Home » है कुछ खास...पहला पन्ना

कभी कोई तस्वीर मुकम्मल नहीं होती

30 April 2011 2 Comments

चौराहा पर आज निधि टंडन की कविता…वो क्यों लिखती हैं, आइए, उनसे ही जानें :


लिखने में प्रसव-सी पीड़ा होती है…जब तक अंतस में विचारों के कोलाहल को शब्दों में बाँध कर उसमें जीवन का संचरण कर कागज़ पर नहीं उकेर देती, चैन नहीं मिलता है। अपने विषय में लिखने की बात पर शब्द जैसे साथ छोड़ देते हैं…जीवन की इस यात्रा के पैंतीस वसंत देख चुकी हूँ और रोज अपने में कुछ नया ढूंढ लेती हूँ…अभी तो मेरा खुद से भी कायदे से परिचय नहीं हो पाया है.हाँ,लिखने-पढ़ने का शौक है .स्नातक स्तर पर जब तीन साहित्य चुने तब पता चला कि लखनऊ विश्वविद्यालय में तीन साहित्य नहीं मिलते हैं…….तब,संस्कृत, अंग्रेजी चुने और हिंदी को उस समय मजबूरीवश छोड़ना पड़ा .संस्कृत में शोध करने के बाद कुछ वर्ष महाविद्यालय में पढ़ाया, फिर छोड़ दिया,आजकल गृहणी हूँ और अपने इस रूप से पूर्णतया संतुष्ट हूँ .संस्कृत में ,भारतीय दर्शन में शोधोपरांत सोच में अंतर आया……विचार परिपक्व हुए.आज ,हिंदी में,अंग्रेजी में टूटी-फूटी उर्दू में ……अपने सुख के लिए लिखती हूँ..मैं चाहूंगी कि मेरी रचनाएँ पढ़ कर आप लोग जो भी महसूस करें …..अच्छा या खराब, मुझे अवगत कराएं.आपको अच्छा लगा यह जान कर मेरा उत्साहवर्धन होगा और यदि आपको खराब लगेगा तो उस कमी को इंगित करके आप मेरा मार्गदर्शन करेंगे…

निधि टंडन की कविता


तुम्हें शायद एहसास नहीं

कि,जब तुमने कहा था ,

तस्वीर में मुस्कुराते हुए……

मैं बहुत अच्छी लग रही थी …….

कि

केवल तस्वीर देख कर

मैं या मेरी मुस्कराहट कैसी हैं

तुम नहीं जान सकते .

उस तस्वीर के पीछे

मैं हूँ जिसे सवेरे सारा काम निपटा कर

दरवाज़े पे ताला लगा कर

काम पे जाने में कोफ़्त होती है.

गर्मी की दोपहर में

घर वापस आकर

ताला खोलकर

खुद पानी ले कर पीने से

उदासी जो जमी होती है

बह निकलती है जिसकी आँखों से.

शाम को अकेलेपन की नीरसता

टी.वी.पर आने वाले कार्यक्रमों से भी नहीं जाती

बोझिल होती शाम भारी हो

रात में बदल जाती है,

ड्यूटी की तरह………

जिसे अपना पेट भरने भर को

कुछ पकाना होता है

उसे ,फिर मेज़ पर

अकेले बैठ निगलना होता है

और …..

…..तन्हाँ ,करवट बदलते-बदलते

नींद के इंतज़ार में

भोर हुए कहीं आँख लगती है

जो घड़ी के अलार्म से जा कर खुलती है

सवेरे,उठती हूँ

अलसाई हुई,मैं

फिर से इस जीने की यंत्रणा के साथ

पर तस्वीर में

मैं मुस्कुराते हुए बहुत अच्छी लगती हूँ

क्यूंकि

कभी कोई तस्वीर मुक्कमल नहीं होती

2 Comments »

  • Tripurari Kumar Sharma said:

    sach…

  • tejwani girdhar, ajmer said:

    वाकई, कभी कोई तस्वीर मुक्कमल नहीं होती,बहुत अच्छा लिखा है