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वे मुस्करा रहे थे, गम छुपा रहे थे

11 June 2011 No Comment

उन्होंने मकबूल को पास से देखा, उनके काम को और क़रीब से महसूस किया। खासे यारबाज़ इंसान, बेहतरीन पत्रकार और कई फ़िल्मों की राइटिंग से जुड़े रामकुमार सिंह ने फिदा की विदा के बाद ये भावांजलि चौराहा से शेयर की है, इसके लिए उनका शुक्रिया। रामकुमार सिंह बेहतरीन पत्रकार हैं और उनका ब्लॉग अच्छी चीजें पढ़ने-सोचने के लिए खूबसूरत जगह है : मॉडरेटर

रामकुमार सिंह

यह जयपुर में अप्रैल, 2004 की एक गर्म दुपहर थी और हम थिएटर में मकबूल फिदा हुसैन के साथ उनकी फिल्म मीनाक्षी: अ टेल ऑव थ्री सिटीज देख रहे थे। यह आमंत्रित लोगों का एक विशेष शो था। वे बार-बार पर्दे से कहीं ज्यादा दर्शकों के चेहरे पढऩे की कोशिश कर रहे थे। नए किस्म के सिनेमा का प्रशंसक होने के नाते मैं मुग्ध भाव से कविता की तरह बह रही फिल्म के संवाद, गीत, संगीत और विशेषकर छायांकन का लुत्फ ले रहा था। जिन तीन शहरों की कहानी इसमें थी. उसमें मैंने केवल जैसलमेर ही साक्षात देखा था लेकिन कैमरे ने पैन होते हुए फिल्म में जब जैसलमेर को दिखाया तो यूं लगा कि यह उससे भी खूबसूरत कोई शहर है, जिसे मैंने देखा है। यह तारीफ मैंने फिल्म के बाद बातचीत में हुसैन साहब से की तो वे बोले, जिन लोगों ने हैदराबाद और प्राग देखे हैं वे भी यही कहते हैं कि इन शहरों से गुजरते हुए उन्हें इतने खूबसूरत कभी नहीं लगे जितने कि पर्दे पर लग रहे थे। बेशक कैमरे पर संतोष सिवान थे, लेकिन यह एक चित्रकार की फिल्म थी और फिल्म पर उस समय विवाद थे। कोई रिलीज नहीं कर रहा था अपने स्तर पर रिलीज करने खुद राजस्थान आए थे। वे बोले, आखिर इस प्रदेश का एक शहर मेरी फिल्म का हिस्सा है और यहां इसे देखा जाना चाहिए। एक कलाकार की भावुकता का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा?

मीनाक्षी में एक ऐसा संवाद है कि सूरज की किरण की तासीर भी अजीब है, मिट्टी पर गिरती है तो उसे सुखाती है और बदन को छूकर उसे गीला कर देती है। फिल्म के संवाद लेखकों में उवैस हुसैन और एमएफ हुसैन का नाम था। मैंने उनसे पूछा, यह संवाद उवैस का है या आपका? एक बच्चे की तरह शर्माते हुए और प्रफुल्लित होते हुए वे बोले, यह वाला मैंने लिखा है। उनकी सफेद दाढ़ी से ऊपर निकले गालों पर एक हल्की सी लालिमा थी। बहरहाल. वे इस बात से खुश थे कि आप लोग इस फिल्म को समझ रहे हैं। मुझे करोड़ों लोगों को नहीं दिखानी. लेकिन एक वक्त आएगा जब हम धीरे-धीरे सिनेमा की नई भाषा ईजाद करेंगे। आज हम देख रहे हैं कि सिनेमा में धीरे-धीरे कुछ मूर्त और अमूर्त बिंब आ रहे हैं। यह भारतीय दर्शकों के लिहाज से समय से पहले का सिनेमा था। आज युवा फिल्मकारों की पीढ़ी सिनेमा में अपना मुहावरा ईजाद कर रही है तो मुझे हुसैन याद आते हैं जो अपनी उम्र के बावजूद अपनी सोच से बेहद युवा थे।

हुसैन टहलते हुए थिएटर के बाहर खुले चौक में नंगे पांव घूम रहे थे। फर्श बेहद गर्म था और उनके चेहरे पर मुस्कान। यह मेरे खयाल से उनके भारत में होने का सबसे बेहतरीन बिंब था कि उनके चलने के लिए जमीन बहुत गर्म थी फिर भी वे मुस्करा रहे थे। उनके चित्रों और विवादों का नाता तो पुराना था। इस माहौल में भी बहुत से संगठनों की धमकियां थीं कि वे फिल्म नहीं चलने देंगे। हिंदुवादियों की अपनी जिद थी और कुछ मुस्लिम संगठनों को फिल्म के एक गाने को लेकर विवाद था जिसे खुद हुसैन ने लिखा था। देशभर में फिल्म के प्रदर्शन को लेकर असमंजस था। इस पूरे घटनाक्रम से वे भीतर से बेहद आहत थे। वे बोले, कोई आदमी मेरी फिल्म नहीं दिखाना चाहता। कोई झगड़े में नहीं पडऩा चाहता। इसलिए मैं खुद इसे रिलीज कर रहा हूं। मुझे यकीन है, एक दिन हमारे देश में लोग अपने आपको अभिव्यक्त करने की आजादी का मतलब समझेंगे।

बाद के सारे ही घटनाक्रम बेहद दु:खद रहे, जो सभी जानते हैं। मैं सिर्फ यह जिक्र करना चाहता हूं कि जिस गुजरात के म्यूजियम्स में उनकी पेंटिग्स पर हमले हुए, उस गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और एमएफ हुसैन का जन्म दिन १७ सितंबर ही है और दोनों विचारों के दो छोर पर खड़े हैं और इसके तर्क भी निश्चित रूप से अंकशास्त्रियों के पास होंगे कि सन भले ही अलग हो लेकिन एक तारीख को पैदा हुए लोगों को इतिहास दो अलग-अलग कारणों से क्यों याद करेगा? मुमकिन है, कला, अभिव्यक्ति और संवेदनाओं के प्रति निष्ठुर लोगों की नजर में हुसैन खलनायक रहे होंगे, लेकिन सच तो यह है कि हमारे इतिहास में एक बात हमेशा अमिट रहेगी कि सत्ता के लिए भारत माता की झंडाबरदारी करते हुए सुख भोगने और अपनी जमीन से निर्वासित रहते हुए देह त्याग देने में कितना फर्क होता है? कतर की नागरिकता लेने के बावजूद हुसैन अपने देश लौटना चाहते थे। इतिहास ही एक दिन आने वाली पीढियों को बताएगा कि इस दौर में शिकारी कौन थे और शिकार कौन हुआ?

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