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पंद्रह साल पुरानी कविता / चांद और सागर

15 June 2011 3 Comments

कहते हैं, कागज़ की उम्र ज़रा-कम ही होती है। यक़ीनन… लेकिन एहसासों की? सो, ऐसे ही है ज़िंदगी। तब, शायद बीए का स्टूडेंट था, सो पहले-पहले इश्क के फेर में पड़के एक लंबी-सी कविता लिख मारी। लंबे वाले, पीले, रफ़ और फेयर के बीच वाले किसी रजिस्टर के तीन-चार पन्नों में लिखी ये कवितानुमा बकवास. मामला बस इतना ही कि कन्या का नाम चंद्रमातुल्य था, अब सीधे तो चिट्ठी लिख नहीं सकते थे, सो कविता लिखी। कविता में चांद के सारे गुण-अवगुण-उलाहने सब शामिल थे। हमें यह भी बताना था कि कविता हमारी ही है, सो तब के एक निकनेम, यानी तखल्लुस का भी पूरा हवाला दिया–सागर। दोनों, यानी मून एंड सी की रिलेशनशिप पर आध्यात्मिक रिसर्च भी किया। ये कविता तब कॉलेज मैगज़ीन में भी छपी थी।
उस लव-इश्टोरी का क्या हुआ, ये तो टॉप सीक्रेट है, लेकिन कविता के बारे में इतना कि …
बाद में बदलती नौकरियों और नए-नए मिलते शहरों के साथ किसी ट्रंक-सूटकेस-पर्स में वो पुराने रजिस्टर के पन्ने भी चलते रहे। बीते दिनों, जयपुर में नए ठिकाने के तहत, आते वक्त कहीं ये पन्ने मिल गए, सो उन्हें जब में ठूंस लाया। एक तो चौदह-पंद्रह साल पुराने पन्ने और उस पर भी जेब में ठुंसे रहने की मज़बूरी… कागज़ धसक गए। तरह-तरह से, जगह-जगह से फट-फुट गए। कविता पूरी तरह नष्ट हो जाए, इससे पहले ही इन पर लिखी कवितानुमा चीज टाइप कर ले रहा हूं। पढ़िए, अच्छी लगे तो तारीफ कीजिएगा, नहीं तो आलोचना ही झेल लेंगे… चण्डीदत्त शुक्ल

चंदा!
सुन जरा,
देख मुझको
बहुत तेज हो गई हैं
धड़कनें / दिल की.
पहचाना-?
मैं हूं विशाल सागर
वही जलधि
जिसकी धृष्टता का सानी नहीं
राम तक को नहीं दिया मार्ग
किंतु, आज हे चांद
तेरे आगे गया हूं झुक
मेरी लहरें जैसे सो गई हैं
तेरा शीतल परस पाकर…
जानती हैं ना वो,
तेरा-मेरा युगातीत संबंध
हां, मैं तो तेरा सृजन बिंदु हूं
तूने जन्म लिया है मुझी से
लेकिन आज / चाहता हूं
एक नया संबंध.
आकर्षण के पुराण में
एक और जोड़े की कथा जोड़ने को
मचल उठा है मन.
लोग कहते हैं कि-
हम-तुम नर हैं
क्या भला हो
बन जाएं नर-मादा.
आओ, बना लें, देख लें, सोच लें
प्रकृति और पुरुष का समन्वयकारी दृश्य.
तुम्हें तो मालूम है चंदा
ज्वार मन में आता है
मेरी लहरें तुम्हें छूने को उमड़ती हैं
जब तुम पूर्णिमा का चांद बनकर
आते हो आकाश में, छा जाते हो
लेकिन जब तुम / आंखें चुराकर
हो जाते हो गायब…
तब ही तो जीवन में छा जाती है अमावस
सब को समेट लेने वाले सागर का दिल भी,
लगता है बैठने.
लहरें पिछड़कर करने लगती हैं
मानों, जीवन से ही पलायन
दुनिया–
संयोग और वियोग के इसी क्रम को कहती है
ज्वार और भाटा
वो क्या जाने…
मेरे-तुम्हारे जन्म-जन्मांतर के रिश्ते को
कौन बताए उसे
अब तो समंदर की फेनिल लहरें ही करेंगी
शांत, चांद के उत्ताप को
तो आओ चंदा

(कुछ पंक्तियां वक्त की मार की शिकार हो गईं)

आ जाओ विस्तीर्ण सिंधु भुजपाश में
सदियों से धधक रही है
बड़वाग्नि, अंतर में…
बहुत हो चुका ग्रहण तुम्हारा
अब समाज की टोकाटोकी से ना डरो
मंदराचल पर्वत की विशाल कंदरा से उगते हो तुम
पर
किसको ये लगता है…


जिसने भी देखा
सोचा
उगे तो तुम मेरे दिल से
डूबे भी मुझ में ही


मत देना धोखा,
बृहस्पति की तरह मुझे,
कहीं मेरी भी आह तुम्हें ना कर दे
एक बार फिर शापग्रस्त.
वैसे ही,
कितनी कष्टदायक तुमसे यह दूरी
मेरे दिल से अक्सर निकल जाती है
एक… गर्म… सिसकी
मैं जानता हूं, तब तुम भी हो द्रवित
खुद का स्वरूप खोने लगते हो.
दिन प्रति दिन
अपने-आप में
महसूस करते हो संकुचन,
लेकिन…
जैसे-दैसे मुझसे मिलने का उत्साह
आता है तुममें
नवोढ़ा नायिका की तरह हो जाते हो
यौवन से परिपूर्ण…

प्रतिपदा से पूर्णिमा तक के इस चक्र को
यह संसार हो चमत्कृत,
तुम्हारी प्राकृतिक दशा मान बैठता है.


चांद सच कहूं
तुम्हारी सुंदरता निहारते
मेरी आंखें हो गईं सुंदर
तुम्हें असुंदर कहने वाले
नहीं कर पाते मेरी आंखों का सामना
मैं चला हूं बनने
शिव से भी महान
वे तो दूज का चांद पाकर
ही हो गए धन्य
मुझे तो चाहिए / पूरा चांद
पूरी गरिमा और आभा के साथ
तब तक थमा है, यह समंदर,
शांत
सारे तूफान को समेटे
जल्दी आओ, अपना पूरापन लिए
मिल जाएं हम
लिख दें, रच लें
सृजन-संयोग का
एक नया इतिहास…

3 Comments »

  • Tripurari Kumar Sharma said:

    अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिता लें,
    कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए है…

  • Kosha G said:

    ab to chand bhi pass phir kis ki aas haiiiiiii…

    chhu lo sagar tum us chand ko jis ki tumhe pyas haii…

  • PRADEP SRIVASTAVA said:

    BAHUT SUNDAR

    UVAVASTHA KII BAT HI KUCH AUR HOTI HAE.

    BADHAI.
    PRADEEP SRIVASTAVA