Home » विचार, है कुछ खास...पहला पन्ना

शांकुतलम् के बंद होने का मतलब…

12 April 2012 One Comment

– देवाशीष प्रसून

शाकुंतलम थियेटर बंद हो गया है। यह दिल्ली के प्रगति मैदान जैसी शांत जगह पर पिछले तीन दशकों से लगातार चल रहा था। शाकुंतलम थियेटर, याने सिनेमाघरों के बीच शांत स्वभाव के मध्यवर्गीय, सभ्य, पढ़े-लिखे लोगों की पहली पसंद। भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत चलने वाले इंडिया ट्रेड प्रोमोशन ऑर्गनाइजेशन का प्रबंधन इसको और चलाते रहने की जरूरत नहीं समझता और इस कारण से इसको बंद करके कॉनफ्रेंस हॉल बनवाना चाहता है। जो लोग दिल्ली में नहीं रहते और शाकुंतलम थियेटर से वाकिफ नहीं हैं, उन्हें बता दूं यह आमलोगों की नजरों में प्रगति मैदान की पहचान रहा है। अगर यह हॉल किसी कंपनी या सेठ की जागीर होता तो अलग बात थी, लेकिन एक सरकारी सिनेमाघर का यूं बंद हो जाना तकलीफदेह तो है ही, साथ में कई और सवाल भी उठाता है।

दिल्ली में दर्जनों सिनेमाघर हैं, पर मध्यवर्ग के लिए आज की तारीख में सिनेमा देखना बहुत मुश्किल हो गया है। कई परदों वाले मल्टीप्लेक्स इतने महंगे होते हैं कि इनमें एक बार सपरिवार सिनेमा देखने का मतलब है – महीनेभर के बजट को चुनौती देना। … लेकिन सिनेप्रेमियों के राहत के लिए कुछ आसरे अब भी राष्ट्रीय राजधानी में मौजूद हैं, जहां नई-पुरानी फिल्मों का मजा लेना जेब पर ज्यादा असर नहीं डालता। कनॉट प्लेस में अब तक मौजूद दिल्ली का सबसे पुराना सिनेमाघर रीगल और दरियागंज में गोलचा ऐसे ही सिनेमाघर हैं। शाकुंतलम थियेटर गत 1 अप्रैल से पहले तक इस फेहरिस्त में शामिल था।

शाकुंतलम थियेटर बंद होने की खबर पहले-पहल मिली तो लगा एक शिगूफाभर है, पर जब पता चला कि इसे आखिरकार बंद कर ही दिया गया है तो यह बड़ा धक्का था। धक्का इसलिए नहीं कि मित्रों के साथ अच्छा समय बिताने के लिए आदर्श व अच्छी जगहें धीरे-धीरे करके या तो महंगी होती जा रही हैं या बंद… बल्कि इसलिए क्योंकि सरकार की नीति ऐसे पब्लिक डोमेन को खत्म करने की दीख रही है। दिल्ली के ही कनॉट प्लेस में एक कॉफी हाऊस है, इसे भी बंद करने का शिगूफा समय रह-रह कर सामने आता रहता है। मैं पूछता हूं, जिसके खीसे में पैसा नहीं है, क्या सरकार उन्हें पब्लिक डोमेन से वंचित करना चाहती है?

141 एकड़ में फैला है प्रगति मैदान, आए-दिन इसमें तरह-तरह के मेले लगे रहते हैं, हर साल करोड़ों-अरबों का वारा-न्यारा होता है और इसका प्रबंधन कहता है कि हम शाकुंतलम थियेटर पर बेजा खर्च क्यों करें, जबकि प्रगति मैदान में इसके होने से उन्हें कोई फायदा नहीं? बेजा खर्चों का एक लंबा चिट्ठा बनाया जा सकता है, अगर कहें तो। वैसे भी ट्रेड प्रोमोशन के लिए राजधानी में 141 एकड़ जमीन का परिसर, बेजा नहीं और तो क्या है? इंडिया ट्रेड प्रोमोशन ऑर्गनाइजेशन को मिली हर सुविधाओं का यूटीलिटी ऑडिट होना चाहिए – जमीन, फंड और स्टॉफ सभी का।

और सरकारी उपक्रमों में घाटे के कारण आम लोगों की सुविधाओं को खत्म करने की बात कोई करे ही मत। सरकार का मतलब कोई व्यापार-धंधा नहीं है कि लाभ नहीं हो रहा है तो बंद कर दिया। और तो और, सरकारी उपक्रमों में यह घाटा अक्सर सौ-फीसदी नियोजित ही रहता है। अकर्मण्य, खुराफात और भ्रष्ट कर्मचारियों की साजिश, जिनमें सामान्यतः निजी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों से सांठ-गांठ कर उनको लाभ पहुंचाने के लिए एक सरकारी उपक्रम में लचर व्यवस्था बनाई जाती है और बेजा बोझ पड़ता है जनता पर। सरकार निवेश करती है लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए, राजकोष भरने के लिए नहीं। सरकार में काबिज लोग अपनी तुलना कंपनी के प्रबंधकों से करने लगते हैं और भूल जाते हैं कि निजी कंपनी का प्रबंधन मालिकों का खजाना भरने के लिए होता है, पर सरकारी कंपनियों का प्रबंधन धन को असरकारी ढ़ंग से खर्च करने के लिए। बैसिक फिलॉसफी ही अलग है।

सरकारी उपक्रमों में लाभ-अलाभ सोचने की मानसिकता बहुत घातक है। अगर यही मानसिकता रही तो भविष्य की पीढ़ी कह सकती है कि संसद पर बेजा पैसा खर्च क्यों हो रहा है, इसे बंद करो, यहां मॉल खुलना चाहिए। ऐसा हुआ तो मत कहिएगा कि आगाह नहीं किया।

(लेखक अहा! ज़िंदगी पत्रिका के सीनियर कॉपी एडिटर हैं)

One Comment »

  • ashok kaushal said:

    nice see ur article,keep it up.
    thanks