Home » Archive

Articles in the चर्चा में किताब Category

चर्चा में किताब »

[19 May 2011 | Comments Off on रात पश्मीने की : गुलज़ार | ]

समीक्षा : डॉ शुभ्रा शर्मा

बहुत साल पहले गुलज़ार की चंद सतरें पढ़ी थीं –
नज़्म उलझी हुई है सीने में, मिसरे अटके पड़े हैं होठों पर
उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरह, लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं.
लेकिन अब गुलज़ार ने उन तितलियों से उड़ते अल्फ़ाज़ को पकड़कर काग़ज़ पर
बैठाया है और उन्हें ‘रात पश्मीने की’ नाम से शाया किया है. यह तो सच है
कि सर्दियों की रात में पश्मीने की नर्म-गुनगुनी गर्माहट बहुत दिलफ़रेब
होती है लेकिन इस पश्मीने के भीतर कुछ तेज़-तल्ख़ बातें भी हैं. वो शायर
जो कभी भी, कहीं भी, …

चर्चा में किताब, संगीत-कला, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[27 Mar 2011 | 10 Comments | ]
कहानी / दूसरा जीवन

प्रभात रंजन। एकेडेमिक्स के साथ लिट्रेचर में भी उल्लेखनीय दखल। परिचय लिखते समय इतना अंग्रेजियाना इसलिए हो रहा हूं, क्योंकि उनका फॉर्मल इंट्रोडक्शन प्रतिलिपि बुक्स की वेबसाइट से उड़ाया है। हाल में ही प्रभात रंजन का नया कहानी संग्रह बोलेरो क्लास आया है। इसी संग्रह से उनकी एक कहानी यहां चौराहा के पाठकों के लिए, बरास्ता त्रिपुरारि कुमार शर्मा, और अब उधार मांगा गया परिचय…PRABHAT RANJAN was born in Sitamadhi, Bihar, in 1970, and is one of Hindi’s leading young writers, editors and journalists. He did his PhD on …

चर्चा में किताब, दिल के झरोखे से..., है कुछ खास...पहला पन्ना »

[18 Mar 2011 | 4 Comments | ]
ख़ामोशी के फ़न बीच रोशन क़तरों की तलाश

# त्रिपुरारि कुमार शर्मा
कहते हैं, ख़ामोश रहना भी एक फ़न है। कहना ग़लत न होगा कि रचनाकार इस फ़न में माहिर होता है। अपने एकांत के भीतर नई कायनात बसाता है। कभी सख़्त अंधेरे में रोशनी के कतरों की तलाश करता है। कभी जलते हुए चिराग़ों की ख़ातिर ज़िंदगी की दुआ मांगता है। कभी सांस की सूखी हुई सतह पर खुद ही डूब जाता है। कभी हवाओं को बड़ी हसरत से देखता है। कभी खुशबुओं के गुबार को तकता चला जाता है। जाने क्या-क्या करता है? मगर हां, जाते-जाते दुनिया …

चर्चा में किताब, दिल के झरोखे से... »

[19 Feb 2011 | Comments Off on फिर सुनें स्त्री-मन और जीवन की कहानियां | ]
फिर सुनें स्त्री-मन और जीवन की कहानियां

कथा में नई दृष्टि और भाषा गढ़ती हैं रीता सिन्हा
चूल्हे पर रखी पतीली में धीरे-धीरे गर्म होता और फिर उफनकर गिर जाता दूध देखा है कभी? ऐसा ही तो है स्त्री-मन। संवेदनाओं की गर्माहट कितनी देर में और किस कदर कटाक्ष-उपेक्षा की तपन-जलन में तब्दील हो जाएगी, पहले से इसका अंदाज़ा लगाना संभव होता, तो स्त्री-पुरुष संबंधों में आई तल्खी यूं, ऐसे ना होती, ना समाज का मौजूदा अविश्वसनीय रूप बन पाता। सच तो ये है कि स्त्री के चित्त-चाह-आह और नाराज़गी को शब्द कम ही मिले हैं। ज्यादातर …