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मैंने मंजिल को तलाशा, मुझे खूंखार मिले…

30 April 2011 No Comment

आमतौर पर हम पंकज झा को दीपकमल पत्रिका के संपादक और घोर पॉलिटिकल चिंतक के रूप में पहचानते हैं, लेकिन सियासत के गलियारों में भटकते हुए भी पंकज के दिल में जड़ों से जुड़ाव बरकरार है। उसी की मिसाल है निरुपमा पाठक हत्या-आत्महत्या कांड पर लिखा ये लेख। आपको याद तो है ना निरुपमा पाठक का नाम? मुझे लगता है, पंकज के जड़ों से जुड़ाव और निष्पक्ष रहने की उनकी जद्दोज़हद ने इस पूरे लेख को खूब उठापटक से घेर दिया है। वैसे, सवाल ज़रूरी हैं, निरुपमा की मौत के एक साल बाद भी…आइए, पढ़ें :

बिहार मूल के, लेकिन दुनिया भर में फैले मैथिल ब्राम्हणों में ‘पंजी प्रथा’ के बारे में बाहर के लोगों को शायद कम मालूम होगा. करीब सात सौ वर्षों से चले आ रहे इस पंजीकरण के माध्यम से दुनिया के कोने-कोने में रह रहे इस जाति के लोग पूर्वजों के बारे में भी जानकारी प्राप्त करते हैं. उनके अनुसार रक्त का शुद्धिकरण कायम रखना इस माध्यम से संभव होता है. हाल ही में इस लेखक को भी इस प्रथा की प्रासंगिकता के बारे में अनुभव लेकर आश्चर्य चकित हो जाना पड़ा.

छत्तीसगढ़ में रच-बस गए एक मैथिल परिवार को बेटी की शादी के लिए मूल-गोत्र पता करना था. जब वो यहाँ से सौराठ (मधुबनी) अपना ही परिचय जानने पहुंचे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा. परिवार के बारे में जितना उनको नहीं पता था उससे कई गुना ज्यादा जानकारी वहां के पंजीकार ने उन्हें दे दी. उनके पिता, पिता के पिता, उनके पिता, फिर मातृ कुल के लोगों के बारे में, किसकी शादी कहाँ हुई, कौन कहाँ किस गोत्र और मूल में ब्याहा गया था आदि-आदि.

तो समस्या केवल हरियाणा की खाप पंचायतों में ही नहीं है.उत्तर भारत के लोग भी सामाजिक परंपरा के प्रति वैसा ही लगाव रखते हैं और चाहते हैं कि उस परम्परा के अनुसार गोत्र-मूल-जाति आदि की पूरी शुद्धता कायम रखें. रंचमात्र अपवादों को छोडक़र बिना किसी खास अवरोध-विरोध के यह प्रथा आज भी कायम है. तुलसी ने मानस में लिखा भी है ‘प्रथम मुनिन्ह जेहि कीरति गाई, तेहि मगु चलत सुगम मोहि भाई’, यानी पूर्वजों ने अपने चिंतन एवं कर्म के द्वारा जिस मार्ग का संधान किया है उस पर चलना ही सुगम है। निरुपमा पाठक की मौत के बहाने हमें चीज़ों को हर कोण से देखना और समझना होगा. वास्तव में कूदकर नतीजे पर पहुंच जाना संभव नहीं है.

जिंदगी भर बिन-ब्याहे सम्बन्ध में रहने वाली अमृता प्रीतम ने भी एक किताब में लिखा है कि ‘फैसला वही लोग दे सकते हैं जो पूरा सच नहीं जानते’। वास्तव में हर कोण से सोचने पर आपके लिए कोई राय बना लेना मुश्किल ही होगा. मोटे तौर पर लोगों ने इस प्रकरण पर निरुपमा के नज़रिए से और उसमें अपनी प्रेमिका या दोस्त तलाश कर ही कुछ लिखा या सोचा है. हालांकि कहीं से भी उनका सोचना गलत नहीं है. एक संभावना से भरपूर लडक़ी का यका-यक अपने बीच से चले जाना किसको मर्माहत नहीं करेगा? अपने अंदर हृदय रखने वाला आखिर कौन होगा जो हिल ना जाए इस प्रकरण से? बावजूद इसके, सबका चिंतन इकतरफा ही कहा जाएगा. चीज़ों को समग्रता में ही देख कर आप किसी निष्कर्ष तक पहुंच सकते हैं.

आप निरुपमा में अपनी ‘बहन’ को देख कर सोचें.गिरफ्तार होकर जा रही उस महिला के चेहरे में अपनी मां को तलाशें. विवश बाप के किंकर्तव्यविमूढ़ चेहरे को, थाने में बैठे दोनों भाइयों में खुद को रख कर सोचें तब देखें, कितना मुश्किल होगा किसी एक को कसूरवार ठहराना. कानून का बिलकुल अपना तरीका है. वह अपने हिसाब से फैसला सुनायेगा भी. अगर यह हत्या है तो निश्चित ही सज़ा भी मिलेगी. पेट में पल रहे अवैध शिशु को मार डालने का भी जुर्म कायम किया जाएगा. लेकिन इस सबसे अलग हटकर आप समाज के नज़रिए से सोचें, अतिवादी नज़रिए एकांगी सोच से खुद को मुक्त करें. जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, आप व्यक्तिगत तौर पर क्या मानते हैं, क्या नहीं, इससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. लेकिन भारतीय समाज में जाति, गोत्र, मूल आदि बड़ी सच्चाई है और उससे मुंह मोडऩा इतना आसान भी नहीं है.

सामान्यत: सामाजिक परम्पराओं के मामले में क़ानून से भी न्यूनतम दखल की ही अपेक्षा की जाती है. आप देखेंगे कि हिंदुओं से अलग बाकी हर पंथ और सम्प्रदाय के लिए वैवाहिक मामले में उनकी मान्यताओं को ही क़ानून का जामा पहना दिया गया है. अलग-अलग धर्मों के अपने-अपने विवाह क़ानून इसका उदाहरण है. लेकिन हिंदुओं को ऐसी सुविधा नहीं मिली है.

आज़ादी के बाद जब मान्य परम्पराओं के उलट इस समूह पर कोई क़ानून थोपने का प्रयास किया गया तो भी लोगों द्वारा वक्त की नजाकत एवं नवाचार को अपनाने की अपनी सहिष्णुता के कारण सबको स्वीकार भी किया गया.तबके राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के विरोध के बावजूद नेहरू ने नए समाज के अनुसार क़ानून बना कर देश को सभ्य बनाने का प्रयास किया और मोटे तौर पर क़ानून और हिंदू समाज के बीच कोई खास संघर्ष का सामना नहीं करना पड़ा. जहां ‘दहेज’ को गैरकानूनी मानते हुए भी सामान्यत: कानून ने अनावश्यक दखल देना ज़रूरी नहीं समझा तो पिता की संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार होने पर भी बेटियों ने कभी उस तरह से दावा नहीं किया.

सामान्यत: इन चीज़ों में टकराव की नौबत भी नहीं आयी.आप गौर करें….जब अपने छोटे कस्बों की भारी बोर दोपहरों से झोला उठाकर निरुपमा चली होगी तो पिता का सीना गर्व से चौड़ा ही तो हुआ होगा. एक बड़े संस्थान में अपनी बेटी का एडमिशन करवाते समय कहां उस मां ने सोचा होगा कि इस झोले में वो अपनी अजन्मी-अवैध संतान को लेकर लौटेगी. दिल्ली में रह कर ढेर सारे गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने वाली पीढ़ी को उस कस्बाई शर्म से क्या लेना-देना? अपनी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हुए, एक भविष्य के मटियामेट हो जाने की संवेदना में स्वयं को भी शामिल करते हुए, उस पीड़ा की अनुभूति से स्वयं को भी एकाकार करते हुए यह ज़रूर चाहूँगा कि हम सभी अपनी भावनाओं पर थोड़ा नियंत्रण रखते हुए हर पहलू पर विचार करें.

इसी तरह जब हरियाणा के लोग अपनी खाप पंचायतों के माध्यम से एक ही गोत्र में शादी करने वाले पर कहर बरपाते हैं तो उस पर भी आखिर थोड़ा हमें सोचना ही होगा. कम से कम इतना तो ज़रूर निवेदन करना होगा कि आप आज के समाज में गोत्र-जाति आदि चीज़ों को बिलकुल खारिज नहीं कर सकते हैं. महर्षि अरविंद से लेकर गाँधी तक सबने जाति की उपादेयता भी स्वीकार की ही है. लेकिन इसका मतलब कहीं से ये नहीं है कि किसी परिवार या पंचायत द्वारा किसी की हत्या किये जाने को जायज ठहराएं. लेकिन अगर समाज की अपनी कुछ मान्यताएं हैं और वो उस पर चलना चाहता है तो आप जोर-जबरदस्ती अपना नियम लादने का प्रयास भी नहीं कर सकते.

इस हादसे के बहाने कस्बों से महानगरों तक आए लडक़े-लड़कियों को यह ज़रूर सोचना होगा कि वह बिलकुल ही अपनी जड़ से कट कर यहाँ नहीं आए हैं.मत कर गुमान इतनी परवाज पे परिंदे, आना तुझे पड़ेगा आखिर इसी ज़मीं पर. आखिर पिता के हिस्से के सपने और उनके रीति-रिवाज़ ही अपनी पीठ पर लाद कर हम किसी रेलवे स्टेशन से दिल्ली या मुंबई की ओर प्रस्थान करते हैं. निश्चित ही कई मामलों में हमारी यह पीढ़ी भाग्यशाली है जिसको अपने ढंग से उड़ान भरने का मौका मिला है. आप अगर पिता के नाम पुत्री के इस नए पत्र पर गौर करेंगे तो वास्तव में उसके बहाने मध्यवर्गीय हर भारतीय परिवार का पिता उसमें दिखेगा. धमकी के साथ-साथ अपनी पुत्री को सब कुछ माफ किये जाने का आश्वासन भी तो था उसमें. साथ ही इस मामले को नीरू के अलावा उस लड़के के नज़रिए से भी देखने की ज़रूरत है.

आखिर जिस लड़के के कारण भी उसका ऐसा छीछालेदर हुआ वह अभी कहाँ है. और यह ज़रूरी क्यू हो जैसा कि अभी एक टिप्पणी सही ही सवाल उठाया गया है कि दोषी केवल लड़की को ही ठहराया जाय? किसी भी तरह का कोई निष्कर्ष ना देते हुए भी यह आग्रह तो किया ही जा सकता है कि बेटे-बेटियाँ ये ज़रूर समझें कि माता-पिता से ज्यादा अपना भला चाहने वाले (अपवादों को छोडक़र) कोई नहीं है. फिर 22-23 वर्ष की यह उम्र ऐसी ज़रूर होती है जिसमें भले ही पेशेवर रूप में हम सफल हो गए हों लेकिन अपना भला-बुरा सोचने की ज्यादा समझ नहीं होती. एक अमृता प्रीतम द्वारा वर्णित सन्दर्भ ही याद आ रहा है जिसमें एक विदेशी कहानी के माध्यम से उन्होंने यह साबित करने का प्रयास किया है कि बहुधा हमें खुद ही पता नहीं होता कि आखिर हमें चाहिए क्या. और जब तक पता चलता है तब तक कोई विकल्प ही बाकी नहीं रहता.

अभी-अभी कोरबा (छत्तीसगढ़) से एक खबर आई है जिसमें एक पुराने जान-पहचान वाले लड़के से अभिभावक द्वारा शादी तय कर देने पर भी ऐन शादी के दिन लड़की ने आत्महत्या कर ली. 2-3 दिन पहले की ही बात है. इस लेखक की एक मित्र अपने आफिस के बारे में बता रही थी जहां ‘ब्राम्हण लॉबी’ ने उसका काम करना मुश्किल कर दिया है. तो 3-4 साल की मित्रता के बावजूद पहली बार पता चला कि वह लड़की ब्राम्हण नहीं है. तो शादी-विवाह के मामले से अलग ‘जाति’ आजकल अप्रासंगिक हो ही गया है. ये तो बुरा हो राजनीति का जिसने आज-तक जातिवाद नाम के कोढ़ को ज़िंदा रखा है. अन्यथा लोग तो शादी-विवाह के अलावा भूलने ही लगी थे इस बीमारी को.

समाज में जब-तक वैवाहिक सम्बन्ध में जाति की प्रासंगिकता बची है, तब-तक शायद निरुपमाओं को कोई निर्णायक कदम उठाने से पहले अपनी मां के उम्मीद रूपी आँचल पर गौर करना ही होगा. अपनी पीढ़ी को बहुत सी ऐसी आजादी मिली है जो पहले जन्मे लोगों को मयस्सर नहीं थी. कुछ आजादी हमें आने वाली पीढिय़ों के लिए ही सुरक्षित छोड़ देनी होगी.यही कीमत होगी शायद अपने को मिली आजादी का उपयोग करने की. लेकिन इस घटना से मर्माहत हो कर समाज से भी इतना तो प्रार्थना की ही जा सकती है कि प्लीज़ अब तो बड़े बन जाइए…..!

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