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Articles in the गांव-घर-समाज Category

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[25 Sep 2012 | Comments Off on जरूरी चीजों का चुनाव टी आर पी से नहीं किया जा सकता – ओम थानवी | ]

दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यानमाला
दिल्ली. मीडिया पर अब पूंजी का दबदबा साफ़ दिखाई दे रहा है. जब मीडिया व्यापार की वस्तु होगा तो वहां भाषा पर व्यापार का असर कैसे रोका जा सकता है. सुपरिचित लेखक और जनसत्ता के सम्पादक ओम थानवी ने हिन्दू कालेज में आयोजित एक व्याख्यान में कहा कि हमें यह ध्यान देना होगा कि जूते के कारोबार और अखबार में फर्क है क्योंकि सिर्फ सूचना देना ही मीडिया का काम नहीं बल्कि पाठकों की समझ बढ़ाना भी मीडिया की जिम्मेदारी है.
हिन्दी साहित्य सभा द्वारा वार्षिक …

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[25 Sep 2012 | Comments Off on जयपुर में शुरू हुआ स्ट्रीट वेंडर पॉलिसी का क्रियान्वयन | ]

जयपुर नगर निगम द्वारा स्ट्रीट वेंडरों को बिठाने के लिए बनाये गए कानून के क्रियान्वयन हेतु जयपुर नगर निगम द्वारा अधिकृत संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसायटी की ओर से जयपुर शहर में गरीब थड़ी, ठेली, फूटपाथ व्यवसायियों को बिठाने का काम शुरू कर दिया गया है| स्ट्रीट वेंडर कानून के अंतर्गत व्यवसायियों को चिह्नित करने के क्रम में गीता आश्रम, अजमेर रोड में कार्यक्रम आयोजित कर शहर के विद्याधर नगर व सिविल लाइन नगर निगम जोन के 800 फुटपाथ व्यवसायियों को पहचान पत्र दिया गया|
जीविका अभियान के संयोजक श्री अमित …

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[16 Aug 2012 | Comments Off on उपयोगिता सिद्ध करने में नाकाम रहा है योजना आयोगः जयतीर्थ राव | ]

जाने माने उद्योगपति व एमफेसिस (बीपीओ) के संस्थापक जयतीर्थ राव ने देश में केंद्रीय योजना आयोग उपयोगिता को सिरे से नकार दिया है। उन्होंने कहा है कि देश में ऐसे किसी भी आयोग की कोई जरूरत नहीं है। इतना ही नहीं जयतीर्थ राव ने योजना आयोग को देश की प्रगति के लिए बाधक बताते हुए कहा कि यदि यह आयोग नहीं होता तो देश आजादी के छह दशकों में वर्तमान की तुलना में कहीं अधिक प्रगति कर चुका होता। राव प्रख्यात अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन की जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में …

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[16 Aug 2012 | Comments Off on मन की मौज में न भूलें आजादी के मायने | ]
मन की मौज में न भूलें आजादी के मायने

दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित आलेख
चण्डीदत्त शुक्ल | Aug 15, 2012, 00:10AM IST

गांव के एक काका की याद आ रही है। रिश्तेदारी का ख्याल नहीं। शायद पुरखों की पट्टीदारी का कोई छोर जुड़ता होगा उनसे, पर हम सब उन्हें काका, यानी बड़े चाचा के बतौर ही जानते-पहचानते और मान देते। काका का असल नाम भी याद नहीं पड़ता। बच्चे-बड़े सब उन्हें मनमौजी कहते। मनमौजी का मतलब मस्त-मौला होने से नहीं था।
काका निर्द्वद्व, नियंत्रण के बिना, इधर-उधर घूमने वाले, दिन भर ऊंघने और शाम को चौपाल में बैठकर नई …

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[23 Mar 2012 | Comments Off on पंख होते तो उड़ जाती रे # अहमदाबाद | ]
पंख होते तो उड़ जाती रे # अहमदाबाद

– कोषा गुरंग
ज़ेहन में जब यादों के दरीचे खुलते हैं, ख्यालों में एक पुराने शहर की तस्वीर उभर आती है। वो शहर, कोई अनजाना-भूला-बिसरा-शहर नहीं, वहां की इमारतें-रास्ते मेरे लिए अपरिचित़, अचीन्हे नहीं। मेरा शहर अहमदाबाद।इस शहर में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का स्वागत मुस्लिम किया करते, वहीं हिंदू मोहर्रम में ताजियों की रखवाली करते। यूं ही एक-दूसरे के त्योहार और सुख-दुख आपस में बांटते। कुछ मुस्लिम सहेलियां थी, जिनके साथ स्कूल आना-जाना होता था। इतना ही नहीं, परिवार वालों का एक-दूसरे पर उतना ही विश्वास था। न जाने …