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एंड द अवार्ड गोज़ टू दबंग…

23 May 2011 No Comment

मयंक खुद्दार हैं और इसका उन्हें कोई गुमान नहीं…वो कहते हैं ईमानदार होना विशिष्टता कैसे? ईमान क्या दुर्लभ चीज है? अगर हो ही गयी है तो म्यूज़ियम में क्यों रखें? सच बोलता हूं क्योंकि सच्चा हूं। सर झुकाता नहीं हूं, न ही झुकाऊंगा। फिलहाल तक यही सोचा है कि कटने की नौबत आने पर भी नहीं। खुद्दारी, सच और मुफ़लिसी का नाता ब्लाउज़ और बटन जैसा है….सो मयंक महीनों तक बेरोज़गार भी रहे हैं पर मजाल जो भूख घुटने झुका दे….मयंक फिलहाल बारोज़गार हो गए हैं…लेकिन जियो मर्दवा बहुतेरे शुभचिंतकों की ऐसी तैसी करते हुए मुलायम होने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं…तो मियां आग, सॉरी मयंक सक्सेना का ये एक और लेख…और इस बार शुक्रिया बिल्कुल नहीं क्योंकि अब वो चौराहा का औपचारिक हिस्सा हो गए हैं, जिस बारे में औपचारिक घोषणा शीघ्र ही…चंडीदत्त शुक्ला, मॉडरेटर, चौराहा


58वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा होती है और दबंग नाम की एक फिल्म को सर्वश्रेष्ठ मनोरंजक फिल्म का पुरस्कार मिलता है। आपको शायद इस पर खुशी हो पर मुझे चयन समिति की योग्यता पर शक़ होता है, पहली बार सुनने में तो ये मज़ाक सा लगता है लेकिन सामने एक टीवी समाचार चैनल इसकी पुष्टि कर रहा है। एक भ्रष्ट पुलिस वाले को दबंग बताती और सलमान खान की बेहूदी एक्टिंग से भरी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार, हमारी राष्ट्रीयता पर गर्व का नहीं विमर्श का मौका है। लेकिन कैसा विमर्श, ये वही देश है जहां आर्थिक अपराधी संत सिंह चटवाल और नीरा राडिया के ज़रिए राजा को घोटालेबाज़ बना डालने वाले रतन टाटा को पद्म पुरस्कार दे दिए जाते हैं, टाटा तो शायद अगर ये घोटाला न सामने आता तो भारत रत्न भी बन जाते।

ये वाकई समय है भयंकर विमर्श का कि क्या वाकई हम एक पॉपुलिस्ट संस्कृति वाले राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। एक ऐसा राज्य जहां देखा-देखी और केवल लोकप्रियता के आधार पर वो सब कुछ भी किया जाएगा जो नहीं होना चाहिए। क्योंकि किसी को तीन करोड़ लोग धर्म की अफ़ीम खा कर भगवान मानते हैं, जिसमें बड़े नेता, अभिनेता और क्रिकेटर शामिल हैं तो इसलिए उस पर लगे तमाम आरोपों को दरकिनार कर उसे भगवान मान लिया जाए। किसी के तमाम अपराधों को किनारे करते हुए केवल उसे अस्पताल और स्कूल खुलवाने के लिए समाजसेवक मान लिया जाए। दबंग दरअसल अपवाद नहीं है, हमारे सार्वजनिक जीवन के खोखले नायकों की ही तरह इस फिल्म में भी एक नायक है जिसकी एक फ़र्ज़ी रॉबिनहुडाई छवि बना दी जाती है गोया वो वाकई महान हो।

दबंग का नायक फिल्म में एक जगह साफ़ साफ़ कहता है कि हम आधे रॉबिन हुड हैं क्योंकि हम अमीरों से पैसे लूटते ज़रूर हैं पर गरीबों में बांटते नहीं। किस तरह का संदेश था फिल्म में, क्या वाकई इस लायक कि उसे राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जाए। कई साहेबानों को आपत्ति होगी कि अरे भई मनोरंजक फिल्म का पुरस्कार मिला है, न कि सर्वश्रेष्ठ फिल्म का तो फिर हमें बिना शक़ ये भी चर्चा करनी होगी कि आखिर मनोरंजन क्या है? किस तरह के मनोरंजन की बात करेंगे हम, क्या मनोरंजन स्वस्थ होना चाहिए या बिना सर पैर की किसी भी बकवास को मनोरंजन के नाम पर परोसा जा सकता है? फिर ऐसे में आप केवल हिंदी के समाचार चैनलों को क्यों कोसें, वे भी बिना सोचे समझे ख़बरों को मनोरंजक बना रहे हैं। थ्री यूसेज़ ऑफ़ नाइफ़ में डेविड मैमे कहते हैं कि, “जब आप थिएटर में घुसें तब आपको यह कहने में सक्षम होना चाहिए कि, “हम यहां एक संवाद में आए हैं, ये जानने के लिए कि हमारे आस पास की दुनिया में क्या क्या हो रहा है” और अगर थिएटर से बाहर निकलते पर हम ये कह पाने में सक्षम नहीं है तो हम कला की जगह केवल मनोरंजन लेकर निकले हैं और वो भी घटिया दर्ज़े का मनोरंजन”

ऐसे में जब आप दबंग जैसी विचारहीन फिल्म को सर्वश्रेष्ठ मनोरंजक फिल्म का पुरस्कार देते हैं तो देश में उस साल बनी तमाम बेहतर, स्वस्थ, विचारवान, दिशावान और स्तरीय फिल्मों को दरकिनार कर के दबंग टाइप सिनेमा को राष्ट्रीय मनोरंजन का मानक घोषित कर रहे होते हैं। सवाल ये है कि आखिर किस तरह के नागरिक चाहते हैं हम, क्यों आखिर राष्ट्रीय पुरस्कारों में भी फिल्मफेयर सरीखी घटिया पसंद अपनाई जाती है। क्या यहां भी लॉबीइंग आ गई है, क्या हमें भ्रष्ट पुलिसवाले चाहिए, जो कभी भी किसी का भी एनकाउंटर कर के उसे जायज़ ठहराएं। क्या हम गुजरात में बंजारा को सलमान खान वाले मानकों पर तौलेंगे, क्या हम तमाम आईपीएस का घूस लेना बर्दाश्त करेंगे, क्या हम पुलिस थानों में शराब की भट्टियां लगाने और पुलिसकर्मियों के ड्यूटी पर नशे में झूमने की कवायद शुरु करेंगे या फिर महिलाओं के लिए वाकई अपमानजनक गीतों (मुन्नी…) का सस्वर पाठ करेंगे? और अगर हम इस सब के समर्थक नहीं हैं तो कैसे दबंग हमारे राष्ट्रीय मनोरंजन का पैमाना बन सकती है? माफ़ कीजिएगा पर अगर दबंग हमें मनोरंजित मतलब खुश करती है तो हम एक अपराधी, मनोविकृत और सामंती पुरुषवादी समाज बनने की ओर बढ़ रहे हैं, जहां समता, मूल्यों, ईमानदारी और महिलाओं के लिए सम्मान जैसी कोई चीज़ नहीं होगी।

दबंग के पहले की इस पुरस्कार से पुरस्कृत फिल्मों पर हम जब नज़र दौडाते हैं तो हम पाते हैं कि पुरस्कृत लगभग हर फिल्म दबंग से न केवल कई गुना बेहतर थी बल्कि बेहतर कंटेंट, स्तरीय अभिनय और कम से कम एक संदेश से जुड़ी हुई वो फिल्में थीं जो हमारे वक्त की हक़ीक़त हमें बताती थी और हमें उद्वेलित कर रही थी। इन फिल्मों की सूची में 3 इडियट्स, लगे रहो मुन्नाभाई, चक दे, रंग दे बसंती, ऑटोग्राफ(तमिल), लगान, माचिस, गीतांजलि(तेलुगू) और कोरा कागज़ जैसी फिल्में थीं। इनमें से किसी भी फिल्म से दबंग की तुलना कर के देखें तो आप पाएंगे कि या तो दबंग को ये पुरस्कार दिया जाना विसंगति है या फिर इन सारी फिल्मों को दिया जाना। दरअसल ये पुरस्कार पूरे सरकारी तंत्र के दोषपूर्ण क्रियान्वयन के एक और उदाहरण के तौर पर देखे जा सकते हैं, जहां हर काम केवल जनता को लुभाने के लिए तो हो सकता है पर उसे जगाने के लिए नहीं। ये प्रवृत्ति हमारे समाज के हर हिस्से में पाई जाती है, हमारे यहां लोकप्रिय शिक्षा केवल नौकरी पाने के लिए है, कानून केवल सज़ा देने के लिए, लोकप्रिय सरकारें केवल बने रहने के लिए और ऐसे ही लोकप्रिय फिल्में केवल सस्ता मनोरंजन देने के लिए। आप हैरान नहीं होते हैं जब मुन्नी जैसे नम्बर वाली फिल्म, थाने में शराब बहाती फिल्म, इतनी गोलियां मारूंगा जैसे सम्वादों वाली और भयंकर हिंसा से भरी फिल्में आपके घर के नन्हे बच्चे भी देखते हैं और इन्हें बिना पीजी प्रमाणपत्र के रिलीज़ कर ऊपर चेंप दिया जाता है, महान पारिवारिक फिल्म। जब ब्लू अम्ब्रैला सरीखी बच्चों की फिल्में बनती हैं तो आप उन्हें अपने बच्चों को दिखाने की ज़हमत नहीं उठाते हैं और तमाम बेहतर फिल्में बनाने वाले फिल्मकार अंततः अच्छे सिनेमा से या फिर सिनेमा से ही तौबा कर लेते हैं। लेकिन उससे बी बड़ा सवाल कहीं न कहीं ये है कि आखिर कैसे सरकारी तंत्र इस तरह के सिनेमा को महिमामंडित कर सकता है।

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हम में से ज़्यादातर या तो इस पुरस्कार के समर्थन में होंगे या उन्हें इससे फ़र्क नहीं पड़ता होगा और दरअसल सरकारें भी तो यही दशा बनाए रखना चाहती हैं कि या तो सिनेमा केवल सतही मनोरंजन परोसे या फिर उसके होने या न होने का फ़र्क ही न पड़े। ज़्यादा न भी कहूं तो सितम्बर में बहसतलब में फिल्म के निर्देशक अभिनव के बड़े भाई और प्रसिद्ध निर्देशक अनुराग कश्यप से बात करते हुए दबंग के ज़िक्र पर अनुराग ने मुझसे जो कहा वो आपको बताता हूं। अनुराग ने स्पष्ट कहा कि, “फिल्म की शुरुआती स्क्रिप्ट बिल्कुल अलग थी, शायद काफी संजीदा…लेकिन सलमान को अभिनेता और अरबाज़ का निर्माता बनाने के अलग साइड इफेक्ट्स होते हैं…उनकी शर्तों पर फिल्म बनती है…और वो कितने बौद्धिक होते हैं….इस पर फिल्म का संजीदा होना निर्भर करता है…तब आप शायद केवल मुनाफ़ा कमाने के लिए काम करते हैं…मैं अभिनव से अपनी तरह फिल्म बनाकर और घाटा सहने को नहीं कह सकता…हालांकि मैं उस अभिनेता को लेकर फिल्म भी नहीं बना सकता जिसे नहलाना बोलने तक सा सलीका न हो…वो नहलाऊंगा को निलाऊंगा बोलता हो…” अनुराग के थोड़े कहे को ज़्यादा समझना होगा, दरअसल हमें ये तय तो करना ही होगा कि फिल्में अगर मनोरंजन का माध्यम भी है तो सम्पूर्ण मनोरंजन की परिभाषा और उसके पैमाने क्या होंगे। क्या हम जब सम्पूर्ण मनोरंजन की बात करेंगे तो फिल्म का संदेश, कथानक और स्तर उसमें से निकाल देंगे और फिर इस आधार पर भी दबंग से ज़्याद बेहतर फिल्में पिछले साल बनी होंगी, क्यों न इस पुरस्कार का नाम बदल कर साल की सर्वश्रेष्ठ बाज़ारू फिल्म, सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म या सर्वाधिक कमाऊ फिल्म रख दें। ज़ाहिर है सरकार भी कॉर्पोरेट शैली में काम कर रही है, जो ज़्यादा कमाएगा, उसी का सम्मान होगा…बाकी कर्म करें, फल की इच्छा नहीं।



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