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Articles Archive for April 2012

यादें, साहित्य-सिनेमा-जीवन, स्मृति-शेष, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[28 Apr 2012 | Comments Off on कहानी / दफन नदी | ]
कहानी / दफन नदी

कथा के बारे में – ये एक कहानी है, पर महज कहानी नहीं। बचपन में बिछड़े दो दिलों की, दो मुल्कों की, यादों के एक बक्से की सच्ची दास्तां है। कहानी से एक अंश – इरशाद का कहना था कि यहां खुदाई की जाए तो जमीन के नीचे सोया हुआ पूरा एक शहर निकल सकता है। इसके लिए वे जूझ रहे हैं। पुरानी यादों को जगाना चाहते हैं। मुझे लगा मैं भी पाकिस्तान में अपनी पुरानी यादों को जगाने आया हूं, जहां की धरती से मेरे पापा जी और चाई …

दिल के झरोखे से..., यादें, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[23 Apr 2012 | One Comment | ]
मौन के शब्दकोश में हैं करोड़ों अनपढ़े पन्ने…

– चण्डीदत्त शुक्ल
उस भीगी दोपहर में
तुम्हारे भीगे हुए लफ्ज
और
मेरी सुलगी हुई कुछ सांसें
यूं ही नहीं उठा था धुआं।
रातरानी के आंचल से झांकता था चांद
लजाई हुई गौरेया दुबकी पड़ी थी शाख से सटकर
ऐसे ही थोड़े कुल्फी सी घुलती जा रही है रात
क़तरा-क़तरा घुलती है
ज़र्रा-ज़र्रा मिलती है
जिस्म से दिल तक,
बस एक सीलन है
उस पर बेअसर है याद का डिस्टेंपर।
ये सब पढ़कर
जब शब्दों में तुम हंसती हो
और अदृश्य रहते हैं तुम्हारे शरबती होंठ
कंचे जैसी कांपती आंखें
और तीखे धनुष की टंकार की तरह मिट्ठू नाक
तब,
यह तकनीक भी दुश्मन की तरह मिलती है।
फेसबुक के चैट …

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[19 Apr 2012 | One Comment | ]
मेरे न होने पे, मेरी तसवीर न लगाना…

– गार्गी मिश्रा
नाम तो नहीं लिखता कोई खुद का
और टांगता दीवारों पर…
क्या भूला है कभी खुद का नाम?
इश्क की बात कुछ और है…
नाम लिखना किसी के नाम के साथ रिवाजों सा है…
पर सुनो, इन रिवाजों से दूर ही रहना तुम
झूठी-मूठी लगने लगोगी … और फिर तुम्हारा वो “सच्ची मुच्ची” नहीं मानूंगा मैं…
तुम्हें न घूंघट करवाया है, ना तीज का व्रत
अपने ही घर पे क्यूं किरायेदार बनोगी?
सच-सच बताओ ज़रा
नावेल वाली रैक पे जमी धुल कब साफ़ की थी पिछली बार?
जब उतारती हो चढ़ के पीढ़े पे अचार का मर्तबान, तुम्हारे नाखूनों …

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[16 Apr 2012 | Comments Off on म्यां, नाराज़ क्यूं हो? | ]
म्यां, नाराज़ क्यूं हो?

– चण्डीदत्त शुक्ल
नाराज़ हो,
मेरे से.
म्यां,
कोई नई बात कही होती.
ये क्या,
भूत भगाने को,
इबादत की खातिर
लोहबान जलाना.

कभी
गुड नाइट छोड़के
मच्छर-मक्खी भगाने कू लोहबान जलाओ न.
अमां.
दिल के जले से मूं फुल्लाने वाले तुम कोन-से नए आदमी हो
किसी टकीला वाले अंबानी से गुस्सा के देखो.
आशिक को तो गली का कुत्ता भी भूंकता है
पूरा पंचम राग में
तार सप्तक छेड़ते हुए
ऊं-ऊं-उआं करके रोता है,
किसी रात साला किसी दरोगा पे रोके दिखाए
नाराज़ मती होओ
हम इश्क के मारे हैं,
तुम्हारी नाराज़गी बेकार जाएगी।
किब्ला.
इश्क ही कल्लो
नाराज़गी फरज़ी लगैगी
फिर तो,
एक ही कंबल में मूं लपेटे हमारे साथ पड़े रहोगे.
ये रोग किसी …

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[13 Apr 2012 | Comments Off on अभिनेता जाकिर हुसैन बने दारा शिकोह | ]
अभिनेता जाकिर हुसैन बने दारा शिकोह

इन दिनों दूरदर्शन पर हर रविवार सुबह १० बजे प्रसारित हो रहा है धारावाहिक ‘उपनिषद गंगा’. चिन्मय मिशन द्वारा निर्मित व डॉ चन्द्रप्रकाश दिव्वेदी द्वारा निर्देशित इस धारावाहिक ‘उपनिषद गंगा’ में अलग — अलग कहानियाँ दिखाई जा रही हैं.
अगले रविवार यानि ८ अप्रैल को अभिनेता जाकिर हुसैन दारा शिकोह की भूमिका में दिखाई देंगे. “अभी तक दारा शिकोह को बहुत सारे लोग सिर्फ औरंगजेब के बड़े भाई के रूप में ही जानते थे लेकिन इस धारावाहिक को देखने के बाद उन्हें पता चलेगा कि वो कितना गुणी था, कितना काबिल …