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चीड़ों पर बिखरी हुई निर्मल चांदनी…

24 April 2011 One Comment

डायरी के पन्नों पर निर्मल वर्मा

चीड़ों पर चांदनी पढ़ते हुए

अखिलेश शुक्ल

1.

आज पुनः निर्मल वर्मा याद आ रहे हैं। ‘चीड़ों पर चांदनी’ के तीसरी बार अध्ययन की वजह से। जितनी बार उन्हें पढ़ता हूँ, उतनी ही बार वे स्वच्छ निर्मल रूप में सामने आ खड़े होेते हैं। पहली बार ‘चीड़ों पर चांदनी’ को संस्मरण समझकर पढ़ता रहा था। यह वह समय था, जब किसी पुस्तक/संग्रह को विधाओं की सीमा में बाँधने का चलन था। उस समय उनके अंदाज़-ए-तहरीर ने मुझे बेहद प्रभावित किया था। ‘चीड़ों पर चांदनी’ की तफ़सीलों तथा रवानगी ने दिलोदिमाग में अपनी जगह बना ली थी। दूसरी बार जब 36 वर्ष की आयु में इसे पढ़ा तो पहली बार से स्थिति बहुत अलग नहीं थी। हाँ, कुछ अलग था तो केवल विस्तृत दृष्टिकोण जो विधाओं की सीमाएँ लाँघ जाना चाहता था। किन्तु वर्षो पुरानी साहित्यिक मर्यादाओं से बँधा होने के कारण संभव नहीं हो पा रहा था। उस समय ‘चीड़ों पर चांदनी’ से वह निजता स्थापित नहीं हो सकी जो आज तीसरी बार इसे पढ़ने से हुई है। आज निर्मल जी तो नहीं है पर ‘चीड़ों पर चांदनी’ से उन्हें अपने नजदीक होने का अहसास जेहन में है।

2.

वे पश्चिम की सैर कराते हैं तब, जब ‘ब्रेख्त और उदास नगर’ पढ़ने का अवसर मिला है। उन जैसा नाटककार कालिदास से प्रेरित हुआ लगता है। बे्रख्त के नाटकों में दृश्य संयोजन, पात्र परिचय तथा नेपथ्य से उठता हुआ संगीत हॉल में उपस्थित दर्शकों को सम्मोहित कर देता है। निर्मल जी ने लिखा है कि ‘बर्लिन एसेम्बल की प्रधान निदेशिका हैलेन बेगेल (ब्रेख्त की पत्नी तथा प्रमुख अभिनेत्री) का जादुई स्पर्श आज भी पूर्ववत स्पंदित करता है।’ पढ़कर लगता है, निर्मल जी नाटक देखने के माध्यम से पश्चिमी संस्कारों से हमें परिचित करा रहे हों।  निर्मल जी उस समय विभाजित बर्लिन घुमाते हुए समृद्ध पश्चिम जर्मनी और कम्युनिस्ट अर्थ व्यवस्था से सज्जित पूर्वी जर्मनी की सैर कराते हुए लगता है, जैसे जर्मनी की जनता में एकीकरण की आहट सुन रहे हों। बर्लिन के चैराहों पर खड़े निर्मल जी आज के संदर्भो में पूंजीवादी अर्थ व्यवथा का पूरी तरह पक्ष तो नहीं लेते पर उसे नकारते भी नहीं हैं। अपने मित्रों के साथ बीयर के गिलास ऊपर उठाते हुए वे कोरस में ‘स्काऊल फार संबंध’ कहते हैं। इसके माध्यम से समूचे यूरोप को यह जताने का प्रयास करते हैं कि उनकी भाषा तथा संस्कृति का मूल भारतीयता में छिपा हुआ है। वे ब्रेख्त के कृत्तित्व को तो स्वीकारते दिखाई देते हैं पर उनके कम्युनिस्ट व्यक्तित्व से प्रभावित नहीं होते।

3.

आज ‘चीड़ों पर चांदनी’ के कुछ पृष्ठ पढ़ने के बाद मुझे ‘रोती हुई मर्मेड का शहर’ विचारने का अवसर मिला है। वे निर्मलता के साथ-साथ अपनी पैनी नज़रों से इस शहर का विस्तृत विचार दर्शन दिखाने लगते हैं। संस्मरण में ‘हिच-हाइकिंग’ पर जाकर नज़रें ठहर जाती हैं। उन्होंने कोपेन हेगन में इसके माध्यम से बिना कुछ खर्च किए युवाओं को देशाटन के इस लोकप्रिय तरीके पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। ठीक हमारे देश में युवाओं द्वारा लिफ्ट लेने के तरीके की तरह। यूरोप में इस तरीके से लड़कियाँ अधिकतर लिफ्ट  लेने में सफल होती हैं। वहाँ के तौर तरीके ठीक हमारे जैसे प्रतीत होते हैं।  कोपेनहेगन की होटलों में कमरा ढूढने की जद्दोजहद के मध्य निर्मल जी ‘एंगुई’ के कद-रूप-काठी पर विचार करते हुए आइसलैड़ निवासियों पर अपना दृष्टिपात करते दिखाई देते हैं। जब वे लिखते हैं कि, ‘अपनी नींद को पोटली में दबाए मैं कोपेनहेगन की सड़कों पर घिसटता चला गया।’ लगता है वे भारतीय जीवन दर्शन की उन रिवायतों से हमारा परिचय करा रहे हैं जिन्हें हम लगभग भूल चुके हैं।  अपने मित्र थोर्गियेर के बहाने वे अपने अनुभवों को बाँटते चलते हैं। निर्मल जी कि ‘जिप्सी स्मृतियाँ’ हमारे देश की बंजारा एवं अन्य घुमन्तू जातियों से अलग नहीं दिखाई देती। जिप्सी अर्द्धनग्नता और घुमन्तुओं में यदि फर्क है तो केवल आर्थिक स्तर का। वे धनवान है इसलिए घूमते हैं। हमारे यहाँ जीवन यापन के लिए ये जातियाँ घूमती हैं। निर्मल जी आइसलैंड की राजनीति के भीतर झांकते हैं। जहाँ वैचारिक मतभेद होते हुए भी सम्मान की भावना अभी तक मौजूद है। जिनमें निष्ठा और आस्था के साथ-साथ जीवन का संगीत और संस्कृति का राग भी रचा बसा है।  इस पुस्तक को पढ़ते हुए में इस प्रसंग के अंतिम पृष्ठों की ओर आ रहा हूँ। जहाँ लेखक अपने आप को हिन्दुस्तानी होने पर गौरवान्वित महसूस करता है। वे स्वयं के भारतीय होने का सबूत देते हुए भावुक हो ऊठते हैं। ‘एकुमा विते’; जमत व सिपमिद्ध पीती हुई लड़की के बालों में फूल लगाने की रूमानियत से रूबरू होने के बावजूद भी भारतीय संस्कारों को एक पल के लिए भी अपनी आँखों से ओझल नहीं होने देते।

4.

आज मुझे लेखक के साथ समुद्री जहाज के सफर का आनंद प्राप्त हो रहा है। उत्तरी रोशनियों की ओर यात्रा करते हुए सहयात्रियों के खट्टे मीठे अनुभवों को संजोने का अवसर मिला है। यदि समुद्री सफर लम्बा हो तो उकताहट हो जाना स्वाभाविक ही है। बियर पीना, देर रात तक जागना और बैरकनुमा केबिन में न चाहते हुए भी सोना। निर्मल जी की स्मृतियाँ ले जाती हैं असीमित समुद्र विस्तार के उस छोर की ओर जहाँ से जीवन शुरू होता है। विभिन्न सहयात्रियों से परिचय और संस्कृति का आदान प्रदान रीति रिवाजों और खानपान का चित्रण देश दुनिया की सैर जहाज पर उनके साथ और भी न जाने क्या-क्या। जिसका आनंद सफर में हर कोई उठाना चाहता है। जहाज की दुनिया से निकलकर ‘लीथ’ बंदगाह पर विचरण करते हुए वे महसूस कराते है थल के महत्त्व का तथा जीवन में जल का। वह ‘पानी’ जिसके उतर जाने पर इंसानियत प्रायः हैवानियत में बदलने लगती है। अटलांटिक सागर के बीच जहाज के पहुँचने पर बर्ट से मुलाकात संक्षिप्त सा विवरण मुझे आनंदित कर रहा है। मैं भी उस मुलाकात में अपने आप को निर्मल जी के साथ महसूस कर रहा हूँ। किसी विदेशी महिला के हाथ में राधाकृष्ण की पुस्तक ‘हिन्दु व्यू ऑफ लाइफ’ खुली दिखते ही याद आता है हमारा पश्चिम की ओर अकारण भागना। ऐसा लगता है हम अध्यात्म की खोज के लिए मग़रिबी शोर की ओर ताक रहे हो। निर्मल जी पाश्चात्यता से प्रभावित होते हुए भी उसे अपने स्वयं के ऊपर हावी नहीं होने देते। वे भारतीय विरासत के महत्त्व को अपने अन्य सहयात्रियों को समझाने में पूर्णतः सफल होते हैं।

5.

अब तक मैं निर्मल जी की स्मृतियों का सहगामी हो गया हूँ। उन्हें पढ़ते हुए मैं भी आइसलैड़ की सैर पर हूँ। इस देश की राजधानी ‘रिक्याविन’ जिसे धुँए के शहर के रूप में भी जाना जाता है। वे वहाँ के लोगों के सादगीपन से मेरा परिचय करा रहे हैं। यूरोप के इस छोटे से देश में भ्रमण करते हुए वे विश्वविख्यात आइसलैंडी लेखक ‘हालदार लैक्सनेस’ से मिलवाते हैं। एक ऐसा साहित्यकार जो अपने आप में एक संस्था है। जिसके देश में ऐतिहासिकता न होते हुए भी नया इतिहास रचने का जिसे अवसर प्राप्त हुआ है। लैक्सनेस ने पुराने गिरजे  न होते हुए भी निष्ठापूर्वक इबादत की है। एक भी पुराने खण्डहर न होते हुए भी सांस्कृतिकता की नई इमारत खड़ी की है।  निर्मल जी इस छोटे से देश में घूमते हुए यह लिखकर चौंका देते हैं कि इस देश में शराब के बाद  सर्वाधिक माँग पुस्तकों की है। सोचता हूँ जिस देश के लोगों की दूसरी प्रमुख प्राथमिकता ‘पुस्तक’ हो उसका बौद्धिक स्तर अवश्य ही हमसे कही अधिक अजीमतरीन होगा। वहाँ के प्रपातों, गाँवों, पर्वतों में बीथोविन की स्वर लहरियाँ सुनाई देती हैं। निर्मल जी के साथ ‘ईगल्स-हिल्स’ की घास पर लेटा हुआ मैं भी मंद-मंद बहती हवा और गुनगुनाती धूप का आनंद ले रहा हूँ।

6.

आज मैं उनके साथ ‘लिदीत्से’ की सैर पर जा रहा हूँ। चेकोस्लोवाकिया का वह छोटा-सा गाँव जिसका वहाँ के नक्शे पर जिक्र तक नहीं है। एक ऐसा गाँव जो जर्मनी के सिपाहियों की ज्यादाती का शिकार हुआ था। एक आततायी को ढूढकर मारने के बजाय लगभग दो सौ सी आबादी को जिंदा जला डालने की कार्यवाही के वर्णन  ने अंदर तक झकझोर दिया है। उस वीरान तथा उजड़ी बस्ती में निर्मल जी की संवेदनाएं प्रगट हो चली हैं। उनके चेहरे पर बनते बिगड़ते भाव सहयात्री भी देख पढ़ रहे थे। मैंने भी अतिवाद की इस पराकाष्ठा को बड़ी सिद्दत के साथ महसूस किया है। इसे जितनी बार पढ़ा जाए एक नया अनुभव मिलता है। निर्मल जी दुनिया एवं समाज में आधुनिकता की आहट के साथ आने वाली मानवीय प्रतिस्पर्धा को भी समझाने लगते हैं। लग रहा है जैसे वे लिदीत्से की मार्फत यह कह रहे हों कि यह नरसंहार आखिर क्यों? निर्मल जी का संसार को देखने का नजरिया अपना सा प्रतीत होने लगता है। 7.   वे ले चलते हैं प्राग की ओर। यूरोप का वह आधुनिक नगर जिसमें गगनचुम्बी इमारतें, गिरजे चैड़ी सड़कें तथा ट्रामे हैं। निर्मल जी ‘मोत्सार्ट’ बातें करते दिखलाई देते हैं। मोत्सार्ट के म्यूजियम तथा लाइब्रेरी में घूमते हुए वे उस महान साहित्यकार के महत्त्व तथा योगदान से सहमत होते दीखते हैं। उस महान लेखक के ‘ओपेरा’ को प्राग का चलचित्र भी कहा जा सकता है।  यहाँ निर्मल जी प्राग के आसपास के प्रकृति सौन्दर्य से प्रभावित होते हैं। यह उन्हें अपना-सा  लगता है, उन्हें बेहद प्रभावित करता है। ‘वर्त राम्का’ का खुबसूरत वर्णन मुझे उनकी वैचारिकता से जोड़ता है। ‘मोत्सार्ट’  के म्यूजियम का सूक्ष्म विश्लेषण बाँधे रखता है। वे शब्दजाल से छकाते नहीं जाग्रत करते हैं, दिमाग़ की सुप्त सिराओं को झंकृत करते हैं तथा अपनी अनुभूतियों को बांटते चलते हैं।

8.

आज उन्होंने दृष्टिपात किया है पेरिस की ठहरी हुई जिंदगी पर। पेरिस का वर्णन करते हुए निर्मल जी इस शहर की आम जिंदगी को नज़दीक से देखते हैं। फ्रेंच युवक युवतियों से असहमति का स्वर उनके विवरण में सुनाई देता है। निर्मल जी निराश हैं उन निष्काषित साहित्यकारों के आमोद प्रमोद गृह देखकर। पेरिस में इहटनबुर्ग सबसे पहले मोदिल्यानी, अपोल्योनोट और पिकासो के मिलने का रेस्तरां ‘रोटुण्डा में कोई नामोनिशान दिखाई नहीं देता है। निर्मल जी दुखी होते हैं युद्ध के दौरान रजि़स्टा कवियों की उदास गूंज से। वे वहाँ की इमारतों को देखकर उनकी भवन निर्माण कला की प्रशंसा तो करते हैं पर उस शहर की आधुनिकता तथा फैशन परस्ती को विश्व से अलग नहीं मानते। उन लोगों की मोलभाव करने की भारतीय मानसिकता को पेरिस के ठहराव से जोड़ते हैं।  ‘कोन्सियर्जरी’ की लाल ईटों की दीवारों’ से वे उसे स्पर्श किए बिना निकल जाते हैं। पेरिस की संध्या, वहाँ का संगीत तथा भटकी हुई भुतैली-सी अनुगूंज उन्हें इस शहर में महसूस होती है। वे अपनी स्मृति में इन्हें भी संजोए रखना चाहते हैं। जैसे सुंदर गुलाब के साथ-साथ कांटे भी उपहार में मिल गए हों। लगता है, जैसे वे दोस्तायवस्की की अभिशप्त भूल भुलैया से निकलकर चेखॅव के सूने गोधूलि से सने आंगन में विचरण कर रहे हों। वहाँ ‘चेस्टनर’ के वृक्षों से बातें करते हुए वे इस स्टिल लाइफ का राज जानना चाहते हैं। वे वहाँ की खुशबू तथा वहाँ सम्मानपूर्वक बिताई गई जिंदगी को याद करते हुए उसमें अपने आप को घुलामिला पाते हैं।

9.

निर्मल जी की राय में ‘वियाना’ यूरोप के अन्य महानगरों से अलग है, कुछ खास है। वे ‘वियाना’ की तफ़सील देते हुए मुखर हो उठते हैं। उसकी एक-एक खूबियों को उभारते हुए पार्क, चर्च, सड़कें तथा पुरानी इमारतों पर, उनकी भिन्नता पर विचार करते हैं। बियर पान से लेकर उड़ते हुए कबूतरों के झुंड़, मेद्याच्छन आकाश से लेकर जीवन के सुख दुख व उदासी निर्मल जी के अंर्तमन में जगह बनाते चलते हैं।  निर्मल जी वहाँ के कार्यक्रमों में सिरकत करते हैं। उपस्थित अन्य देशवासियों से घुलेमिले होते हुए भी अपनी विशिष्ट छाप छोड़ते हैं। कैनेडियन युवती के सामने ‘प्योर इंडिया’ कहकर वे अपने भारतीय होने को अहमियत देते हैं।  वहाँ के कार्यक्रमों का वर्णन मात्र औपचारिक रूप से न देकर वे उसकी गहराई में उतरते हैं। हाल में उपस्थित नीग्रो युवक द्वारा छेड़ी गई धुन के बीच ‘ओ लॉन्ग लिव वियाना’ के मध्य उस शहर में आयोजित समारोह में भारतीय खेमा ढूढ निकालते हैं। जैसे कोई शरारती बच्चा माँ की ऊँगली छोड़कर अपने साथियों में जा मिलता है। वे आम जन में रहते हुए भी ‘आर्थर श्लीज़र’ की कहानियाँ नहीं भूलते हैं। वे अपनी स्मृतियों में क्रेमलिन, बुदापेस्त को संजोते हुए आधुनिक भारत की आहट महसूस करते हैं। वे भारतीयता को जेहन में रखते हुए निहायत ही जहीन शख्सीयत दिखाई देते हैं।

10.

निर्मल जी अपने बचपन की स्मृतियों को शिमला में बिताए हुए जीवन के पलों से बाँधते है। कहानी का सा लगता हुआ यह वर्णन उन खुबसूरत वादियों को देखने की लालसा जगाता है। बड़े-बड़े पहाड़, देवदार के वृक्ष तथा वर्फ की पर्ते जैसे उनकी स्मृति के एक कोने से हटकर पुनः दिलोदिमाग़ पर छा गई है।  वे टामस मान के ‘मैजिक माउंटेन’ के प्रकृति वर्णन विशेषकर स्वीट्जरलैंड की खुबसूरत व हसीन वादियों से शिमला को अधिक श्रेष्ट दिखलाते हुए इस क्षेत्र के जीवन को ‘ चीड़ों पर चांदनी’ के रूप में उतारते हैं। पहाड़ों पर चांदनी के मायाजाल को जीवन के सुनहरे पलों से जोड़ते हुए वे उसके सम्मोहन में बांध देते हैं। कालका और शिमला के बीच उपेक्षित हिल स्टेशन ‘सोलन’ की वीरानगी उन्हें याद आती है जिसमें विश्व भर का सौन्दर्य रचा बसा है। हिमाचल की पहाडि़याँ ऐसी लगती है जैसे किसी ने सुंदरी के उरोजांे पर होली का गहरा हरा रंग मल दिया हो तथा वर्फ ढंकी हुई पहाडि़याँ अपने प्रियतम को चुम्बन के लिए आकर्षित कर रही हों।  वे वहाँ नौ हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित नारकण्डे के डाक-बंगले से होते हुए चांदनी रात में ‘हंसिये’ के समान ऊगे चंद्रमा से बातें करते हैं। लगता है जैसे आँखों में बसा ‘नैनीताल’ हृदय की गहराइयों पर स्थित काठगोदाम पर जाकर ठहर गया हो। वे झील के रंगों में अपने आप को आत्मसात करते हैं। निर्मल जी मनुष्य के जीवन और प्रवृत्ति को पूरक मानते दिखाई देते हैं। उनके अनुभवों में फोटोजेनिक प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता हैं। ‘टापू पर पके गूलर गिरते हैं …टप टप … पानी भागता है, किसी अदृश्य निधि की खोज में।’ वे अपने स्मरण में, ‘बादल अलग थे और दोनों के बीच सिन्दूरी रंग की लम्बी सी रेखा खिंच आई थी।’ करवटें लेते हुए शिमला और उसके आसपास के क्षेत्र से रू-ब-रू कराते हैं।

11.

निर्मल जी अब यूरोप की देहरी के बाहर आ गए हैं। नोबल पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार लैक्सनेस से इंटरव्यू लेते हुए वे अति विनम्र हो जाते हैं। वे अपना इंटरव्यू अनौपचारिक रूप से लेते हैं। इस अति सामान्य रहन सहन वाले साहित्यकार की खूबियों को वे उभारते हैं। यही सादगी लैक्सनेस की धरोहर है जिसकी बदौलत उन्हें नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ है। इंटरव्यू से ज्ञात होता है कि लैक्सनेस को अपने उपन्यास ‘हैपीवारियर्स’ को लिखने से पहले सागा-ग्रंथों का विशद् अध्ययन करना पड़ा था। निर्मल जी तथा लैक्सनेस दोनों ही पुस्तक अध्ययन अनिवार्य मानते हैं।  डेनमार्क के साहित्य व संस्कृति का प्रभाव आइसलैड़ पर बिल्कुल ही नहीं पड़ा। जबकि सैकड़ों वर्षो तक आइसलैड़, डेनमार्क के राजनीतिक प्रभुत्व में रहा है।  निर्मल जी तथा लैक्सनेस साहित्य में बढ़ते हुए राजनीतिक हस्तक्षेप पर गहरी चिंता जाहिर करते हैं। लैक्सनेस भारतीयों की गरीबी से दुखित तो होते हैं पर यहाँ की संस्कृति पर प्रसन्नता भी व्यक्त करते हैं।  लैक्सनेस आधुनिक भारतीय लेखकों को आधुनिक नहीं मानते हैं। उनके अनुसार ‘रोलाँ’ जैसे साहित्यकारों से वे कमतर ही हैं। लेकिन यह कथन मुझे सही नहीं लगता। आज हिंदी तथा भारतीय भाषाओं का साहित्य यूरोपिय साहित्य से पीछे नहीं है। बल्कि सच यह है कि वहाँ का साहित्य आजकल हमारे साहित्य का अनुसरण ही कर रहा है।

12.

निर्मल जी अनुभव तथा ज्ञान बटोरने के लिए हमेशा तत्पर दिखाई देते हैं। वे उस स्रोत को ढूंढ ही लेते हैं जिससे कुछ प्राप्त होता है। वे स्पष्ट करते है कि चार्ली चेपलिन तथा चेकोस्लोवेकिया दोनों छोटे हैं फिर भी महान हैं। वे क़ाफ्का को जर्मन से अधिक चेक साहित्यकार मानते हैं तो उसकी वजह क़ाफ्का का चेक साहित्य तथा भाषा पर एकाधिकार है।  यूरोपीय संस्कारों से अलग चेक के अपने संस्कार तथा रीति रिवाज हैं। उसके संस्कार अपने अतीत से जुड़े हुए हैं। जिनका आधार है वह ‘मानवीय परंपरा’ जिसे निर्मल जी ने नजदीक से देखा है।  निर्मल जी चेक साहित्य में नवजागरण तथा पुनुरूथान देखते हैं। चेक भाषा के प्रति आमजन की श्रद्धा देखते ही बनती है। योसेफ युंगमान, कोल्ला व बीजेना न्यामयोवा को चेक साहित्य का अगुवा निर्मल जी ने माना है। वे पाब्लो नेरूदा की मृत्यु को चेक साहित्य के एक महत्वपूर्ण दौर की समाप्ति मानते हैं। काश! वह देश उनके ख्यात साहित्यकार ‘हाशेक’ का सम्यक मूल्यांकन कर सका होता। जिसके उपन्यास ‘अच्छा सिपाही श्वायक’ के अनुवाद विश्व की अनेक भाषा में हो चुके हैं। ‘हाशेक’ के पात्र गोदान के पात्र ‘होरी’ के समान भोले भाले और साधारण बुद्धि के दिखाई देते हैं। जिनमें विनोदप्रियता नाममात्र की है।  निर्मल जी ‘चापेक’ को वहाँ का सर्वमान्य साहित्कार मानते हैं जिसने उपन्यास, कहानी, संस्मरण जैसी अनेक विधाओं में सृजन किया है। इस लेखक ने बुर्जुआ संस्कृति के मूल्यों में आस्था रखते हुए भी उसकी विकृतियों को अस्वीकृत करने का साहस किया है। ‘चापेक’ के नाटक उनके उपन्यासों से अधिक सर्वमान्य हैं। जिनमें प्रतीकवादिता के साथ-साथ आस्था भी मिलती है।  निर्मल जी मानते हैं कि चेक साहित्य युद्ध की घटनाओं से भरा पड़ा है। लगभग प्रत्येक रचना में युद्ध के प्रसंग मिल जाते हैं जिसे रूढि़वादिता ही माना जायेगा।  आधुनिक चेक साहित्यकारों में यानविस, लुदविक, अश्वेना जी और इर्शी मारेक की रचनाएँ अपेक्षाकृत अधिक स्वीकृत हो चुकी हैं। इनमें विविधतापूर्ण प्रयोग तथा ताजगी दिखाई देती है। कुछ और नए रचनाकारों में अर्नोस्त लुस्तिग, यत्रीला स्वाता, यान दर्दा, अनोस्त वान्येचेक तथा शरमिक निर्मल जी को आकर्षित करते हैं। उस छोटे-से देश के महान साहित्यकारों से परिचित कराते हुए निर्मल जी चेखॅव के पत्रों में समकालीन साहित्य की विशेषताएं खोजते हैं।

13.

निर्मल जी चेखॅव के पत्रों पर दृष्टिपात करते हुए उनके चरित्र की विशेषताओं को पाठक के ध्यान में लाते हैं। याल्टा के समुद्र तट, चेखॅव और मास्को को वे घुलामिला पाते हैं। चेखॅव समुद्र की उठती गिरती लहरों के मध्य मास्को का भविष्य खोजते थे। निर्मल जी चेखॅव के पत्रों में चिंता की अपेक्षा चिन्तन को प्रमुख तत्व मानते हैं। चेखॅव जैसे अलमस्त तथा मनमौजी व्यक्तित्व द्वारा कहानियों में दर्द व मनोदशा भरने की अनोखी खूबियां निर्मल जी को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लेती हैं। चेखॅव की मिलनसारिता से संबंधित वर्णन में निर्मल जी लिखते है कि, ‘चेखॅव मास्को के बाहर कॉटेज किराए पर लेकर मित्रों को पत्र लिखकर बुला लेते थे। चेखॅव अपने पात्रों को जानबूझकर दुखी व उदास नहीं दिखाते उनके अनुसार ऐसा स्वतः ही हो जाता है। चेखॅव की संवेदना तथा सहानुभूति भाषा-शैली के जाल में न उलझकर सीधे सीधे आम आदमी से जुड़ जाती है। निर्मल जी के अनुसार चेखॅव, साहित्य में कलात्मकता को गैर जरूरी मानते हैं। अतः चेखॅव के पत्र किसी तरह की आर्दशवादिता का पाठ न पढ़ाते हुए सीधे ही संवाद करते चलते हैं।  निर्मल जी ने चेखॅव के पत्रों में प्रगतिशीलता से भी आगे जाकर मानव उत्थान के प्रति चिन्तन महसूस किया है। वे पत्रों को साहित्यिक मानते हुए भी वर्तमान चिन्तन की अभिव्यक्ति मानते हैं। एक ऐसा चिन्तन जिसने तत्कालीन समाज की दशा व्यक्त करने के साथ-साथ दिशा देने का महान कार्य किया है।

 

ये आलेख अखिलेश शुक्ल का है। प्रसिद्ध ई-समीक्षक अखिलेश बहुविध रचनाकार हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में विविध विषयों पर उनकी रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

 

निर्मल वर्मा का चित्र साभार : writers-photos.blogspot.com

One Comment »

  • पंकज झा. said:

    बधाई अखिलेश जी …काफी पहले पढ़े गए निर्मल साहब के इस संस्मरण को दुबारा काफी बेहतरीन तरीके से आपने ताज़ा करा दिया…सुन्दर विश्लेषण.