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एक मई को जंतर-मंतर पर ज़रूर आना…

19 April 2011 No Comment

उन्होंने ताजमहल बनाया और बदले में हाथ कटवा दिए, बिल्डिंगें बनाईं और फुटपाथ पर सोए, वो मज़दूर हैं, इसलिए हर खुशी से दूर हैं। अब वो नाराज़ हैं और इसका इज़हार भी कर रहे हैं

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के…भारत की शहरी और ग्रामीण मज़दूर आबादी असहनीय और अकथनीय परेशानी और बदहाली का जीवन बिता रही है। इसमें असंगठित क्षेत्र के ग्रामीण और शहरी मज़दूरों तथा संगठित क्षेत्र के असंगठित मज़दूरों की दशा सबसे बुरी है। उदारीकरण-निजीकरण के बीस वर्षों में जो भी तरक़्क़ी हुई है, उसका फल ऊपर की 15 फ़ीसदी आबादी को ही मिला है। इस दौरान अमीर-ग़रीब के बीच की खाई भारतीय इतिहास में सबसे तेज़ रफ़्तार से बढ़ी है। तेज़ आर्थिक तरक्क़ी के इन बीस वर्षों ने मेहनतकशों को और अधिक बदहाल बना दिया है। आँकड़े इन तथ्यों के गवाह हैं। सरकारें भरोसा दिलाती रहीं और वे इन्तज़ार करते रहे, लेकिन विकास का एक क़तरा भी रिसकर मेहनतकशों की अँधेरी दुनिया तक नहीं पहुँचा। क्या इनकी आवाज़ सुनी जाएगी…एक कोशिश, तो एक मई को जंतर-मंतर पर हो रही है…इस सिलसिले में Email से मिला एक वर्चुअल खत हम चौराहा पर शेयर कर रहे हैं…

 

लम्बे संघर्षों और क़ुर्बानियों की बदौलत जो क़ानूनी अधिकार मज़दूरों ने हासिल किये थे, आज उनमें से ज़्यादातर छीने जा चुके हैं। जो पुराने श्रम क़ानून (जो क़तई नाकाफ़ी हैं) काग़ज़ों पर मौजूद हैं, उनका व्यवहार में लगभग कोई मतलब नहीं रह गया है। दिखावे के लिए सरकार जो नए क़ानून बना रही है, वे ज़्यादातर प्रभावहीन और पाखण्डपूर्ण हैं या मालिकों के पक्ष में हैं। श्रम क़ानून न केवल बेहद उलझे हुए हैं, बल्कि न्याय की पूरी प्रक्रिया अत्यन्त जटिल और लम्बी है और मज़दूरों को शायद ही कभी न्याय मिल पाता है। श्रम विभाग के कार्यालयों, अधिकारियों, कर्मचारियों की संख्या ज़रूरत से काफ़ी कम है और श्रम क़ानूनों को लागू करवाने के बजाय यह विभाग प्राय: मालिकों के एजेण्ट की भूमिका निभाता है। श्रम न्यायालयों और औद्योगिक ट्रिब्यूनलों की संख्या भी काफ़ी कम है। भारत की मेहनतकश जनता के लिए संविधानप्रदत्त जीने के मूलभूत अधिकार का कोई मतलब नहीं है। नागरिक आज़ादी और लोकतान्त्रिक अधिकार उनके लिए बेमानी हैं।

देश के 90 प्रतिशत से ज़्यादा औद्योगिक और ग्रामीण मज़दूरों को न्‍यूनतम मज़दूरी, काम के घण्‍टों की उचित सीमा, ई.एस.आई.,जॉब कार्ड जैसे बुनियादी अधिकार भी हासिल नहीं हैं। नारकीय, अस्‍वास्‍थ्‍यकर और ख़तरनाक हालात में जीते और काम करते हुए वे 12-12,14-14 घण्‍टों तक खटने के बाद भी जीवन की बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाते। भीषण महँगाई के इस दौर में कारख़ानों में काम करने वाले ज़्यादातर मज़दूर 8 घण्‍टे काम के लिए 1800 से 4500 के बीच पाते हैं। आये दिन होने वाली दुर्घटनाओं में मौत या घायल होने पर मुआवज़ा तो दूर, अक्‍सर इलाज भी नहीं कराया जाता और काम से हटा भी दिया जाता है। ज़्यादातर मज़दूर ठेके, कैज़ुअल, दिहाड़ी या पीसरेट पर काम करते हैं और उनके लिए कोई भी श्रम क़ानून लागू नहीं होता। किसी भी रूप में एकजुट या संगठित होने की कोशिश करने पर मज़दूरों को या तो सीधे निकाल दिया जाता है या फिर पुलिस और प्रशासन के पूरे सहयोग से दमन-उत्‍पीड़न-आतंक का शिकार बनाया जाता है।

इन हालात में, भारत के मज़दूर, भारत की संसद और सरकार को बता देना चाहते हैं कि उन्‍हें यह अन्‍धेरगर्दी, यह अनाचार-अत्याचार अब और अधिक बर्दाश्त नहीं। मज़दूर वर्ग को हर क़ीमत पर हक़ और इंसाफ़ चाहिए और इसके लिए एक लम्बी मुहिम की शुरुआत कर दी गयी है। इसके पहले क़दम के तौर पर, संसद में बैठे जन-प्रतिनिधियों और शासन चलाने वाली सरकार के सामने, सम्मानपूर्वक जीने के लिए,अपनी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करते हुए जीने के लिए, अपने न्यायसंगत और लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए, और इस देश की तमाम तरक़्क़ी में अपना वाजिब हक़ पाने के लिए मज़दूरों का एक माँग-पत्रक प्रस्तुत किया जा रहा है। इस माँग-पत्रक में कुल 26 श्रेणी की माँगें हैं जोभारत के मज़दूर वर्ग की लगभग सभी प्रमुख आवश्‍यकताओं का प्रतिनिधित्‍व करती हैं और साथ ही उसकी राजनीतिक माँगों को भी अभिव्‍यक्‍त करती हैं।

1 मई, 2011 को देश के कई हिस्‍सों के मज़दूर हज़ारों मज़दूरों के हस्‍ताक्षरों से युक्‍त इसमाँग-पत्रक को लेकर दिल्‍ली में संसद पर दस्‍तक देंगे।

फ़ि‍लहाल मज़दूर संसद में बैठे बहरों से बस यह माँग कर रहे हैं कि इस देश के क़ानून मज़दूरों को जो हक़ देने की बात करते हैं, उन्‍हें लागू करने का इन्‍तज़ाम तो करो। इंसान के नाते जीने के लिए जो कुछ चाहिए, न्‍यूनतम वह तो दो। मज़दूर वर्ग की लड़ाई बहुत आगे तक जाती है, लेकिन अभी अपने जनवादी (लोकतांत्रिक) अधिकारों की माँग से शुरुआत की जा रही है।
यह नयी पहल इस मामले में महत्‍वपूर्ण है कि मज़दूर अलग-अलग झण्‍डे-बैनर के तले नहीं बल्कि ‘मज़दूर माँग-पत्रकआन्‍दोलन’ के एक ही साझा बैनर के तले अपनी माँगें रख रहे हैं। अलग-अलग मालिकों से लड़ने में मज़दूर खण्‍ड-खण्‍ड में बँट जाते हैं जिसका सीधा फ़ायदा मालिकों को होता है। इसलिए ‘मज़दूर माँग-पत्रक आन्‍दोलन’ पूरे मज़दूर वर्ग की माँगों को देश की हुक़ूमत के सामने रख रहा है।
इस आन्‍दोलन की माँगों को गढ़ने में देश के अलग-अलग हिस्‍सों में काम करने वाले कुछ स्‍वतंत्र मज़दूर संगठनों, यूनियनों और मज़दूर अख़बार की भूमिका है, लेकिन यह स्‍पष्‍ट करना ज़रूरी है कि यह आन्‍दोलन किसी यूनियन, संगठन या राजनीतिक पार्टी के बैनर तले नहीं है। इसका प्रारूप तैयार करने और इसे मज़दूरों तक पहुँचाने में इन स्‍वतंत्र मज़दूर संगठनों, यूनियनों और मज़दूर अख़बार ने पहल की है,इस पर विचार-विमर्श के लिए कुछ इलाक़ों में हुई मज़दूरों की छोटी-छोटी पंचायतों की भी इसमें भूमिका है, लेकिन इसका लक्ष्‍य है कि ‘मज़दूर माँग-पत्रक आन्‍दोलन’ उन सबका आन्‍दोलन बने जिनकी माँगें इसमें उठायी गयी हैं, यानी देश के समस्‍त मज़दूर वर्ग का साझा आन्‍दोलन बने। यह आन्‍दोलन कई चक्रों में चलेगा।

ऐतिहासिक मई दिवस की 125वीं वर्षगाँठ के अवसर पर एक प्रतीकात्‍मक आरम्‍भ किया जा रहा है है। मज़दूर वर्ग की मुक्ति की लम्बी लड़ाई का यह पहला क़दम है।

आज यह शुरुआत प्रतीकात्‍मक है क्‍योंकि विशाल मज़दूर वर्ग आज बिखरा हुआ और असंगठित है। लेकिन यह ऐसे ही नहीं रहेगा। शहरों और गाँवों की सर्वहारा तथा अर्द्धसर्वहारा आबादी आज तक़रीबन 75 करोड़ है। इसे लगातार बदहाली का शिकार हो रहे निम्‍न-मध्‍यवर्ग का भी समर्थन मिलेगा। संगठित होकर यह एक बहुत बड़ी ताक़त बनेगी। देश की तीन-चौथाई आबादी के हक़ों की यह बात आगे बढ़ेगी तो बहुत दूर तक जायेगी।

हम आप सबसे इस आन्‍दोलन में साथ देने की अपील कर रहे हैं। अगर आप मज़दूर हैं तो इस माँग-पत्रक पर हस्‍ताक्षर कीजिए, अपने साथियों से कराइये और 1 मई को दिल्‍ली के जन्‍तर-मन्‍तर पर पहुँचने की तैयारी कीजिए। अगर आप मज़दूर नहीं हैं तो अपने आसपास की मज़दूर बस्तियों में जाकर इस माँग-पत्रक के बारे में बताइये, इस पर हस्‍ताक्षर कराइये और इसके समर्थन में आप भी दिल्‍ली के जन्‍तर-मन्‍तर पर पहुँचिये। पिछले कुछ महीनों से मज़दूरों की बस्तियों, कारख़ाना इलाकों, लॉजों-बेड़ों, झुग्गियों में गली-गली, कमरे-कमरे जाकर माँग-पत्रक पर मज़दूरों के हस्‍ताक्षर कराये जा रहे हैं, रात्रि बैठकें की जा रही हैं, टोलियाँ बनाकर माँग-पत्रक का प्रचार किया जा रहा है। आप में से जिसे भी, जहाँ भी ये माँगें वाजिब, न्‍यायपूर्ण लगें, वह अपने इलाके में हस्‍ताक्षर जुटाना शुरू कर सकता है, या हमारे साथ इन कार्रवाइयों में शामिल होने के लिए हमसे सम्‍पर्क कर सकता है।

बेशक इस माँग-पत्रक पर हस्‍ताक्षर केवल मज़दूरों के होने हैं लेकिन जो भी इससे सहमत है उसे दिल्‍ली पहुँचकर अपनी एकजुटता का इज़हार ज़रूर करना चाहिए। मध्‍यवर्ग के लोग भ्रष्‍टाचार से बहुत परेशान हैं लेकिन सबसे बड़ा भ्रष्‍टाचार तो वह है जो देश के तमाम मेहनतकशों को उनकी मेहनत के फल से लगातार वंचित रखता है। पिछले 20 वर्ष में देश में जिस स्‍वर्ग का निर्माण हुआ है उसके तलघर के अँधेरे में रहने वाली 80 फ़ीसदी आबादी को मूलभूत अधिकारों से भी वंचित करके न्‍याय की दुहाइयाँ नहीं दी जा सकतीं। यह सोया हुआ ज्‍वालामुखी जब जागेगा तो स्‍वर्ग की मीनारें काँप उठेंगी।

हर लम्‍बे सफ़र की शुरुआत एक छोटे-से क़दम से होती है। हक़ और इंसाफ़ के लिए इस मुहिम का साथ देने के लिए हम आपका आह्वान करते हैं!

– संयोजन समिति, मज़दूर माँग-पत्रक आन्‍दोलन-2011

An appeal for solidarity to all justice-loving people

The urban and rural working class population of India is living through a life of intolerable and unutterable misery, injustice and economic oppression. In other words it can be best described as a ‘cold day in hell’. The condition of the urban and rural laborers working in unorganized sector and the unorganized laborers of the organized sector is worst amongst them.

The fruits of the progress achieved in the last twenty years of the market liberalisation and privatisation have been enjoyed by the top 15 percent of the total Indian population while the gulf between the rich and poor has yawned to an unprecedented scale. In these   twenty years of rapid economic development, the condition of the toiling masses has worsened. Government data alone is enough to justify this claim.

The workers have only got promises after promises from successive governments but not a single drop of development trickled down to their dark world.Whatever legal rights the workers had managed to achieve through prolonged struggles and sacrifices, have been mostly snatched back .

The age old labor laws present in the statute book, insufficient enough as they are, have been rendered meaningless in practice.  Whatever new laws are introduced by the government as ostentation, are either mostly ineffective and hypocritical or they are pro-capitalist. The labor laws are not only intriguing but also the whole process of justice is so complex and lengthy that the laborers hardly have any chance to get justice .

The number of labor dept offices including the officers and the staffs are vastly inadequate and instead of fulfilling its duty of enforcing the labor laws these labor departments often end up acting as an agent of the industry owners .Even the number of labor courts and industrial tribunals are grossly inadequate. For the toiling masses of India, the fundamental right to life as guaranteed by the Constitution has been rendered meaningless.

Civil liberty and democratic rights bear no meaning to them. The state machinery is always geared to suppress, directly or indirectly, strike and all the democratic means of resistance through the draconian laws and despotic bureaucracy.The basic rights such as minimum wages, proper limit of the working hours, ESI, job card etc. are not available to more than 90% of the industrial and rural laborers of India. Even after toiling for 12-14 hours at a stretch in hellish, unhygienic and dangerous conditions they hardly get enough money needed to fulfill their basic needs.

Even in these days of severe price-rise, most of the factory workers are paid a paltry sum, ranging between 1800 to 4500 rupees per month for 8 hours of work. In case of death or injury due to the accidents occurring frequently in the workplaces, they are hardly compensated and often not even provided with the basic medication as well, and rather sacked from the job. Most of the workers here are contract, casual, wage and piece-rate laborers and not even a single labor law is implemented for them.Under these circumstances, the workers of India, would like to let the Parliament and the Government Of India know that, they are not going to bear any more this anarchy and the atrocities meted to them. Enough is enough! They want justice and our rights back and we will regain it at any cost.

This is just the beginning of a long campaign. And  as a first step towards  this, they are planning to presentthis charter to the people’s representatives occupying the Parliament and also the parties ruling at the centre  for  a dignified life,for living by  fulfilling our basic necessities of life, for their just and democratic demands and for gaining their legitimate share in the development of this country.This charter has 26 categories of demands which represent almost all the major needs and political demands of the working class people of India.

On the forthcoming labor day (1 May, 2011) workers from several parts of the country will knock on the doors of the parliament in Delhi, along with this charter signed by thousands of workers across the country.As for the present, the workers are not asking the deaf occupying the parliament for anything more than just implementing the basic rights guaranteed by the constitution of the land, for us. We are only asking for the minimum requirements a human being needs to live.

The struggle of the working class has a long way to go but for the time being let us start this long journey with the demand for our democratic rights, as a first step.The significance of this movement is that the workers are presenting their demands under the combined banner of the ‘Workers’ Charter Movement’ instead of different banners. Fighting different owners separately divides the workers and thus weakens the whole struggle, which ultimately benefits the industrialists.

For this reason, the ‘Workers’ Charter Movement’ is presenting the common demands of the whole working class, in front of the rulers of the country.Some independent labor organisations and unions active in different parts of the country and a labor journal played a major role in formulating the demands in this charter and a few small labor assemblies (Mazdoor Panchayats) also aided in this process; and they have taken the initiative to draft the charter and take it to the workers, but at the same time it also has to be clarified that this movement is not under the banner of any union, organisation or political party at all.

The aim is that the ‘Workers’ Charter Movement’ should become the struggle of all those working people, whose demands are mentioned in the charter, thus to transform it into a unified struggle of the whole working class of the country. This movement is intended to run in several phases and cycles. A symbolic start is being made on the occasion of the 125th anniversary of the historic ‘May Day’. This is the first step towards the long march for the liberation of the working class.Today, this start is a symbolic one because the vast working class population is divided and unorganised. But this cannot remain as such for long.

The number of urban and rural proletariat along with the semi-proletariats in India, is about 75 crores. It will also gain support of the lower middle class, who are constantly been oppressed by this suppressive regime. When organised, it would become a very strong force. The demand for the rights of this three-fourth of the total population would go a long way.

Since the past few months, teams of workers and activists have been visiting industrial areas, workers colonies, workers lodges, lanes and by-lanes in the slums – where ever workers live, to educate the workers about the charter and get it signed by them.

Night meetings are held and street meetings and cultural shows are organised to popularise the charter in several areas.We appeal to all the people to build solidarity and stand by this movement. If you are a worker then don’t forget to sign this charter yourself, get it signed by your fellow workers and also be present at Jantar Mantar (New Delhi) on 1st May.

If you are not a worker, go to the labor colonies and slums around you, educate them about the charter and its implications, get it signed by them and come with us at the Jantar Mantar to express solidarity on the said date. Though the signatures in this charter should be of the worker’s alone but whoever agrees with these demands should certainly reach Delhi to express solidarity.

The middle class is evidently unhappy with the rampant corruption in our system but isn’t it the biggest corruption which constantly denies the workers, the fruit they yield with their blood and tears? There can be no justice when 80% of the population lives in continuous denial of their basic rights.

Anguish of the people is mounting high and the day this dormant volcano wakes up, the pillars of the heaven will be terribly shaken for sure.The beginning of every long journey starts with a small step. We invite you to join and stand by this campaign for rights and justice.

– Convening Committee, Worker’s Charter Movement – 2011.

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