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Articles Archive for May 2011

चर्चा में किताब »

[19 May 2011 | Comments Off on रात पश्मीने की : गुलज़ार | ]

समीक्षा : डॉ शुभ्रा शर्मा

बहुत साल पहले गुलज़ार की चंद सतरें पढ़ी थीं –
नज़्म उलझी हुई है सीने में, मिसरे अटके पड़े हैं होठों पर
उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरह, लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं.
लेकिन अब गुलज़ार ने उन तितलियों से उड़ते अल्फ़ाज़ को पकड़कर काग़ज़ पर
बैठाया है और उन्हें ‘रात पश्मीने की’ नाम से शाया किया है. यह तो सच है
कि सर्दियों की रात में पश्मीने की नर्म-गुनगुनी गर्माहट बहुत दिलफ़रेब
होती है लेकिन इस पश्मीने के भीतर कुछ तेज़-तल्ख़ बातें भी हैं. वो शायर
जो कभी भी, कहीं भी, …

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[11 May 2011 | One Comment | ]
…हल हो जिंदगी का गणित

aha zindagi me prakashit lekh….
Source: एंटन बर्ग
क्या है जीवन, जन्म, पढ़ाई-लिखाई, प्रेम, शादी, बच्चे, बुढ़ापा और फिर मृत्यु? आखिरकार, जिंदगी का अर्थ क्या है? इसका अस्तित्व क्या है? वाह! क्या सवाल है! वैज्ञानिकों और विचारकों के साथ-साथ इस दुनिया में मौजूद हर इन्सान ये प्रश्न एक-दूसरे से पूछता है, लेकिन क्या हमारे पास इस सवाल का अब तक कोई पुख्ता जवाब है? हम लाख कोशिशों के बावजूद कहां जान सके हैं कि जीवन का अर्थ दरअसल क्या है? नहीं!
मेरे लिए तो जीवन एक विश्वास है। फिलहाल, जो वैज्ञानिक उत्तर मौजूद …

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[10 May 2011 | 2 Comments | ]

भाइयों, बार बार सोच रहा हूं कि आर्थिक रूप से गरीब रहना बड़ा अभिशाप है, गांव में रहना बड़ा दंड है, किसान होना कितना घटिया काम है. ऐसा इसलिए कि यूपी की पुलिस-पीएसी ग्रेटर नोएडा से लेकर आगरा तक के कई गांवों में घुसकर पर घर-घर की औरतों, बच्चों, युवकों, बुजुर्गों को जमकर पीटा, पैसा लूटा, छेड़छाड़ की. ग्रेटर नोएडा के भट्टा गांव की घटना ने तो हिलाकर रख दिया है. पुलिस ने कर्फ्यू लगा रखा है. कोई अंदर नहीं जा सकता, पीएसी पुलिस वालों ने कहर गांव के …

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[7 May 2011 | 4 Comments | ]
अरे तुम उहां काहे छुपा था जी???

पुरबिया टीवी चैनल में लादेन के मारे जाने के बाद कुछ ऐसे हुआ पिरोगिराम

* yagnyawalky vashishth
ई स्‍साला ओसमवा को उहां पाकिस्‍तान में छुपने का बुद्वि कउन दिया था जी, इहां भारत में रहता तो सब फ्री व्‍यवस्‍था में रहता न, कसाब जैसा कितना ठो चेला लोग है इंहा पे उसका। खाना वाना सब चकाचक मुर्गा बिरयानी झांय झांय पेलते रहता। इहां कउनो दिक्‍कत थोडे रहता, अमेरिका भी घंट नई उखाडने सकता। फोकटै मर गया स्‍साला।
चैनल वाला भी बौराया है, इक ठो चैनल में तो अइसा जोशाया कि,फुल स्‍क्रीन ब्रैकिंग ठोक …

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[7 May 2011 | One Comment | ]
योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए

यह कविता मजदूर दिवस पर है. आप सवाल कर सकते हैं फिर आज क्यों छापी जा रही है….इसका जवाब यही नज़्म, कविता देगी….रचना है आदिल रशीद की. उनका शुक्रिया.

योमे मजदूर/ मजदूर दिवस /लेबर डे/ labour day /aadil rasheed
खोखले नारों से दुनिया को बचाया जाए
आज के दिन ही हलफ इसका उठाया जाए
जब के मजदूर को हक उसका दिलाया जाए
योमें मजदूर उसी रोज़ मनाया जाए
ख़ुदकुशी के लिये कोई तो सबब होता है
कोई मर जाता है एहसास ये तब होता है
पेट और भूक का रिश्ता भी अजब होता है
जब किसी भूके को भर …