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एक सुरीली आपा, जो दीवाना बना देती है…

7 December 2010 No Comment
दर्द तो दर्द है, क्या तेरा-क्या मेरा। इसकी तासीर इक जैसी है, तड़प का रंग भी है इक जैसा, तभी तो जब आबिदा परवीन की तबियत नासाज़ हुई, तब हिंदुस्तान-पाकिस्तान, हर जगह मौसिकी के दीवानों ने दिल थाम लिए, दुआएं करने लगे। आबिदा के चाहने वाले इस पार और उस पार, बेशुमार हैं और आपा के नाम से मशहूर सूफी-सिंगर-संत आबिदा भी इस रिश्ते को अच्छी तरह पहचानती हैं, मान देती हैं। आबिदा की सरगम से रिश्तेदारी और भारत-पाकिस्तान में उनकी मशहूरियत रेखांकित करते हुए इस लाज़वाब सिंगर के सफ़र पर एक मुख्तसर-सी नज़र…
`आपा…आप अपना ख़याल रखना। सुन रही हैं ना। क्या पूछा—हम आपके हैं कौन? अजी, हम आपके मुरीद हैं और जो हैं, तो कोई अहसान नहीं कर रहे…आप हैं ही इतनी अच्छी।‘
अहसासों से नम कोई ख़त अगर हिंदुस्तान से पाकिस्तान की ओर रवाना हो और उसमें ऐसे अलफाज़ हों, तो आप क्या सोचेंगे? किसी ने अपनी किसी रिश्तेदार को लिखी होगी चिट्ठी। हां, सच है। रिश्ता तो है। खत लिखने और पाने वाले के बीच। ये रिश्तेदारी खून की नहीं, जज़्बात और अहसास की है।
हिंदुस्तान के लाखों लोग तब से हैरान-परेशान और उदास हैं, जब से सुना कि प्यारी आपा की तबियत नासाज़ है। वो आपा, जो पाकिस्तान की लता मंगेशकर कहलाती हैं, वो—जिनके दर्द भरे नगमे सुनकर सारा मुल्क आंसू बहाता रहा है। अब इस मुल्क का कोई एक नाम नहीं है। ये है पूरा का पूरा मुकम्मल हिंदुस्तान। वही हिंदोस्तां, जिसके ज़िगर का एक टुकड़ा पाकिस्तान कहलाया, तो दूसरे को अंग्रेज़ों ने इंडिया नाम दे डाला। दीवारें खिंच गईं, कांटों की बाड़ लग गई और एक देश के दो हिस्से हो गए पर दिल तो दोनों तरफ एक-सा ही है, दर्द की रंगत एक जैसी है।
यही वज़ह है कि जब रंग बातें करें और बातों से खुशबू आए / दर्द फूलों की तरह महके अगर तू आए / भीग जाती है किस उम्मीद पे आंखें हर शाम / शायद से रात हो महताब लबेजू आए जैसी रचना आपा, यानी आबिदा गुनगुनाती हैं, तो उनकी आवाज़ पर भारत और पाक, दोनों के बाशिंदों के होंठों से मोहब्बत के तराने फूट पड़ते हैं। अंगुलियां मेज़ का कोना भी खटखटाने लगती हैं, जैसे—सामने कोई साज़ रखा हो।
ऐसा हो भी क्यों ना…आबिदा की गायकी में वो अमृत है, जो सुनने वालों की रूह में रच-बस जाता है। अपना हर दर्द हम आबिदा की आवाज़ के साथ सांझा करते हैं। आपा की गायकी ऐसे सुकून देती है, जैसे सांझ के वक्त, तनहाई में किसी ने सिर सहलाकर पूछा हो—तुम इतने अकेले क्यों हो?
सच मानिए, आपा की आवाज़ में क़तरा-दर-क़तरा सारे जहान के लिए मोहब्बत बसती है और उन्हें सुनने वाले मोहब्बत की इस चाशनी से ज़िंदगी की मिठास पुरअसर तरीके से महसूस भी तो करते हैं।
किसी ने ग़लत नहीं कहा है कि कोई सरहद सरगम को नहीं बांध पाती। जिस तरह परिंदे हर दीवार को उसकी हैसियत बताते हुए आसमान की सैर करते एक देश से दूसरे देश सैलानी बने चले आते हैं, वैसे ही तो आबिदा की आवाज़ की नूराई हिंदुस्तान चली आई है। मुल्क के कोने-कोने में आबिदा के प्रशंसक मौज़ूद हैं और शायद ही कोई म्यूज़िक स्टोर हो, जहां आपा की सीडीज़ और कैसेस्ट्स ना मिल जाएं। आपा पॉप और रॉक के दौर में भी सूफ़ियाना अलमस्ती की पैरोकारी करती हैं। यूं तो, उम्र के बहुतेरे पड़ाव पार कर चुकी हैं, लेकिन उनके सुरों में झरने के पानी जैसा बहाव और सुबह की ओस सरीखी ताज़गी बनी-बची हुई है।
वैसे, आबिदा का सफ़र भी कम दिलचस्प नहीं है। बात साठ के दशक की है। तब फ़रीदा ख़ानम और इकबाल खान की ग़ज़लें पाकिस्तान से लेकर हिंदुस्तान तक संगीत के दीवनों की ज़िंदगी का ज़रूरी हिस्सा बन चुकी थीं। उसी दौर में सिंध की दरगाहों पर एक लोकगायक भी हाज़िरी लगाया करता था। ये थे—हैदर शाह। हैदर के संग आठ बरस की एक बच्ची भी अक्सर नज़र आती—वही, जो अब अपनी आपा है, यानी आबिदा। जब भी हैदर तान छेड़ते, आलाप के साथ-साथ सुनने वालों के दिल और हथेलियां दोनों मचल पड़ते। एक तरफ तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती और दूसरी तरफ आबिदा के होंठों की मुस्कराहट और, और भी खिलती चली जाती। नन्ही आबिदा की आंखों में खुशी की चमक भर जाती। वो सोचती—अब्बू हों तो ऐसे, देखो—क्या कमाल गाते हैं, लोग वाह-वाह करने को मज़बूर हो जाते हैं।
यूं ही नहीं कहते कि बचपन में कोरी स्लेट से दिमाग पे जो भी इबारत छप जाती है, ता-ज़िंदगी नहीं धुलती, सो गुड्डे-गुड़ियों से खेलने के वक्त में आबिदा ने जो सरगम की तहरीर पढ़ी, फिर तो अब तक दोहराती ही जा रही हैं।
एक दिन रेडियो स्टेशन जाने का मौक़ा मिला। धड़कते दिल और मचलते अरमानों, विरासत में मिली अलमस्ती का एक टुकड़ा और ढेर सारी लाज और हिचक के साथ आबिदा गुनगुनाने लगीं और फिर क्या था, सारी महफ़िल लूट ली उन्होंने। यूं, वहां सुनने वालों की भीड़ ना थी, चंद पारखी ज़रूर थे, जिन्होंने जान लिया—यही है आने वाले वक्त की आवाज़। आबिदा रेडियो के ऑडिशन में चुन ली गईं और फिर क्या था…एक घिसे-पिटे मुहावरे की मदद लेता हूं—उन्होंने कभी मुड़कर नहीं देखा। देखतीं भी कैसे, वक्त ही ठहरकर सुरों की इस मलिका को निहारने लगा।
बात हैदराबाद स्टेशन की है। यहीं पे शेख़ ग़ुलाम हुसैन म्यूज़िक प्रोड्यूसर थे। वो नौकरी महज इसलिए नहीं करते थे कि पैसे मिलें और घर चले। शेख को ज़ुनून था—कुछ नया करने का और उस पर जो आबिदा की आवाज़ का साथ मिला, फिर तो सारा ज़माना ही मज़बूर हो गया—क़माल की है ये जोड़ी…कहने को। व्यावसायिक साथ जल्द ही जन्म-जन्म तक साथ निभाने के वादे में तब्दील हो गया। आबिदा और शेख मियां-बीवी भी बन बैठे। आपा छोटी थीं, दुनियादारी उन्हें नहीं आती थी, लेकिन मौसिकी की हर बारीकी समझती थीं। बड़ी बारीक़ नज़र रखती थीं हर सुर पर, हर अंदाज़ पर।
शेख और आबिदा ने ग़ज़लगोई के तरीके तक बदल डाले। पहले स्टेज़ पर सिंगर यूं बैठते थे, ज्यूं इबादत के समय बैठा करते हैं। एकदम दरबारी शैली में पर आपा ने दरगाह वाली गायकी की शैली अपनाई। ऐसे, जैसे ध्यान लगाकर कोई सूफी संत बैठता हो। अब, जब खुद से बेख़बर होकर कोई नस-नस में संगीत महसूस करे, गाए, सिर हिलाए और दीवाना हो जाए, तो आप क्यूंकर मतवाले ना होंगे?
आपा की यही शैली तो जादू कर गई। वो गुनगुनातीं ‘चिर कड़ा साइयां दा, तेरी कत्तन वाली जीवे’ और ‘इक नुक्ते विच गल मकदी ए’, तो सन्नाटा-सा छा जाता, बस तान गूंजती और लोगों की तालियां।
दो-चार साल, दस-पंद्रह साल की बात होती, तो गिनीं भी जातीं मज़लिसें, अवार्डों की लिस्ट बनाते, रिसालों और ख़बरों के हवाले देते पर अब चालीस बरस से भी ज्यादा का वक्त गुज़र गया, आबिदा की मशहूरियत का क्या तज़िकरा करें? आबिदा अब भी ज़ोश से भरपूर हैं। वो ‘जब से तूने मुझे दीवाना बना रखा है, संग हर शख़्स ने हाथों में उठा रखा है’ जैसे कलाम सुनाकर दीवाना बना देने में कामयाब हैं।
हफ़्ता भर पहले आपा दिल्ली में थीं। एक मुख़्तसर-सी गुफ़्तगू के दौरान वो जब बोलीं तो बेधड़क बोलीं—मेरी समझ में तो शरीयत से भी पहले सुर आते हैं। और हैरत भरी नज़र से तकते पाया, तो बताने भी लगीं—मियां, मुझे लगता है कि किसी इंसान ने ये सुर नहीं बनाए। इनमें सारी कायनात की आवाज़ ही शामिल है। देखो, शरीयत में भी तो कहा गया है कि अजान सुरीले तरीके से पढ़ें।
बात हिंदुस्तान-पाकिस्तान के रिश्तों की रटी-रटाई डोर की ओर बढ़ी, तो सदाबहार मुस्कान के साथ कहने लगीं—अल्लाह कभी मोहब्बत की मुखालफत नहीं करता और इबादत दरअसल मोहब्बत ही है। जिसे हम आलाप कहते हैं, वो और क्या है… दरअसल अल्लाह…आप ही तो है।
आबिदा यक़ीनन रश्क करने लायक पर्सनेलिटी हैं। अलमस्त भी और कामयाब भी। मासूम ऐसी हैं, ज्यूं कोई ताज़ा जन्मा बच्चा। किशोरी अमोनकर, परवीन सुल्ताना, उस्ताद बड़े गुलाम अली खान और उस्ताद अमजद अली खान जैसों को सुनती हैं, तो घंटों रोते हुए बिताती हैं। कोई देखे, तो क्या सोचे—इतनी बड़ी सेलिब्रिटी और ऐसा दीवानापन. लेकिन कौन बताए—जो प्योर ना होगा, वो मिलावटी ही तो गाएगा-सुनेगा।
आबिदा के लिए हिंदुस्तान-पाकिस्तान दो मुल्क नहीं हैं। वो तो बस इस पार से उस पार, उस पार से इस पार आती-जाती रहती हैं, नफ़रत की जंज़ीरें तोड़कर नेह का प्रसाद बांटने। आपा अक्सर हंसती हैं, जब नहीं हंस रही होती हैं, तो खूब मुस्कराती हैं। खुशी किसी क़दर बिखरने ना पाए, इसका ज़बर्दस्त ख़याल उन्हें है और पॉज़िटिव स्पिरिट—उसके तो कहन  क्या। किसी ने एक बार पूछा—हिमेश रेशमिया कैसा गाते हैं, तो आपा झट बोल पड़ीं—उसकी आवाज़ में दर्द है। इसे कहेंगे विनम्रता, सकारात्मकता और बड़े गायक की कद्रदानी। नुसरत फ़तह अली ख़ान के अलावा, आबिदा की सीडीज़ सारी दुनिया में खरीदी-मंगाई जाती हैं। यूं, जहां नहीं मिलतीं, वहां के लोग भारत-पाकिस्तान आने वालों से कहते हैं, सुनो मियां—जा रहे हो तो मिरे लिए आपा की फलां सीडी लेते आना। बहुत छुटपन में हरिद्वार या इलाहाबाद जाते वक्त लोगों को गंगाजल लाने की बात कहते सुना था। गंगाजल मुक्ति दिलाता है, तो आबिदा की आवाज़ भी ऐसी ही है—हर दर्द से मुक्ति दिला देने वाली, सो इस मांग पर हैरत की बात कहां!

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