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लेकिन ‘लोकतंत्र’ के आगे उनकी कोई हैसियत नहीं है

24 April 2011 9 Comments

पंकज झा दीपकमल पत्रिका के संपादक हैं। भारतीय जनता पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा जाहिर है और इससे वह इनकार भी नहीं करते। बिनायक सेन  को लेकर पंकज के विचारों से मैं सहमत नहीं हूं, लेकिन चौराहा सबका मंच है और यहां असहमतियों का अधिकार सार्वजनिक है, ऐसे में पंकज के आलेख को प्रकाशन से रोका नहीं जा सकता…पंकज जी का ये अपना मंच है, इसलिए मेरी विचारवैभिन्नता के बावज़ूद उनका लेख पूरे आदर के साथ पेश है :

 

# पंकज झा

देशद्रोह के ‘अपराध’ में उम्रकैद की सज़ा पाए बिनायक सेन को ज़मानत मिलने के बाद कथित जन-संगठनों द्वारा व्यक्त की जा रही प्रतिक्रिया लोकतंत्र के लिए भयावह भविष्य की ओर इशारा करता है. निश्चय ही न्याय का अपना तकाजा होता है. अगर अरुंधती राय के शब्द उधार लेकर कहूं तो उसका अपना ‘गणित’ होता है. न्यायालय के निर्णय के आलोचना की अपने यहां परंपरा भी नहीं है, ‘विधि’ उसे अवमानना भी मानता है. लेकिन बिनायक को ज़मानत मिलने के बाद न्यायालय की जय-जयकार करते लोगों को देखकर चिंता स्वाभाविक है. इसलिए कि ये वही लोग या संगठन हैं, जो निचली अदालत द्वारा सेन समेत तीन को सज़ा मिलने के बाद न्यायिक प्रक्रिया पर अंगुली उठाते हुए उसे पानी पी-पी कर कोस रहे थे. बिलासपुर उच्च न्यायालय द्वारा भी इस मामले में राहत नहीं मिलने पर तो इन समूहों का गुस्सा सांतवे आसमान पर पहुच गया था. यानी तर्क चाहे जो कहे,परिस्थितियां चाहे कैसी भी हो, साक्ष्य चाहे जिस ओर भी इशारा कर रहे हों, सेक्युलर बुद्धिजीवियों, कथित मानवाधिकारियों,तथाकथित जनवादियों का इस मामले में दो टुक फरमान है, जमानत मिले तो न्याय, सज़ा तो अन्याय. इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने की ज़रूरत है. खैर.

मोटे तौर पर अपना लोकतंत्र न्याय के इस नैसर्गिक सिद्धांत में भरोसा करता है कि सौ दोषी भले छूट जाएं, लेकिन किसी एक भी निर्दोष को सज़ा नहीं हो. अन्यथा सेन द्वारा नक्सलियों को मदद पहुचाने और उनके बीच संवाद सेतु का काम करने के स्पष्ट सबूतों पर किसी को भी कोई शंका नहीं है. नक्सल हिंसा में शहीद हुए पुलिस अधीक्षक की विधवा समेत अन्य ने बिलासपुर हाई कोर्ट में सेन की ज़मानत पर सुनवाई के दौरान हस्तक्षेप करने की इज़ाज़त भी इसी बिना पर मांगी थी कि इन सभी हत्यायों के कहीं न कहीं ज़िम्मेदार विनायक सेन भी हैं.

आज जब दुष्प्रचार की हद तक जाने वाले संगठन सीधे सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर रहे हैं तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि आखिरकार किसी भी सरकार को एक डॉक्टर से क्या खुन्नस हो सकती है? समाज में यूं ही डॉक्टरों का इतना अभाव है और जेल के कमरे वैसे भी खाली नहीं. तो आखिर कोई सरकार बिना मतलब क्यूं किसी डॉक्टर के पीछे हाथ धो कर पडे? एक समय था जब सेन चिकित्सकीय कार्य के अपने पेशे तक सीमित थे. उस समय सरकार ने न केवल उनका काफी सम्मान किया था बल्कि इनकी पहल पर प्रदेश में मितानिन योजना की भी शुरुआत की थी. लेकिन जब आप किसी अज्ञात कारणवश अपने मूल पेशे को छोड़ किसी तरह के राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होना शुरू कर देते हैं तो राज्य के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचता कि वह न्यायिक समेत हर तरह के उपचार का सहारा लेकर आपको रोके.

देश की आंतरिक सुरक्षा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती के रूप में माने जाने वाले नक्सली गतिविधियों को प्रोत्साहन देना सीधे तौर पर देशद्रोह है जिसके आरोप में अभी भी सेन सजायाफ्ता हैं. अभी भी प्रचारित चाहे जो किया जा रहा हो लेकिन तथ्य यह है कि उन्हें बरी नहीं किया गया है. न ही सरकार द्वारा पेश किसी सबूत को झूठा साबित किया गया है. हां वे सबूत ऊपरी अदालतों में भी सज़ा कायम रखने के लिए पर्याप्त होंगे या नहीं यह भविष्य के गर्भ में है. लेकिन बात चाहे शिशु रोग विशेषज्ञ होते हुए भी केवल एक बुजुर्ग नक्सली नारायण सान्याल के कथित इलाज़ इलाज़ के लिए कुछ हफ़्तों में ही तैंतीस बार जेल जा कर मिलने की हो, नक्सलियों तक उनके सन्देश को पहुचाने की बात हो, नक्सली सान्याल को किराए का घर दिलवाने के लिए अपने रिश्तेदार बताने की बात हो या फ़िर गीता और कुरआन की तरह सीने में प्रतिबंधित नक्सल साहित्य को चिपकाए रखने की, यह सारे सबूत इस भरोसे का पर्याप्त कारण पेश करता है कि सेन सीधे तौर पर नक्सल गतिविधियों में शामिल रहे हैं. आज की तारीख में उनके पास आपको चिकित्सा उपकरणों के अलावा हर कुछ मिल जाएगा और अगर इलाज़ का बहाना भी वे करेंगे तो केवल नक्सली सान्याल का.

नक्सली इलाके में ही अपने पिता की विरासत को आगे बढाते हुए रचनात्मक काम करने वाले एक और डॉक्टर दंपति प्रकाश आमटे को अगर हम उद्धृत करें तो आप समझ सकेंगे कि क्या फर्क होता है एक वास्तविक समाजसेवी और बिनायक सेन में. अपने महान पिता बाबा आमटे को उद्धृत करते हुए हाल ही में प्रकाश आमटे ने कहा था कि  बाबा का मानना था कि ‘आदिवासी इलाकों में नक्सल उन्मूलन का एक मात्र उपाय यह है कि वनवासियों तक खाद्यान्न की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित की जाय.’ तो आज अगर छत्तीसगढ़ की सरकार आदिवासी अंचल के कोने-कोने तक नाम मात्र की कीमत पर चावल समेत अन्य उपयोगी वस्तुओं की आपूर्ति मुफ्त करने का सफल योजना अमल में ला रही है तो ज़ाहिर है वह बाबा आमटे की भावनाओं के अनुरूप अलग तरह से प्रदेश के नक्सल समस्या को समाप्त करने का प्रयास कर रही है.

बिनायक सेन समेत सभी नक्सल कार्यकर्ताओं के लिए मोटे तौर पर प्रदेश के आदिवासियों की गरीबी एक ‘उत्पाद’ की तरह ही है. वे कभी भी इस उत्पाद को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे. यह तथ्य है की नक्सलियों द्वारा हज़ारों करोड के लेवी वसूलने का‘व्यवसाय’ किया जा रहा है. ज़ाहिर है जब भी इनलोगों को ये लगेगा कि आदिवासी जन अपने पांव पर खड़े होकर अपनी सरकार और अपने तंत्र के साथ साझेदारी करने का मानस बना रहे हैं तो इनके अस्तित्व पर संकट खडा हो जाना और फलतः अपनी समूची ताकत से हर तरह का हथकंडा अपना कर राज्य को अस्थिर करने का प्रयास शुरू कर देना स्वाभाविक ही है. आखिर अविभाजित मध्य प्रदेश के ज़माने में नक्सलियों को जाहिराना तौर पर सरकार से कोई समस्या नहीं थी.

अब भी इनके खैरख्वाह बने दिग्विजय सिंह जैसों के मुख्यमंत्री रहते हुए नक्सल समूहों से एक अघोषित समझोता जैसा ही था कि उसे इनके ‘बस्तर’ से कोई मतलब नहीं तो नक्सलियों को ‘भोपाल’ से कोई लेना देना नहीं. मोटे तौर पर महाभारत में वर्णित कथानक की तरह जब तक दानवों को लेवी के रूप में राज्य द्वारा भेजे जाने वाले ‘राशन’ और समय-समय पर कुछ नरमुंड मिलने में समस्या नहीं थी तब-तक सब कुछ ठीक-ठाक था. दिक्कत तब हो गई, जब बस्तर के माटी पुत्र ‘भीम’ की भूमिका में इन्हें ललकारने की साहस जुटाने लगा. अपने राज्य द्वारा भरपूर समर्थन पा कर माटी पुत्रों द्वारा शुरू हुए आंदोलन ‘सलवा जुडूम’ के नाम से ही इनकी रूहें कापनी लगी. इस आंदोलन ने पहली बार ‘कातिल और मसीहा’ के बीच का अंतर स्पष्ट किया. लोकतंत्र समर्थक नागरिक इन नक्सलियों के विरुद्ध एकजुट हुए और यही सबसे बड़ा कारण रहा कि बिनायक जैसे लोगों को चिकित्सक के पेशे का ढोंग भी छोड़कर सीधे तौर पर मैदान में कूद जाना पड़ा.

अपने बड़े विदेशी संपर्कों और लाल मीडिया की मदद से दुष्प्रचारों का अंतहीन दौर शुरू कर झूठ पर झूठ गढ़ लोकतंत्र को बदनाम करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी इन लोगों ने. पिछले हफ्ते की ही बात है जब समाचार माध्यमों समेत सुप्रीम कोर्ट तक को गुमराह करने के लिए यह खबर उडाई गयी कि दांतेवाड़ा में छह आदिवासियों की भूख से मौत हुई है. कोर्ट के निर्देश पर हर्ष मंदर के नेतृत्व में टीम आयी और ‘मृत’ छः लोगों में से पांच ज़िंदा पाए गए. बस उनमें से एक वृद्ध महिला की महीनों पहले बीमारी से मौत होना साबित हुआ. इसी तरह मानवाधिकार हनन का हर तरह के दुष्प्रचार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ही मानवाधिकार कमिटी भेजी और उन्हें किसी भी तरह के कोई मानवाधिकार हनन का सबूत वहां नहीं मिला. समाचार माध्यमों का दुरुपयोग कर एक बार खबर चलवा दी गयी कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट की लताड पडी है और सलवा जुडूम बंद करने को कहा गया है लेकिन अख़बारों में इस झूठ को प्रकाशित हो जाने देने के बाद चुपके से समाचार एजेंसी ने अपनी खबर को रद्द कर दिया.

ऐसे-ऐसे झूठों की असंख्य श्रृंखला आपको यहाँ दिखेगी. ऐसे में न्यायालय को भी यह चाहिए कि उसका समय इस तरह खराब करने के लिए ऐसे तत्वों को दण्डित करे. जिस तरह हाल में राहुल गांधी को बदनाम करने के आरोप में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वादी पर पचास लाख का जुर्माना ठोका ऐसे ही नक्सल मामलों में भी लोकतंत्र को बदनाम करने वालों पर कारवाई होनी ही चाहिए. खैर.

जहां तक बिनायक मामले का सवाल है तो किसी एक आरोपी को सज़ा मिल जाने या उसके छूट जाने को मुद्दा बनाने की ज़रूरत नहीं है. इस ज़मानत मामले में भी कोर्ट की टिप्पणी को जिस तरह व्याख्यायित किया जा रहा है वैसा कुछ है भी नहीं. लेकिन न्यायालय का पूर्ण सम्मान करते हुए भी राज्य सरकार पूरी ताकत से नक्सल उन्मूलन अभियान में जुटे रहे यही समूचे प्रदेश की आकांक्षा है. वो आकांक्षा जिसका प्रकटीकरण लगातार हुए चुनावों में बस्तर के माटीपुत्र करते आ रहे हैं. निश्चित ही नक्सल समर्थकगण काफी ताकतवर हैं

लेकिन ‘लोकतंत्र’ के आगे उनकी कोई हैसियत नहीं है. शहरों से ज्यादा संख्या में बार-बार मतदान कर आदिवासियों ने अपने समर्थन का प्रकटीकरण बार-बार किया ही है. बस अगर संकट है तो महज़ इतना की केन्द्र में बैठी सरकार इच्छा शक्ति का परिचय दे. पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री के कपड़ा बदलने की तर्ज़ पर बयान बदलने वाले वर्तमान गृह मंत्री चिदंबरम का सेन की ज़मानत मिलने पर खुशी जताना या भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए क़ानून बनाने खातिर आंदोलन करने को मजबूर हुए देश में क़ानून मंत्री द्वारा देश द्रोह के क़ानून को समीक्षा किये जाने की बात करना, देश की बागडोर सम्हालने वाले उच्च पदस्थ लोगों द्वारा नक्सल मामलों पर चुप्पी साधे रखना आदि ही केवल संकट है.

तो भले ही बिनायक की सज़ा कायम रहे या वो छूट जाएँ, यह कोई बड़ा मसला नहीं है. जैसा कि ऊपर कहा गया है, ‘लोकतंत्र’ सौ दोषियों को छोड़ देने के बाद भी मज़बूत बने रहने की ताकत रखता है. बस ज़रूरत यह है कि प्रदेश सरकार अपनी समूची ताकत का इस्तेमाल कर लोकतंत्र एवं आंतरिक सुरक्षा के समक्ष उपस्थित नक्सल चुनौतोयों का इसी तरह जम कर मुकाबला करे. जनमत का सम्मान करते हुए नक्सलियों को कुचलने हेतु अपनी पूरी ताकत लगा दे. पिछले सैकड़ों सालों का अनुभव यह कहता है कि राष्ट्र अपने समक्ष उपस्थित हर तरह की चुनौतियों से जूझने का माद्दा रखता है, जयचंदों-जाफरों के बावजूद, अफजल-कसाबों की मेहमाननवाजी के बाद भी।

9 Comments »

  • ChandraShekhar Pati Tripathi said:

    पंकज सर,
    आप जब भी लिखते हैं, बेहतरीन लिखते हैं…
    मुझे याद है जब बिनायक सेन को सजा हुई थी तब आपने “नायक नहीं है विनायक” शीर्षक से एक लेख लिखा था जिसकी कुछ आखिरी पंक्तिया थी..
    “लाख कमियों के बावजूद हमारे लोकतंत्र और उसके विभिन्न अंगों में पर्याप्त ताकत है कि वह विडंबना से पार पाए. बुराइयां जितनी हो लेकिन हमें अपना समाधान इसी तंत्र से पाना है. यहाँ के लोकतंत्र को हिटलर वाले चश्मे से देखने वालों की नज़र ठीक कर देने के लिए विधि द्वारा जो भी प्रक्रिया अपनाय जाय वो सही है. कोई लाख चिल्लाये लेकिन आज की तारीख में हमारी प्रणाली द्वारा अपराधी साबित हुआ विनायक हमारे नायक नहीं हो सकते.”
    निश्चित रूप से विनायक सेन जैसे लोग अपने समर्थन मे चाहे जो कुछ भी कह करा ले, उनसे हमारी व्यवस्था कमजोर नही होने वाली…आप ही के शब्दों मे..
    “पिछले सैकड़ों सालों का अनुभव यह कहता है कि राष्ट्र अपने समक्ष उपस्थित हर तरह की चुनौतियों से जूझने का माद्दा रखता है, जयचंदों-जाफरों के बावजूद, अफजल-कसाबों की मेहमाननवाजी के बाद भी।”
    धन्यवाद!!!!

  • याज्ञवल्‍क्‍य said:

    कमाल है, कलम झुकती है अव्‍वल तो यह सही नही है, पर यदि झुके भी तो इस अंदाज में कि, बैठने कहो तो लेट जाए यह तो हद है। आपकी यह धूर्राधार कलम सरकार समर्थित हथियारबंद समूहों के बारे में कभी कुछ नही बोलती, आपकी कलम प्रतिक्रियावादीयों के नाम पर निर्दोष ग्रामीणें की हत्‍या, उनके घर जलाए जाने, उनकी प्रतिष्‍ठा से बलात्‍कार किए जाने पर क्‍यों लकवा मारे की तरह खामोश हो जाती है, यह समझना मुश्‍िकल है।
    आप का यह रूदाली गान क्‍यों कर है, यह मैं समझता हूं, पर क्‍या यह बेहतर ना हो कि, आप यह स्‍पष्‍ट करें कि, आप पत्रकार के रूप में नही, बल्‍िक विशेषकर भाजपा सरकार और खासकर रमन के प्रवक्‍ता बन प्रलाप पर आमादा है, और इसे आप स्‍वीकार करें।

    उद्योग के प्रति अत्‍यधिक ममता रखने वाले सी एम साहब के बस्‍तर में क्‍या निहितार्थ है, यह सारे तथ्‍य स्‍पष्‍ट है। सच है एक डॉक्‍टर से सरकार को क्‍या खून्‍नस, लेकिन आप उस डॉक्‍टर की बात कर रहे है, जिसने सरकार पोषित सशस्‍त्र समुह का विरोध किया है, जिसने आदिवासीयों के सामूहिक नरसंहार का विरोध किया है।

    सरकार हत्‍याएं कराए और उसे नक्‍सल उन्‍मुलन का नाम दे, तो किसी को तकलीफ नही होती हद है यह तो।

    पंकज जी शब्‍दों का अच्‍छा इस्‍तमाल किया आपने, पर आपके शब्‍द जाल हत्‍याओं लाशों खून की गंधों, और बलात्‍कार की पीडा से चीख रही महिलाओं, अपना घर जलते देखने वाले ग्रामीणों आदिवासीयों की आवाज और तकलीफ से दूर नही कराते।

  • पंकज झा. said:

    धन्यवाद चंद्रशेखर जी. आपके प्रोफाइल से पता चला की आप बेल्जियम में हैं. तो वहाँ रहते हुए भी अपने देश की घटनाओं पर आपकी पैनी नज़र तारीफ़ की मान करता है. बहुत साधुवाद.
    याज्ञवल्क्य जी आपका भी आभार. टिप्पणी में आपके द्वारा उठाये गए सवालों का जबाब हम निरंतर विभिन्न लेखों में देने की कोशिश करते रहते हैं. अगले किसी लेख में भी मुझे आपकी प्रतिक्रिया से मदद मिलेगी…आभारी हूँ सदा की तरह.

  • संदीप कुमार said:

    ग़लत बात को कहने के लिए किस तरह सही शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है या यूं कहें कि किस तरह शब्दों का मायाजाल बुना जाता है, ये लेख उसकी मिसाल बन सकता है.चंद्रशेखर जी तो फंस भी गए इसमें.बहरहाल,पंकज जी नक्सलवाद को महज़ कानून-व्यवस्था की समस्या मानने वाले ‘धरती पुत्रों’ के निकम्मेपन का ही नतीजा है कि आज छत्तीसगढ़ में ऐसे हालात हैं.और बात सिर्फ एक डॉक्टर से खुन्नस होने की नहीं है.छत्तीसगढ़ की सरकार ने ऐसे ना जाने कितने निरीह आदिवासियों और निर्दोष लोगों को जेल में बंद कर रखा है.बिनायक सेन का तो क़द इतना बड़ा है कि उनका मामला सुर्खियों में आ गया.आदिवासियों को मुफ्त में चावल, नमक बांट कर.उन्हें दारू के दलदल में ढकेलकर सरकार क्या हासिल करना चाहती है,इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है.बरसों से बस्तर किसके लिए ‘उत्पाद’ बना हुआ है, ये भी किसी से छुपा हुआ नहीं है.सरकार की उद्योग नीति के बारे में आपकी धारदार कलम कुछ क्यों नहीं उगलती जो बस्तर को निगले जा रही है.दरअसल,ये समस्या इस देश की सभी सरकारों के साथ है जो जनादेश को दमन करने का लाइसेंस मान बैठती हैं और फिर अपनी बात मनवाने के लिए ‘कुछ भी’ करने की घातक नीति अपनाती हैं. जो रास्ते में आए, विरोध करे वो देश का दुश्मन.बिनायक सेन को सज़ा उस छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा अधिनियम के तहत सुनाई गई है जिसकी वैधता विचाराधीन है..और हां, बिनायक सेन जैसे लोगों की वजह से ही लोकतंत्र की कुछ ‘हैसियत’ बची हुई है..

  • कुमार गौरव said:

    मासा-अल्लाह आप शानदार लिखते हैं, पर कहीं ना कहीं ऐसा लगता है, किसी को खुश करने के लिए ऐसा लिख रहे हैं . थोडा न्यूट्रल हो कर लिखें तभी पढने का मजा आता है . गलत को गलत कहिये पर सही को सही कहने की भी हिम्मत करिए . नौकरी तो अपनी जगह है पर सोच की भी तो कुछ अहमियत होनी चाहिए

  • पंकज झा. said:

    असहमति लायक लेकिन सुन्दर टिप्पणी…आभार संदीप जी.

  • ChandraShekhar Pati Tripathi said:

    पंकज सर,
    पूरी कोशिश करता हूँ की पता चलता रहे की देश में क्या हो जा रहा है..आखिर देश हमारा और हम देश के ..
    संदीप जी,
    यहाँ फंसने फंसाने जैसी कोई बात नहीं है…बात सिर्फ विचारधाराओं की है…आप राष्ट्रवादी हो सकते हैं या विनायकसेन वादी …..मेरे लिए राष्ट्र सर्वोपरि है…आजाद भारत के नागरिक होने के कारण आप चुन सकते हैं और लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है की यह आपको अपने विरोध में बोलने की भी आजादी देता है…..जिसका परिणाम आज अरुंधती राय जैसे कुछ लोग हैं……
    आर्थिक मंदी के दौरान मार्क टुली ने कहा था की भारत एक बहुत बड़ा जहाज है और इस पर छोटी मोटी झंझावातों का कोई ख़ास असर नहीं होने वाला…कुछ ऐसी ही बात हमारे लोकतंत्र के समर्थन में भी जाती है…

    धन्यवाद!!!!!!

  • sandeep said:

    चंद्रशेखर जी,बिलकुल सही कहा आपने.बात विचारधारा की है.लेकिन विचारधारा को थोपा नहीं जा सकता.कुछ लोग देश में यही करने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं.मैं कोई ‘वादी’ नहीं हूं.बिनायकवादी तो बिलकुल नहीं.मैं बस इस देश का नागरिक हूं.एक पत्रकार की हैसियत से मुझे जो ठीक लगता है,वो कहता हूं.अपने कमेंट में आप पर की गई टिप्पणी को लेकर क्षमाप्रार्थी हूं.

  • ChandraShekhar Pati Tripathi said:

    संदीप जी,
    आपकी टिप्पणी में ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके लिए क्षमा मांगी जाये..खैर..सबकी अपनी अपनी सोच होती है……और इसी तरीके से हमें सिक्के के दूसरे पहलू के बारे में भी जानकारी मिलती है.
    भारत राष्ट्र का एक नागरिक होने के नाते मै भी कोशिश करता हूँ की सकारात्मक मुद्दों पर सकारात्मक राय रखी जाये…….

    सादर धन्यवाद के साथ ….