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मेरे न होने पे, मेरी तसवीर न लगाना…

19 April 2012 One Comment

– गार्गी मिश्रा

नाम तो नहीं लिखता कोई खुद का
और टांगता दीवारों पर…
क्या भूला है कभी खुद का नाम?
इश्क की बात कुछ और है…
नाम लिखना किसी के नाम के साथ रिवाजों सा है…
पर सुनो, इन रिवाजों से दूर ही रहना तुम
झूठी-मूठी लगने लगोगी … और फिर तुम्हारा वो “सच्ची मुच्ची” नहीं मानूंगा मैं…
तुम्हें न घूंघट करवाया है, ना तीज का व्रत
अपने ही घर पे क्यूं किरायेदार बनोगी?
सच-सच बताओ ज़रा
नावेल वाली रैक पे जमी धुल कब साफ़ की थी पिछली बार?
जब उतारती हो चढ़ के पीढ़े पे अचार का मर्तबान, तुम्हारे नाखूनों में मकड़ी के जाले फंस जाते हैं…
गईं थी साफ़ करने वो जाले?
तुम तो मगन थीं अचार खाने में, वो भी ललचा-ललचा कर…
सिनेमा देखने के चक्कर में रसोई घर भी बिना लीपे आ जाती हो
चिपक के बैठ के बाल्टी भर आंसू बहाती हो…
पड़े रहते हैं ठाकुर जी भी, भूखे पियासे को कोई भोग लगाने आएगा…
ऐसी ही हो तुम…
बेशहूर…
अब नाखून चबाते-चबाते…
मुह सुजा लोगी और बुलकाने लगोगी आंसू…
रोना है तो रो लो…
मानोगी तो है नहीं…
पर सच बताऊं मुनमुन तुम मुझे ऐसी ही अच्छी लगती हो…
बेशहूर…
मेरे ना होने पे मेरी तस्वीर न लगाना
जम जाएगी धूल उसपे और साफ़ भी करना याद न होगा तुम्हें…
पट्टीदारी में लोग चार बातें बनाएंगे….
और ठाकुर जी भी बदला लेंगे तब, तुमसे मेरी याद दिला-दिला कर
जो लगाओगी तसवीर…
अच्छा सुनो…
इन सब बातों के अलावा…
मुझे ‘साइनस’ की भी दिक्कत है
ये तो जानती ही हो ना
हल्का-सा भी गर्दा उड़ा
तो छींकने लगूंगा वहीं दीवार पे टंगे टंगे …
समझी …. 🙂

( गार्गी मिश्रा। युवा लेखिका, कवयित्री। दुनिया को जानती-बूझती-पहचानती और महसूस करती हैं। उनकी कविताओं में ताज़गी है। चौराहा पर पहली बार।)

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