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अलिखित कविताएं / डॉ. दुष्यंत

29 March 2012 No Comment

डॉ. दुष्यंत

मेरी कुछ कविताएं कभी नहीं लिखी गईं
उनका लिखा जाना अब नामुमकिन लगता है
जिन्हें छोड दिया था, मैंने किसी और दिन के लिए
या यह कहकर कि पकना है इन्हें
ऐसे ही थोडे कविता हो जाती है
पकती रही हैं वे सब कई सालों से
कई सालों उनके साथ रहा हूं, सोया हूं, खाया हूं, पीया हूं, उन्हीं के साथ जीया हूं
वे कविताएं होती तो जीना शायद आसान हो जाता
या कि उनका जन्म लेना भी ना होता जेहन में
तो और भी ठीक होता मेरा जीवन
वे पकती रही जैसे पकती है खेत में फसलें
और मौसमों के साथ उनपे कई रंग दिखते हैं
कभी सर्दी की बरसात उनकें पकने को चुनौती देती हैं
मेरी वे कविताएं किसी महानगर का वह चौराहा है जहां रूमानी ख्वाबों की कई दुकानें सजती हैं
मेरी वे अधूरी कविताएं कोई झंडा नहीं उठाती … झंडा उठाने पर डंडे का डर रहता है
मेरी डरी सहमी कविताएं अब ख्वाब नहीं देखतीं, अपने जीवन का भी नहीं
अपने जीवन के इस विराट उत्सव का वह किसी को धन्यवाद भी नहीं देती, ना शिकवा ही करना चाहती हैं
शिकवा भी कमजोर लोग करते हैं, जमाने के हारे हुए लोग निरीह शब्दों में शिकवा करते हैं…
कोई उन कविताओं को सुनने का ख्वाहिशमंद भी नहीं बचा अब तो..

वे कविताएं जीने और मरने के बीच में कहीं हैं ..
कायदे से जीना हुआ नहीं तो मरना कैसे होगा ?

कवियों को कविताएं सुख देती हैं, रचने का सुख, कभी बचने का सुख
कभी नाम का सुख, कभी जाम का सुख

मेरी कविताएं बेहिसाब खुशी की कविताएं हो सकती थीं अनंत दुख की भी
मेरी वे अलिखित कविताएं मुझसे कोई सवाल नहीं करतीं
सवाल करने वालों का हश्र जानती हैं …
सवाल किया जिन्होंने उनका क्या हुआ
उनके जवाब क्या मिल गए
उन्हें उन जवाबों ने क्या धरती को बेहतर दुनिया का ख्वाब देखने का कोई हौसला दिया था
जवाब काफी थे क्या?
मेरी कविताएं हारी नहीं हैं, जीत की उम्मीद भी छिन गई है तो क्या हुआ ?
‘आखिर जीत सच की होती है’ मेरी अलिखित कविताओं का ऐसा कोई विश्वास नहीं है..
‘चुपचाप सहने से चीजें बिगडती हैं’ मेरी कविताओं ने बरसों ऐसा मान के क्या उखाड लिया था?

क्रांति के सपने देख के भी कुछ हुआ था क्या?
सरोकारधर्मी सेमिनार सुन के क्या हुआ?
मेरी कविताएं लिखी जाने को अभिशप्त थीं!
उस अभिशाप से इस सदी ने मुक्त कर दिया …
अलिखित कविताएं अजन्में बच्चों सी नहीं होती हैं!

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