेड़-बकरियां ले कर निकल गया। रासते में रूक्मणि काकी मिली तो चौंकी – ‘अरे मेरा छोटा सा कृष्ण गोपाल, तू कहां जा र्यो है…?‘ मैंने कहा- ‘भेड़-बकरियां चराबा जारो हूं।‘ उसने पास बैठी शांति भाभी से हैरान हो कर कहा – ‘देख, बाबू जी को छोरो भेड़-बकरी चराबा जा रो है। और देख सिर पे पगड़ी कैसी जोर की लग रही है।‘

मैं घूमता-फिरता ढेर में जा पहुंचा। मुझे मांडूली भी दिखाई दे गई। थोड़ी देर में झब्बू भी अपनी बकरियां ले कर आ गया। हम एक पेड़ के नीचे बैठ गए। झब्बू ने कहा – ‘भाई, बीडी पियेगो?‘ मैंने कहा – ‘ला पिला।‘ बीडी जोड़कर पहले मांडूली को दी। यह देखने के लिए कि वह बीड़ी कैसे पीती है। फिर मैंने बीड़ी पी तो धुआं अंदर ले गया। खांसी के मारे बुरा हाल हो गया। पास में एक कुंआ था। झब्बू छोटी-सी एक बाल्टी अपने साथ लाया था। उसने अपनी पगड़ी से बाल्टी बांधकर कुंए से पानी निकाला। पानी पीकर मैं ठीक हुआ। फिर हम पेड़ के नीचे कीकर के पातड़ो में शूल लगाकर उन्हें गोबर में गाड़कर खेलने लगे। खेल में ध्यान ही नहीं रहा और भेड़-बकरियां चरते-चरते बहुत दूर चली गईं। मैंने झब्बू को दौड़ाया। झब्बू भेड़-बकरियां लेने चला गया। मैं और मांडूली अकेले रहे गए। मैंने मजाक किया – `तू मुझसे शादी नहीं करेगी तो मैं तुझे भगा कर ले जाऊंगा।‘ वह हंसी – ‘चल ले चल। मैं तेरे साथ भागने को तैयार हूं।‘ मैंने कहा – ‘चल भागते हैं।‘ हम भागने लगे। आगे-आगे मांडूली और पीछे-पीछे मैं। कुछ दूर जा कर मैने उसे पकड़ लिया और हम दोनों नीचे गिर गए। एक दूसरे पर लोट-पोट हो गए। हंसने लगे। मांडूली के गदराए जिस्म को छूकर पहली बार मेरी नसें फड़कीं। मैं उत्तेजना में डूबा रहा। तभी भेड़-बकरियां लेकर झब्बू आ गया। फिर झब्बू को तीतर दिखे तो वह तीतरों पर लाठी फेंक कर उनका शिकार करने में जुट गया। मैं बहुत देर तक मांडूली की गोद में अपना सिर रखे लेटा रहा। बहुत कोमल और मधुर क्षण थे वो।

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मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ता था।
पढ़ाई के दौरान मुझे ऐसा एक ही दिन याद है, जब चाई जी मेरे स्कूल आईं। चाई जी का घर से बाहर निकलना एक घटना होती थी। बारह महीने वे घर और रसोई में ही निकाल देती थीं। घर पर वे साधारण, पसीने से भीगे कपड़ों में ही अकसर रहती थीं। छठ-चौमासे कभी शहर जाना होता तो सजधज कर निकलतीं। तब जैसे गांव की पंगडंडियां भी उनका स्वागत करती नजर आतीं। गलियों के दोनों ओर घरों के दरवाजों से कई घूंघट बाहर निकल आते और पूछते- ‘बीबी जी, आज कहां जा रही हो?’। चाई जी मुझे शहर में अपनी एक सहेली लेडी डॉक्टर को दिखाकर आई थीं। उसने कुछ ताकत के कैप्सूल लिखे थे, जो दूध के साथ लेने होते थे। मैं बिना दूध पिए स्कूल भाग जाता था। एक दिन वे थर्मस में दूध ले कर मुझे दवा देने स्कूल आ गईं। हेडमास्टर साब मुझे कक्षा में बुलाने आए। मैं आया तो मुझे डांटा, ‘चाईजी को तंग क्यों करता है? दवाई लेकर क्यों नहीं आता। कल से बिना दवाई लिए आया तो सजा मिलेगी।‘ मुझे चाई जी से डर नहीं लगता था, लेकिन हेडमास्टर जी से लगता था। उन्होंने मुझे दवाई लेने के लिए चाईजी के पास एक कमरे में भेज दिया। मैं चाई जी के सामने हाथ-पैर पीटने लगा- ‘आप मेरे स्कूल क्यों आईं?‘ उन्होंने मुझे पुचकारा और दवाई दी। फिर मैंने चाई जी से कहा- ‘आप आज अच्छी लग रही हो।‘ चाईजी मुस्कराई। मैंने फिर कहा-‘आप रोज ऐसे क्यों नहीं रहतीं।‘ वे बोली-‘बेटे दिन-रात तो चूल्हे में खपना पड़ता है। तू पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बन जा, फिर तेरी बीबी को ढंग से रखना।‘ मैं तुरंत बोला- ‘चाईजी, मैं तो मांडूली से शादी करूंगा।‘ चाईजी मेरी तरफ आंखे फाड़ कर देखने लगीं। बोली -‘तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया? अभी तेरी शादी की उम्र है क्या? बेवकूफ। पढ़ाई पर ध्यान दे।‘

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मेरा ध्यान भंग हुआ।
मैं रहीमयार खान के उसी डायनिंग हॉल में था, जिसमें चारों ओर सलमा के रूप और लावण्य की रोशनी लोगों को चौंधिया रही थी। मुझसे रहा नहीं गया। मैं अपनी टेबल से उठ कर सलमा की ओर बढ़ गया। मेरी टेबिल पर बैठे मेरे मेजबान और दूसरे साथी हैरानी से मेरी ओर देखने लगे। मैं सलमा के पास पहुंचा तो वो चौंक कर अपनी कुर्सी से उठी – ‘अरे, तुम?‘ मैंने कहा- ‘माण्डूली?’ उसने कहां-‘हां‘। जी चाहा कि उसे बांहों में भर लूं, लेकिन डायनिंग हॉल की भीड़ में यह संभव नहीं था। मैंने कहा- ‘आओ, साथ नाश्ता करेंगे।‘ वह तुरंत मेरे साथ चल दी। डायनिंग हॉल की सभी आंखें हमारी ओर घूम गईं। हम एक खाली टेबिल पर जा कर बैठ गए। मेरा पहला प्यार मेरे सामने था! वह भी पराए देश में। बरसों बाद। मैंने उससे छूटते ही पूछा – ‘माण्डूली से सलमा कैसे हो गई?’ उसने बताया – ‘मेरे ससुराल वालों ने मेरा नाम बदल दिया।‘ उसने मुझसे पूछा- ‘तुम्हारी शादी हो गई?’ मैंने कहा – ‘नहीं। अभी इतना बड़ा कहां हुआ हूं?’ वह हंसने लगी। मैंने उससे कहा- `तू मुझसे कहती थी कि बड़ा हो जा, तब शादी करेंगे। तू क्या उस समय इतनी बड़ी हो गई थी, जब तेरी शादी हुई थी? मैं अपने बड़े होने का इंतजार करता रहा और एक दिन अचानक पता चला कि तेरी शादी हो गई और तू पाकिस्तान चली गई।‘ सलमा ने बताया – ‘हमारे यहां तो जल्दी ही शादी हो जाती है न। मैंने शादी में तुम्हारा इंतजार किया था। तुम दिखे ही नहीं।‘ उसकी आंखें नम हो गईं।

दरअसल, पांचवी कक्षा के बाद गांव में कोई स्कूल नहीं था। मुझे आगे पढ़ने के लिए घर वालों ने दूर शहर में भेज दिया था। गर्मियों की छुट्टी में एक बार गांव आया तो पता चला कि मांडूली की शादी हो चुकी है। मेरे लिए वह जीवन का सबसे बड़ा धक्का था। यह ऐसा ही था जैसे कोई किसी खास फल के पकने का इंतजार कर रहा हो और अचानक कोई उसे तोड़कर भाग जाए। सलमा ने कहा- ‘मैं सपने में भी नहीं सोच सकती थी कि तुम मुझे यहां मिलोगे। मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।‘ टेबिल पर ही मैंने उसका हाथ दबाया। हमारे हाथों के पास ब्रेड पर लगाने के लिए जैम की एक शीशी रखी थी। मैं उसे हाथ में ले कर पढ़ने लगा। यह ‘मीशेल‘ कंपनी का जैम था। उस पर एक जगह लिखा था – `मेड इन रिनालाखुर्द।‘ मैं चौंका। मैंने सलमा से कहा- ‘मुझे ये जैम बाज़ार से दिला देना।‘ उसने कहा – ‘दिला दूंगी। वैसे ‘नेशनल के जैम और अचार ज्यादा अच्छे होते हैं।‘ मैंने उसे बताया- ‘अरे, यार तू नहीं समझेगी। मुझे यही लेना है – मीशेल का। इस पर रिनालाखुर्द लिखा है। चाई जी पाकिस्तान में रिनालाखुर्द में ही रहती थीं। वो इसे देखेंगी तो खुश होंगी। चाईजी बताया करती थीं कि रिनालाखुर्द में एक अंग्रेज मीशेल के नाम से बड़ा बाग था, जिसमें तरह-तरह के फल होते थे।’ इसी बीच हमारे मेजबान इरशाद भाई उठ कर हमारी टेबिल पर आ गए। उसने हैरानी से पूछा -‘आप दोनों जानते हो एक-दूसरे को? आप तो पहली बार पाकिस्तान आए हैं?’ मैंने इरशाद को सारा किस्सा बताया तो वह बहुत खुश हुआ। बोला – ‘चलो, रात को डिनर पर आज इसका जश्न मनाएंगे। वैसे भी सलमा बहुत अच्छा गाती है।‘

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नाश्ते के बाद इरशाद अमीन हमें
‘ पत्तन मुनारा‘ ले कर गए। रहीमयार खान से पत्तनमुनारा जाते समय लगा, जैसे हम जैसलमेर-बाड़मेर के रास्ते से गुजर रहे हैं। पत्तन मुनारा में हमने एक जर्जर स्मारक देखा। हमें बताया गया है कि यह हाकड़ा नदी के किनारे बने बंदरगाह का अवशेष है, जिसे सिकन्दर ने बनवाया था। इरशाद का कहना था कि यहां खुदाई की जाए तो जमीन के नीचे सोया हुआ पूरा एक शहर निकल सकता है। इसके लिए वे जूझ रहे हैं। पुरानी यादों को जगाना चाहते हैं। मुझे लगा मैं भी पाकिस्तान में अपनी पुरानी यादों को जगाने आया हूं, जहां की धरती से मेरे पापा जी और चाई जी के रिश्ते जुड़े हैं ….. और जहां सलमा के रूमानी प्यार के जज्बात दफन हैं। विभाजन के समय चाईजी का एक बक्सा रिनाला खुर्द में छूट गया था। उसमें उनकी लिखी और छपी कविताएं-कहानियां थीं। वे उर्दू में भी लिखती थीं। पाकिस्तान में बहुत कुछ छूट गया, लेकिन इस बक्से को चाई जी कभी नहीं भूल पाईं।

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शाम को हम जिन्ना हॉल पहुंचे
तो भीड़-भाड़ में सलमा की चमक दूर से ही दिखाई दे गई! सलमा को अपने ग्रुप के साथ चोलिस्तान के लोकगीतों पर एक कार्यक्रम पेश करना था। मैंने उसे बताया था कि शाम को मुझे भी गोष्ठी में बोलना है। तब उसने मुझसे कहा था – ‘मैं आपकी तकरीर की कामयाबी के लिए दुआ करूंगी।‘ गोष्ठी शुरू हुई। नदी की खोज पर पर्चे पढ़े गए। मेरा भी नम्बर आया। मैंने सलमा की ओर देखा। वह मुस्करा रही थी। नदी की कल-कल की तरह। मैंने कहा-‘मेरी चाई जी की यादों का बक्सा आज भी रिनालाखुर्द में रखा है। मेरी यादों का बक्सा भी यहां चोलिस्तान में रखा है। आज तो यहीं मेरे पास है। पाकिस्तान में भी ऐसे बहुत से लोग हैं, जो अपनी यादों के बक्से हिन्दुस्तान छोड़ आए हैं। ये यादें हमें जोड़ कर रखती हैं! सिन्ध और राजस्थान के बीच जहां रेत के धोरे सरहद बनाते हैं वहां आपकी रेत हमारे यहां उड़ कर आती है और हमारी रेत आपके यहां उड़कर जाती है। जिस तरह राजस्थान की धरती के नीचे सरस्वती नदी और चोलिस्तान की जमीन के नीचे हाकडा नीद बह रही है, उसी तरह तारबंदी के बावजूद दोनों देशों में मोहब्बत की नदी आज भी बह रही है। सियासत की नफरत के सरहदी तार इसे बहने से रोक नहीं सकते।‘ मैं देख रहा था। सलमा की ऑंखों में आंसू थे। मुझे लगा कि प्यार की एक दफन नदी की खुदाई शुरू हो गई है। न जाने कब पानी के सोते फूट पड़ें।


मधुमती पत्रिका में प्रकाशित

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