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गुसलखाना और फेक आई डी का रहस्य

18 April 2011 No Comment


एक रोचक संस्मरण, लेखिका-रश्मि रवीजा

तब दोनों ऐसे  मासूम दिखते थे

शीर्षक तो इण्डिया टी.वी. के तर्ज़ पर लग रहा है…पर पोस्ट बड़ी घरेलू सी है.
संस्मरण है। ऐसे ही पढ़िए। पति और बच्चों को बेवकूफ बनाने की अलग से कोई कोशिश नहीं की…पर अनजाने ही वे लोग धोखा खा बैठे…:)
कुछ साल पहले का वाकया है..एक दिन मेरे दोनों बेटे किंजल्क और कनिष्क खेल कर आए और नहाने जाने की तैयारी करने लगे…मैने यूँ ही पूछ लिया …”कौन जायेगा…..गुसलखाना ?” और दोनों भाग कर मेरे पास आ गए…”हम चलेंगे…हम चलेंगे “…अब मुझे लगा कि इसका मतलब ये लोग नहीं जानते…मैने कह दिया, “अच्छा ..पहले नहा धो लो फिर देखते हैं…दरअसल इन्हें लगा…”केक खजाना “…”खाना खज़ाना ” जैसा कोई रेस्टोरेंट है. नहा कर आए तो मैने  कह दिया, “आज तो देर हो गयी….कभी और चलेंगे”

फिर तो ये रोज़ का किस्सा हो गया…ये लोग गुसलखाने जाने की जिद करते और मैं रोज बहाने बना देती…”आज तुमलोगों ने ये शैतानी की….आज ये कहा नहीं माना …गुसलखाना जाना कैंसिल”.
एक दिन किंजल्क ने पूछा…”इतना तो बात दो…कहाँ पर है?..कितनी दूर है?”
मैने कहा,  “हर जगह है..”
“अच्छा!!..हमारे एरिया में भी?…फिर हमने बोर्ड कैसे नहीं देखा?”
“अब पता नहीं कहाँ ध्यान रहता है तुमलोग का…जो नहीं देखा ”
मुझे मजा आ रहा था…एक दिन पतिदेव के सामने भी अनाउन्समेंट हो गयी….”मम्मी ने प्रॉमिस किया है, हमलोगों को गुसलखाना लेकर जायेगी …आप भी चलेंगे ?”

इसके पहले कि पतिदेव राज़ खोलते मैने बात बदल दी…और इशारा कर दिया…उस दिन वे मान भी गए वरना ‘सांटा क्लॉज़’  की गिफ्ट का रहस्य खोलने को हमेशा उतारू रहते थे.

अब ऐसे शैतान दिखते हैं
पर एक दिनी दोनों ने सुबह से मेरी हर बात मानी …अच्छे बच्चे बन कर दिखाया तो मुझे राज़ खोलना ही पड़ा….पर ज्यादा मजा  नहीं आया क्यूंकि हंसने वाली अकेली मैं ही थी…दोनों खिसियानी सूरत बनाए मुझे घूर रहे थे और फिर उन्हें मैकडोनाल्ड भी लेकर जाना पड़ा. {आपलोग भी आजमा सकते हैं….मुझे नहीं लगता आजकल के बच्चे इस शब्द का अर्थ जानते होंगे :)} 

अब फेक आई डी का किस्सा…..

करीब छः साल पहले मैने नया-नया इंटरनेट सर्फ़ करना सीखा था. उनदिनों  हम फ्रेंड्स एक दूसरे को अच्छे -अच्छे ई-मेल फौरवर्ड किया करते थे . पर पता नहीं मेरी आई डी में कुछ प्रॉब्लम आ गयी वो नहीं खुल रहा था. एक फ्रेंड ने सुझाया, तबतक एक अलग नाम से फेक आई डी बना लो…और मैने अलग नाम से एक आई डी  बना ली…और उसे जांचने के लिए कि ठीक बना है या नहीं…पति देव की आई डी पर  सिर्फ Hi …how r u ? लिख कर एक टेस्ट मेल भेजा . उनके इन्बौक्स में चेक भी कर लिया कि मेल डिलीवर हो गया है…..मतलब मेरी आई डी काम कर रही है. 

दूसरे दिन जब मेल चेक किया तो पाया सहेलियों के प्यारे प्यारे इमेल्स के साथ, पतिदेव का दो लाइन का जबाब भी पड़ा है कि “मैं आपको नहीं जानता…लगता है आपका मेल गलत एड्रेस पर आ गया है.”
अब मैने सोचा…जरा इसे लम्बा खींचना चाहिए…मैने बड़ी नम्रता से कुछ लम्बा ही इमेल लिखा, “आपने इतना व्यस्त होते हुए भी समय निकाल कर जबाब दिया….मैं बहुत इम्प्रेस्ड हुई ….आपसे दोस्ती करना चाहती हूँ…वगैरह वगैरह…” अपना सारा अंग्रजी ज्ञान उंडेल दिया कि पतिदेव इम्प्रेस्ड हो जाएँ.
अब, इंतज़ार था…जबाब  का..दूसरे दिन दो पंक्ति का जबाब आया, “मुझे दोस्ती करने में कोई दिलचस्पी नहीं है…..मैं दो बच्चों का  पिता हूँ..कृपया अब मेल ना करें ”

थोड़ी निराशा तो हुई…..पर मैने  हिम्मत नहीं हारी….फिर से जबाब लिखा…”कि कोई बात नहीं..मैं भी दो बच्चे की माँ   हूँ…अच्छी दोस्ती चाहती हूँ….बहुत अकेली हूँ…वगैरह..वगैरह” 

पतिदेव अक्सर ऑफिस जाने से पहले मेल चेक कर लिया करते थे…मैं जान बूझकर आस-पास ही मंडरा रही थी कि जरा चेहरे का एक्सप्रेशन देख सकूँ. थोड़ी भृकुटी चढ़ी देखी तो पूछ लिया..”क्या हुआ “, उन्होंने कहा ..”पता नहीं कोई  लेडी है..दोस्ती करना चाहती है …मना करने के बाद भी रोज मेल भेजती है….अभी इसे स्पैम में डालता हूँ ”
मैने थोड़ी सिफारिश की …”रिप्लाई करने में क्या जाता है….देखें …आगे क्या कहती है?”
पर उसके बाद उन्होंने कुछ ऐसा कहा  कि मुझे तुरंत ही सच बताना पड़ा……दरअसल कहा कि…”ये लोग कॉल गर्ल्स होती हैं…ऐसे ही मेल भेजा करती  हैं…”

और मेरा फिल्म “मित्र’ की तरह इस प्रकरण को लम्बा खींचने का मंसूबा अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गया. 🙁
(“मित्र’ फिल्म में पति-पत्नी ही चैट फ्रेंड हो जाते हैं….और एक दूसरे के गहरे दोस्त बन जाते हैं…एक दूसरे की समस्याएं हल करते हैं….पति काम के बहाने ड्राइंग रूम में बैठकर और पत्नी…बेडरूम से अपने अपने लैपटॉप से आपस में ही चैट करते हैं….)
पर हकीकत  और फिल्म में यही अंतर होता है.

रश्मि रवीजा मुंबई में रहती हैं। चर्चित ब्लॉगर हैं और तथाकथित ढंग से गरिष्ठ साहित्य लिखने वालों से अच्छी साहित्यकार हैं। उनकी ज़ुबानी ही सुनिए, उनका बाकी परिचय…”पढने का शौक तो बचपन से ही था। कॉलेज तक का सफ़र तय करते करते लिखने का शौक भी हो गया. ‘धर्मयुग’,’ साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘मनोरमा ‘ वगैरह में रचनाएँ छपने भी लगीं .पर जल्द ही घर गृहस्थी में उलझ गयी और लिखना,पेंटिंग करना सब ‘स्वान्तः सुखाय’ ही रह गया . जिम्मेवारियों से थोडी राहत मिली तो फिर से लेखन की दुनिया में लौटने की ख्वाहिश जगी.मुंबई आकाशवाणी से कहानियां और वार्ताएं प्रसारित होती हैं..यही कहूँगी “मंजिल मिले ना मिले , ये ग़म नहीं मंजिल की जुस्तजू में, मेरा कारवां तो है”

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