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आठ बजने वाले हैं? Live From Channel one

26 April 2011 11 Comments

(विवेक वाजपेयी `मुसाफिर’ टीवी पत्रकार हैं। उनके ब्लॉग का नाम भी है–मीडिया मुसाफिर। टेलिविजन के न्यूज  रूम को केंद्र बनाकर उन्होंने ये कहानी लिखी है और साथ में वैधानिक चेतावनी भी दर्ज कराई है–`कहानी की घटनाएं और पात्र काल्पनिक हैं इनका वास्तविकता से कोई लेना- देना नहीं है। अगर किसी पात्र या घटना से मिलान होता है, तो महज संयोग होगा। इसके लिए लेखक जिम्मेदार नहीं होगा।’ टेलिविजन की दुनिया में जाने वाले पत्रकारों के लिए तो ये कहानी वृहद अर्थों में `उपयोगी’ है ही, सामान्य दर्शकों को भी काफी तकनीकी और अंदरूनी सियासत की जानकारी देती है। कहानी में देशज गालियों का प्रचुर मात्रा में इस्तेमाल किया गया है, जो लोकतंत्र के तीसरे खंबे के वर्कप्लेस की संस्कृति को समझने के लिए काफी है : मॉडरेटर)

 

घड़ी की सुइयां तीन बजने का संकेत दे रही हैं। चैनल वन के आफिस में सुबह की शिफ्ट के लोग अपने-अपने घरों की ओर कूच करने की जल्दी में दिख रहे हैं। शाम की शिफ्ट के लोग आते जा रहे हैं और अपना-अपना काम संभालने में लगे हैं। तभी चैनल वन के न्यूजरूम में आउटपुट (खबरों का संपादकीय विभाग, जो ये निर्णय लेता है कि कौन-सी खबर प्रसारित होगी) के सीनियर प्रोड्यूसर राकेश जी प्रवेश करते हैं। राकेश जी थोड़ा सख्त मिजाज व्यक्ति हैं, लेकिन अंदर से उतने ही नरम दिल इंसान भी, यानी कि दगने के दो-चार घंटे बाद नॉर्मल हो जाते हैं। राकेश जी एसोसिएट प्रोड्यूसर मिश्रा जी से कहते हैं–कहो मिश्रा जी, कैसे हो? मिश्रा जी उत्तर देते हैं–सब ठीक है सर। असल में मिश्रा जी बहुत सीधे-सादे इंसान हैं। अपनी सिधाई के चलते कभी-कभी बेचारे मात खा जाते हैं। बहुत बार न्यूजरूम के लोगों ने देखा है, जब मिश्रा जी की गलती ना होने पर भी वो डांटे गए हैं। जब मामला कुछ गड़बड़ होता है, तो राकेश जी बड़ी चतुराई से मिश्रा जी को आगे कर देते हैं।

इतने में राकेश जी अपनी सीट पर बैठते हैं और रनडाउन पर क्लिक करते हैं (रनडाउनन्यूज बुलेटिन में खबरों के क्रम से बनता है) जो सुबह की शिफ्ट के लोग बनाकर गए हैं। रनडाउन देखते ही राकेश जी एकदम से आग बबूला हो जाते हैं और एकाएक फट पड़ते हैं राकेश जी – क्या यार चूतियापा है, इन सालों को इतना भी देखने की फुर्सत नहीं है कि कल की खबर बगैर अपडेट के पेले पड़े हैं। आखिर पूरा दिन ये लोग क्या उखाड़ते रहते हैं। इसके बाद कुछ पुरानी ख़बरों का फोल्डर देखने लगते हैं, जो वहां से नदारद है। अब तो राकेश जी एकदम से तिलमिला उठते हैं और एक ही सांस में भाई लोगों के घर वालों तक की इज्जत आफजाई में कसीदे गढ़ने से नहीं चूकते हैं। यानी कि गरियाने लगते हैं और मिश्रा जी से कहते है–यार ऐसे लोगों के साथ मैं काम नहीं कर सकता और बड़बड़ाते हुए न्यूजरूम से बाहर निकल जाते हैं।

बाहर कोने में जाकर राकेश जी उंगलियों में सिगरेट दबाए कस पर कस लगाए जाते हैं। राकेश जी जब टेंशन में होते हैं, तो उनके लिए टेंशन रिलीज करने का सबसे उत्तम साधन सिगरेट ही होती है। चैनल वन में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो हर बुलेटिन के बाद सिगरेट महरानी की सेवा लेना पसंद करते हैं और खुद को तरो-ताजा महसूस करते हैं। अब राकेश जी तनामुक्त होकर न्यूजरूम में आते हैं और सारे गिले-शिकवे भुलाकर काम में जुट जाते हैं। उधर, जिसको जो ख़बर मिली है, उसको वो जल्दी से तैयार करके रनडाउन में लगवाने की जल्दी में कम्प्यूटर की की-बोर्ड पर अपनी उंगलियां जोरजोर से पटक रहा है।

न्यूजरूम के दूसरी तरफ से आनंद जी स्टूडियो की तरफ से आते हैं। आनंद जी आनंदित कम और सख्त ज्यादा रहते हैं। आनंद जी एंकर और प्रड्यूसर हैं या यूं कहें कि चैनल के एक मजबूत स्तम्भ हैं और पुराने भी हैं। हालांकि उनकी उम्र ज्यादा नहीं हैं, लेकिन उन्हें ज्ञान का अथाह सागर कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। अब जाहिर है, जो चैनल का स्तंभ होगा, उसकी चैनल में चलती भी खूब होगी। चैनल में उनकी बात को कोई काटने वाला नहीं है, चैनल हेड तक उनकी बात मानते हैं, यानी जो कह दिया, उसमें कोई गुंजाइश का सवाल ही नहीं उठता और खबरों पर पकड़ तो गजब की है…तभी तो स्टूडियो में बैठे-बैठे आउटपुट को बताते हैं कि फलां खबर सही करो। चैनल में आनंद जी का नाम लेते ही चैनल के अधिकतर लोग यही नसीहत देने लगते हैं कि भाई उनसे बच के रहना। काम के प्रति आनंद जी बहुत ईमानदार हैं। काम को लेकर तनिक भी हीला-हवाली उनको पसंद नहीं, उनके लिए आठ बजने का मतलब आठ होता है…ना एक मिनट इधर, ना उधर।चैनल में किसी को नौकरी देने को तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन अगर उनकी नजरें तिरछी हो गईं तो बंदे की छुट्टी पक्की समझो, फिर उसको काटने वाला कोई नहीं, इसलिए चैनल में अधिकतर लोगों की उनसे फटती है। उनको देखते ही लोगों को सांप सूंघ जाता है।

आनंद जी का एक खास प्रोग्राम चैनल पर रात आठ बजे हफ्ते में पांच दिन आता है, जिसको लेकर लोगों में काफी बेचैनी रहती है। आनंद जी न्यूजरूम में बैठे नसीम से कहते हैं–और नसीम क्या हो रहा है? नसीम– कुछ नहीं सर, बताइए।आनंद जी –सुनो नसीम आज चांद पर चलना है। साफ है, आज आनंद जी का चांद पर प्रोग्राम होगा, समझे ना सब कुछ अरेंज कर लेना। प्रोग्राम समय पर चाहिए!इतना कह कर आनंद जी न्यूजरूम से बाहर निकल जाते है और एक कोने में दीवार से पैर टिकाकर सिगरेट के कस लेने लगते हैं (ये उनका पसंदीदा स्टाइल है।) और उनके दिमाग में चांद से संबंधित एक से एक बेहतर सवाल कौंधने लगते हैं। ये सब सवाल एक-एक कर प्रोग्राम के दौरान वैज्ञानिकों पर अर्जुन के तीरों की तरह बरसेंगे। उधर, नसीम जो असिस्टेंट प्रोड्यूसर हैं, चांद की सैर करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। अभी घड़ी में 6 बज रहे हैं और दो घंटे बाद प्रोग्राम चलना है।

नसीम जी भी अपने गुरू यानी आनंद जी के नक्श-ए- कदम पर हैं…भाषा से लेकर राजनीति तक में अच्छी पकड़ रखते हैं। वैसे, नसीम जी को चैनल की चलती फिरती लाइबरेरी भी कह सकते हैं। अगर आपको कोई विजुअल नहीं मिल पा रहा है, तो नसीम जी की सेवा ली जा सकती है और वो पलक झपकते ही बता देंगे–फलां टेप निकलवा लो।नसीम ने सारी स्क्रिप्टिंग कर ली है और एडिटरूम में बैठे स्टोरी एडिट कराने में लगे हुए हैं।(एडिटरूम में वीडियो का संपादन किया जाता है।) जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे नसीम के साथ वहां मौजूद एडिटरों की सांसे भी तेज होती जा रही हैं। तीन एडिटरों को नसीम जी अकेले ही संभाल रहे हैं।

तीनों मशीन के समान हाथ चला रहे हैं, स्टोरी लगभग फाइनल ही होने वाली है। इसके साथ ही वह समय आने ही वाला है, जब चारों ओर सन्नाटा छा जाता है, यानी रात के आठ बजे।इस समय को लेकर चैनल के कुछ लोग सन्डे और सैटर्डे को चुटकी लेते हुए कहते हैं–भई आज तो आठ ही नहीं बजे। अब कार्यक्रम से संबंधित सभी लोग पीसीआर प्रोडक्शन कंट्रोल रूम में पहुंच गए हैं। यहां से कार्यक्रम प्रसारित किया जाता है।

यहां की हालत इस समय काफी पतली होती है। पीसीआर में मौजूद लोगों में से दो लोगों की परीक्षा की घड़ी है। उनको सबसे ज्यादा बेचैनी है। एक तो साउंड पर आए सुरेश को और दूसरे नए लड़के विनय को, जो ट्रेनी है और उसको चैनल में आये चार-पांच दिन ही हुए हैं। उसे टी.पी चलाने के लिए भेजा गया है। टी.पी वो मशीन होती है, जिसे चलाने से एंकर खबर पढ़ता है।आनंद जी जब स्टूडियो में होते हैं, तो टी.पी. चलाना भी आसान नहीं होता है, क्योंकि आनंद जी कब-कहां से टीपी पढ़ने लगें और कब अपने आप से धाराप्रवाह बोलने लगें, कुछ कहना मुश्किल है। ऐसे में टीपी चलाने वाले का हड़बड़ा जाना स्वाभाविक है। ऊपर से उनकी दहशत, जो पीसीआर में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति के चेहरे पर साफ देखी जा सकती है।

ऐसे ही माहौल में, एंकर यानी आनंद जी का बोलने का इशारा स्टूडियो से होता है, जिसको देखते ही विनय तुरंत कहता है–एंकर ऑडियो देना और आनंद जी की बुलंद आवाज टॉक बैक से आती है–क्यों अमित क्या देर है? चालू किया जाए!पैनल प्रोड्यूसर अमित मरियल सी आवाज में–सर, अभी पहला पैकेज और स्टिंग नहीं आया है। उधर आठ बजने में करीब तीन मिनट बाकी हैं। आनंद जी कड़क आवाज में गरजते हैं–तो नसीम को बुलाओ। यहां क्या हम तमाशा करने के लिए बैठे हैं? तभी दौड़ते हुए नसीम जी पीसीआर में दाखिल होते हैं और कहते हैं–बस सर, पैकेज आने वाला है।आनंद जी–आने वाला क्या होता है, अभी तक आया क्यों नहीं, मैं कुछ नहीं जानता। दो मिनट में अगर पैकेज नहीं आया तो सभी लोग समझ लेना…और गेस्ट का क्या सीन है?नसीम–सर, पहुंचने वाले हैं।गेस्ट को बीच में बैठा लेना…चलो शुरू करो–आनंद जी ने कहा।

घड़ी की सुइयां आठ बचने का संकेत दे रही हैं और अभी तक पैकेज नहीं पहुचा है। पीसीआर में मौजूद सभी की सांसें अटकी हुई हैं। तभी टॉक बैक से आनंद जी की आवाज एक बार फिर गूंजती है–आया क्या?अमित–सर, आईटी में कुछ गड़बड़ है।आनंद जी–मैं नहीं जानता। अगर प्रोग्राम खराब हुआ तो तुम सब नपोगे।कार्यक्रम शुरू होता है और आनंद जी स्क्रीन पर कार्यक्रम का आगाज करते हैं। तभी अचानक कम्प्यूटर स्क्रीन पर देखकर चिल्लाता है पैकेज आ गया और तुरंत उसको चलाता है। नसीम जी दोबारा पीसीआर में घुसते हैं और कहते हैं–अमित, गेस्ट आ गया है, सर को बता दो।अमित आनंद जी को गेस्ट के आने की सूचना देता है और आनंद जी पैकेज के बीच में गेस्ट को स्टूडियो में बैठाने का इशारा करते हैं।

कार्यक्रम धीरे-धीरे अपने शबाब पर पहुचने ही वाला होता है कि विनय से टीपी अचानक आगे बढ़ जाती है, जिसे देखकर पैनल प्रोड्यूसर अमित चिल्लाता है–अरे यार, टीपी कहां पहुंचा दी। क्या मेरी नौकरी खाएगा।इतने में टीपी चलाने वाले नए लड़के विनय से हड़ब़ड़ी में टीपी का नेक्स्ट बटन दब जाता है और टीपी कुछ ज्यादा ही आगे बढ़ जाती है, जिससे स्क्रीन पर समय से पहले ही ब्रेक लिखकर आ जाता है, जिसे देखकर पीसीआर में मौजूद लोगों के मानों हाथ-पैर फूल जाते हैं। हालांकि आनंद जी मझे हुए पुराने एंकर हैं, इसलिए मामले की नजाकत को देखकर वह सब संभाल लेते हैं। बावज़ूद इसके पीसीआर के लोग विनय को धौंसियाने में लगे हैं–अमित, यार तू तो जाऐगा ही, लेकिन कमसे कम दूसरों पर तो रहम करो।

ब्रेक होने के बाद आनंद जी का स्वर टॉक बैक के जरिए पीसीआर में कौंधता है–टीपी पर कौन है?अमित कहता है–सर विनय है। आनंद जी–इसे टीपी चलाने की तमीज नहीं है, तो क्यों बैठा दिया? हमें चूतिया समझ रखा है, जो तुम लोगों के एक्सपेरिमेंट के लिए ऑनएयर गला फाड़ रहे हैं?विनय तो मारे डर के कांप रहा है, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा है सिवाय नौकरी जाने के। उसे बस यही लग रहा है कि एक तरफ कार्यक्रम खत्म होगा और दूसरी तरफ उसकी नौकरी…उसको अब कोई बचाने वाला नहीं है। वह मन ही मन इस उधेड़बुन में है कि अपने जानने वालों और मित्रों को क्या बताएगा कि नौकरी क्यों छोड़ दी है, या छूट गई। फिर सोचता है कि अगर सही कारण बताऊंगा तो लोग क्या कहेंगे–तुझसे एक इतना छोटा सा काम नहीं हो सका तो तू क्या खाक चैनल में काम करेगा।

विनय को अपने साथ अपने घर वालों के सपने टूटते साफ नज़र आ रहे थे कि पैनल प्रोड्यूसर की आवाज तीर की भांति उसके कानों में घुसती चली गई–अरे टीपी क्यों नहीं चला रहा है। क्या निमंत्रण देना पड़ेगा, तब चलाएगा। कैसे-कैसे लोग टीवी में काम करने आ जाते हैं, जैसे अमित चैनल में ही पैदा हुआ हो…विनय मन में सोचता है। विनय टीपी चलाने लगता है और सोचता है–क्या इसी दिन के लिए उसने चैनल ज्वाइन किया था। उसका चार साल पेपर में काम करने का अनुभव क्या इनके किसी काम का नहीं। क्या उसकी टीवी पत्रकार बनने की हसरत धरी की धरी रह जाएगी। टीवी में क्या टीपी चलाना ही असली पत्रकारिता होती है। विनय ये सब बातें सोच ही रहा था कि पैनल प्रोड्यूसर अमित की कार्यक्रम वाइंडअप करने की आवाज आती है। उधर, विनय की परीक्षा का रिजल्ट आने ही वाला है, जिसमें उसके फेल होने के पूरे आसार साफ नज़र आ रहे हैं।

सभी को यही चिंता है कि कार्यक्रम खत्म होते ही विनय पर बिजली गिरनी तय है।कार्यक्रम खत्म करके आनंद जी न्यूजरूम में आते हैं। यहां एक कोने की सीट पर विनय उदास मन से दुबका हुआ बैठा है। आनंद जी राकेश जी से कहते हैं–यार राकेश जी, क्यों आप प्रोग्राम की मां-बहन एक कराना चाहते हो। राकेश जी–मैं समझा नहीं आनंद जी। आनंद जी–अरे यार आज टीपी पर किस चूतिए को भेजा था, उसको जब टीपी चलाने की तमीज नहीं है, तो क्यों भेज दिया यार कैसे –कैसे लोगों को रख रखा है आपने।

राकेश जी इशारे से विनय को बुलाते हैं। विनय–जी सर।राकेश जी–क्या हो गया था?विनय धीरे से–सर कुछ गड़बड़ी हो गई थी।आनंद जी–कुछ नहीं, बहुत गड़बड़ी थी।विनय–मिमियाते हुए–सर अब कभी ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी। आनंद जी गौर से उसके चेहरे को पढ़ते हैं और कुछ देर कुछ नहीं बोलते हैं। न्यूजरूम में सभी के दिल की धड़कनें तेज हैं कि देखो क्या हो। फिर थोड़ी देर बाद आनंद जी के होंठ हिलते हैं। लोग सोच रहे हैं कि आनंद जी क्या फरमान सुनाते हैं। आनंद जी की आवाज गूंजती है–अब कभी ऐसी गलती तो नहीं होगी, वरना अंजाम तुम खुद सोच लो?इतना कहकर आनंद जी न्यूजरूम से बाहर निकल जाते हैं और विनय के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान तैर जाती है। सभी लोग गहरी सांस लेते हैं, जैसे कोई जंग फतेह कर ली हो। पीसीआर के लोग अगली बुलेटिन की तैयारी में जुट जाते हैं।

11 Comments »

  • dijvijay chaturvedi said:

    लगभग हर न्यूज चैनल के फ्लोर का महौल यही होता है। विवेक जी ने अपनी कहानी में उस चैनल माहौल का एकदम सजीव चित्रण किया है। कहानी के पात्र और उनके बीच हुए संवाद कहानी में रोचकता पैदा करते हैं और आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं। चैनल के महौल पर सटीक कहानी है….दिग्विजय सहारा समय..

  • ruvith shrimali said:

    चौराहा पर नई कहानी पढ़ कर काफी अच्छा महशूश कर रहा हूं। कहानी का इंट्रो ही पढ़ा था उसके बाद कहानी को पूरा ही करके मन माना। कहानी में गतिशीलता विद्दमान है जो आगे तक ले जाने में सहायक सिद्ध हुई है। शीर्षक के आगे लिखा लाइव बहुत सटीक साबित होता है। कहानी पढ़ने में भी सजीव है। ऐसी कहानी के लिए लेखक को धन्यवाद..

  • पंकज झा. said:

    सुन्दर और शानदार विवरण…अच्छी कहानी. विनय की तरह ही यह पाठक भी कभी अपने भविष्य की चिंता में चैनलों के चक्कर लगाया करता था. लेकिन इसे टीपी भी चलाने का मौका नहीं मिला तो अब बस केबी (की बोर्ड) टीपता रहता है. सुन्दर .

  • tejwani girdhar, ajmer said:

    वाह क्या सजीव चित्रण है

  • shikha said:

    very well designed story vivek… well done. we all always go with these funny but hectic move. bye

  • shikha said:

    well describe vivek

  • swarnim said:

    log bhul jate hain ki kabhi unhone bhi intership ki thi.lekin kya kare plane me sfar karne wala har wo insan sochta hai ki wo bhi astronaut ban gaya hai.khair ise story nahin apbiti samjha jay. aur sabhi un mahtwakanshi patrakaron ya soshiton se nivedan hai ki apne purane din yad rakhna jab tumhari copyan phek di gayi thi….

  • ram balak said:

    अरे वाह वाजपेयी जी कहानी तो आपने गजब की लिखी है मै समझ गया कि ये कहानी कहां की है। लेकिन फिर भी आपने बहुत सही चित्रण किया है।

  • ishwar chandra pandey said:

    vevek bhai aapne newsrroom ke ghatna ko bade hi lajwab dhang se kahane ke jariye pesh kiya hai.

  • ajayveer bhati said:

    वाजपेयी जी जितनी अच्छी आपकी कहानी है उससे कहीं ज्यादा अच्छे आपके कैरेक्टर हैं…गजब

  • Sheel Kumar said:

    मै तो इस विधा से अजनबी हूँ,चैनल देखने से ज्यादा कुछ नहीं आता.पर कहानी पढ़ कर लगा
    कि पुलिस हर जगह है कहीं हाथ में डंडा है तो कहीं कलम,हर जगह ही सिस्टम में प्रभावशाली व्यक्ति का आतंक रहता है. और ऊपर से कहीं कोई गलती हो जाये तब तो बिलकुल ही फ………..जाती है.एक सजीव चित्रण से
    भरपूर कहानी के लिए बधाई……………