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कहते हो देवी और बलात्कार भी करते हो?

20 April 2011 4 Comments

रचना त्रिपाठी युवा पत्रकार हैं। देहरादून की रहने वाली हैं। रचना पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही हैं। आंखों में सपना बुन रही हैं—मीडिया का भविष्य बनने वालों में मेरा भी नाम हो। हमने रचना से चौराहा पर लिखने के लिए कहा। उन्होंने शुरुआती हिचक के बाद एक लेख लिखा भी। स्थूल तौर पर यह लेख स्त्री विमर्श के कैशोर्य पाठ जैसा है, जिसमें आंकड़ों और तर्कों से अलग कुछ प्रश्न हैं। यूं, रचना का ये लेख जितना सच्चा है, कहीं ना कहीं उतनी ही निराशा से भी भरा है। रचना ने तो हिम्मत और साफगोई के साथ विनम्र ढंग से बात रखी है, अब जवाब हमें तलाशने हैं…। आखिरकार, पत्रकारिता की नई पीढ़ी को हम खुला आसमान और विस्तृत ज़मीन देने की जगह ऐसा माहौल क्यों दे रहे हैं। ऐसे हालात क्यों हैं, जिनके चलते उसे सवाल करना पड़ता है—एक तरफ तो देवी कहते हो और दूसरी ओर बलात्कार भी करते हो!

 

कहते हैं,  कन्यादान से बढ़कर कोई और दान नहीं होता, बेटियां देवी का रूप होती हैं,  घर में बहू लक्ष्मी बनकर आती है…वगैरह-वगैरह। महिलाओं का कितना गुणगान होता है, इतनी मान्यताएं हैं…ऐसा बयान होता है, जिससे कभी-कभी लगता है कि उन्हें देवियों के समानांतर सिंहासन पर बैठा दिया गया है। ज्यादा नहीं, तो कम से कम वर्ष में दो बार तो उन्हें पूज ही लिया जाता है।ये सबकुछ सिक्के के दो पहलुओं की तरह है। ये है सिक्के का एक पहलू, जो आज की इस भीड़ भरी दुनिया में बहुत ही कम देखने को मिलता है।

कभी-कभार ही ऐसे अवसर आते हैं, जब देवीगान होता है और जो बातें आए दिन सुनने को मिलती हैं, वो हैं— कन्या भ्रूणहत्या, दहेज़ के लिए महिला को जलाया, दुराचार और न जाने क्या-क्या…हम हर वर्ष बड़ी शान से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं और भाई मनाएं भी क्यों न? आखिर,  आज महिलाएं हर क्षेत्र में  नाम कमा रही हैं। राष्ट्र का सर्वोच्च पद ही महिला संभाल रही हैं। यही नहीं, संसद की गरिमा भी एक महिला के हाथों है…।

लेकिन मुझे अपनी 22 साल की ज़िंदगी में ये बात कभी समझ नहीं आई कि लोग हमेशा इसी तथ्य को क्यों देखते हैं कि कोईफिल्म अभिनेत्री या कोई महिला नेता खुश है, तो स्थिति हर जगह एक-सी ही होगी…? माना  कि आज महिलाएं सफलता की ओर बढ़ रीह हैं, लेकिन अगर समाज के विचार इतने ही बदल गए होते, तो आज लिंगानुपात इतना बढ़ नहीं गया होता(1000 लड़के और कुल 914 लड़कियां)। इतनी भ्रूणहत्या के मामले सामने नहींआते….जब जन्म ही नहीं लेने दिया जा रहा तो आगे की बात क्या कहिएगा और अगर गलती से इस दुनिया में आ भी गई…तब घरवाले ही उसे जीने नहीं देंगे।

राह चलते कोई परेशान करेगा तो वो खुद मर जाएगी या फिर यूँ कहें कि ससुराल वाले दहेज़ के नाम पर उसकी बलिचढ़ा देंगे। किसी भी सूरत में जिंदगी तो एक महिला की ही ख़त्म होनी है. पुरुष प्रधान समाज में जहाँ महिलाओं को कोई निर्णय लेने की भी आज़ादी नहीं है, वो खुद ही मरना बेहतर विकल्प मान लेती है। ये अमिट सच है कि कुरीतियों और भ्रांतियों को समाप्त नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं, जब संसार ही नहीं बचेगा…अंततः “जननी तो महिला ही है”

4 Comments »

  • tejwani girdhar, ajmer said:

    लाजवाब रचना है, साधुवाद

  • Deepak SHUKLA said:

    Dear Rachna,

    Now seen has been changed.

  • मनु मंजू शुक्ला said:

    बकरे को हलाल करने से पहले सजाया और सवारा जाता है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
    उसी प्रकार लडकियों को भी पुरुष दासत्व के लिया हजारो अलंकारो से अलंकृत किया जाता है जनाबा

  • पंकज झा. said:

    सोचनीय रचना….बधाई.