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Articles Archive for March 2011

दिल के झरोखे से... »

[31 Mar 2011 | One Comment | ]
अल्बर्ट आइंस्टीन की चिट्ठी के सहारे पुनर्विचार

`परमाणु संयत्रों पर आश्रित होना आज के परिप्रेक्ष्य में समझदारी नहीं होगी। जापान के फुकुशिमा परमाणु बिजलीघर में रेडियोएक्टिव छड़ें गलने से रोकने में विफलता के बाद परमाणु ऊर्जा के नए मूल्यांकन की जरूरत है’, ऐसा मानने वाले अब कई हैं, जो माहिर हैं। पढ़े-लिखे हैं। चौराहे पर जापान के संकट की चर्चा होनी ही थी, लेकिन इस चर्चा का संदर्भ वहां की त्रासदी नहीं है, ना ही मित्र देश के प्रति सहानुभूति भर…सच तो यह है कि जापान के बहाने हमें अपने देश की ज़रूरतों का भी पुनःविश्लेषण करना …

खेल-तमाशा »

[31 Mar 2011 | Comments Off on ता उम्र रहेगी गिलानी… | ]

विष्णु शर्मा आगरा के हैं। चर्चित टेलिविजन पत्रकार हैं। पहले अमर उजाला में भी रहे। ताज़ा वर्ल्डकप फीवर के सिलसिले में उनकी ओर से एक ई-मेल पोएम मिली। सामयिक है, इसलिए शेयर कर रहे हैं। कृपया इससे तात्कालिक आनंद लें और साहित्यिक मूल्य तलाशने में समय बरबाद ना करें। धन्यवाद। इसके साथ का चित्र फेसबुकिया मित्रों के सौजन्य से है :

ताउम्र रहेगी गिलानी को ग्लानि
क्यों मैंने मनमोहन मन्नू की बात मानी ;{
फुटेज खाने को मैं भी आ गया मोहाली
पूरे पाकिस्तान में अब पड़ रही हैं गाली
क्या पता था निकलेंगे फुके हुए …

साहित्य-सिनेमा-जीवन »

[31 Mar 2011 | Comments Off on तप मत कर। सब तय कर। धन तय कर। नकद पर नज़र रख। | ]
तप मत कर। सब तय कर। धन तय कर। नकद पर नज़र रख।

व्यंग्य, जैसे शब्दबेधी वाण…जैसे, ब्रह्मास्त्र। त्रासद यह है कि अब व्यंग्य की मारकता हास्य के तरकश में ही गुम हो रही है। ख़ैर, इतने भारी-भरकम शब्द चौराहा पर खटकेंगे, इसलिए बिना भाषण के अतुल कनक का व्यंग्य यहां। खास बात बता दें, इस पूरे पीस में कोई विराम नहीं है, ठहराव के बिना सरपट भागता हुआ। देखिए और कनक को चौराहे पर या फिर atulkanak@yahoo.com पर सीधे प्रतिक्रिया दीजिए : मॉडरेटर
 
# अतुल कनक
कनक सफल बन। अब असफल रह कर ग़म गलत मत कर। दरबदर मत भटक। अटक अटक कर मत चल। इधर- …

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[31 Mar 2011 | 5 Comments | ]
उन्मुक्त श्वास लूं मैं…

# कपिल शर्मा
एक मुक्त श्वास लूँ मैं
उन्मुक्त श्वास लूँ मैं
उन्मादित औ’ हर्षित
जग व्यक्त श्वास लूँ मैं
उद्वेग युगों का कैसे
क्षण में सिमट आता है?
किस क्षण श्वास तज दूं,
किस क्षण में श्वास लूँ मैं?
सौ सूर्यों की तपिश
क्यों व्याकुल निज करें
प्रकाश सारा पी कर
सशक्त श्वास लूँ मैं
कपिल शर्मा। पुणे में जॉब करते हैं। दरअसल, जॉब बदलते रहते हैं, लेकिन एक चीज़ उनकी कभी नहीं बदलती, वो है-चिंतन और अभिव्यक्ति। इंग्लिश में कविताएं लिखते हैं और कभी-कभी शुद्ध हिंदी लिखकर भी चौंका देते हैं। इनसे बात करना स्वयं में कोई लिट्रेचर पढ़ने के समान …

संगीत-कला, साहित्य-सिनेमा-जीवन, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[31 Mar 2011 | 4 Comments | ]
एक भटकता हुआ आत्म

कुछ लोग सचमुच `वर्सेटाइल’ होते हैं, महज कहने को ही नहीं। पंकज नारायण उनमें से एक हैं, उनका गद्य भी कविता की ख़ूबसूरती से सना-सजा होता है। पंकज फ़िल्मों से लेकर मंचों तक, पत्रकारिता से लेखन के अनगिनत विहानों तक विचरते हैं। मूलतः बिहार के रहने वाले हैं और फ़िलवक्त दिल्ली में जीवन-बसर, उन्हीं का लिखा हुआ कुछ चौराहा पर, पर इससे पहले भी बारी है उनके आत्मकथ्य की
याद नहीं, पहली बार कब अपने भीतर से ढिशुम-ढिशुम की आवाज़ आई कि तब से लड़ाई कभी थमी नहीं। रोज सोने से …