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Articles in the स्मृति-शेष Category

यादें, स्मृति-शेष, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[4 Mar 2013 | Comments Off on यह संस्मरण नहीं, वे अब भी हैं साथ ही कहीं | ]
यह संस्मरण नहीं, वे अब भी हैं साथ ही कहीं

– चण्डीदत्त शुक्ल
मेरे शहर का नाम गोंडा है। धुंध, धूल, हंसी, उदासी, ठंड नारेबाज़ी और सरोकार – हर मौसम, हर एहसास, अपनी पूरी बुलंदी पर। सुना है – एक-दो मॉल खुल गए हैं – देखा नहीं। सोचता हूं – दिल्ली-बंबई की तरह वहां कार्ड से पेमेंट होता होगा, बैरे को टिप दी जाती होगी या फिर पुराने वक्त के हिसाब से बारगेनिंग, यानी `थोड़ा और कम करो’ की कवायद जारी होगी? खैर, बयान यहां गोंडा का करना नहीं था, ये सब बताने की गरज बस इतनी थी कि मेरा शहर …

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[30 Jan 2013 | Comments Off on किसी गांव सा था वो, शहर में गुज़र गया | ]
किसी गांव सा था वो, शहर में गुज़र गया

(पिछले दिनों गोंडा के वरिष्ठ पत्रकार केसी महंथ नहीं रहे। उन्हें दी गई आदरांजलि, समाचार 4 मीडिया.कॉम और भड़ास 4 मीडिया.कॉम पर प्रकाशित, वहीं से साभार)
– चण्डीदत्त शुक्ल
गूगल पर केसी महंथ के बारे में कुछ तलाश रहा हूं। यह जानते हुए कि कुछ नहीं मिलेगा। एक भी रिजल्ट नहीं। वैसे, ये बेहद बेशर्मी, आलस्य और अपनी जड़ों से कट जाने वाली हरकत है। पर क्य़ा कहूं। ऐसा ही है। हो सकता है, कल को ये दिन भी आए कि लोग अपने मां-बाप के बारे में भी गूगल पर इन्फो तलाशने …

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[9 Oct 2012 | Comments Off on Baat Nikalegi To Fir Door Talak Jayegi…. | ]
Baat Nikalegi To Fir Door Talak Jayegi….

Jagjit Singh, a journey till eternity….
– GARGI MISHRA
Yes, the talk went quite far and knocked the doors of almost every heart which has a passion for Ghazals and intellectual lyrics and even after a long journey of 35 years the talk is still in the air. The King of Ghazals Late Jagjit Singh tuned the strings of every heart through his melodious voice and his love for poetry. Ghazal Singer Jagjit Singh could touch the essence of love and its agony elegantly weaved into his music.
Jagjit Singh rooted the genre …

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[20 Jul 2012 | One Comment | ]
मैंने कहा – पंजा लड़ाओगे दारा सिंह!

दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित. कृपया प्रकाशन के लिए न उठाएं!
– चण्डीदत्त शुक्ल
chandidutt@gmail.com

सबसे बुरा होता है – भरोसे का टूट जाना। यकीन चाहे प्रेम पर हो या विश्वास हो इस बात का कि हमारी हिफाजत करने वाला कोई आसपास है। कल सुबह, जब यकायक पता चला कि दारा सिंह भी नहीं रहे तो दिल से हूक-सी उठी, `अरे पहलवान! आप भी चले गए?’ लगा, जैसे- हिंदुस्तान की ताकत ही चली गई। रामायण में `हनुमान’ का किरदार जीवंत बनाने वाले दारा सिंह अपनी ज़िंदगी में किसी संजीवनी बूटी की …

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[20 Jun 2012 | Comments Off on दान सिंह की धुनों से महकी ’गीतांजलि’ | ]
दान सिंह की धुनों से महकी ’गीतांजलि’

आकाशवाणी, मुंबई के मशहूर रेडियो जॉकी यूनुस खान ने बॉलीवुड के विख्यात संगीत निर्देशक दान सिंह के निधन के बाद एक प्रतिष्ठित अखबार में लिखा था, `यदि वरिष्ठ पत्रकार ईशमधु तलवार ने दान सिंह पर फिल्म न बनाई होती तो हम उन्हें आज चलते-फिरते-गाते हुए कैसे देखते?’
सचमुच, इसी फिल्म की बदौलत जयपुर में दान सिंह को लोगों ने गाते-मुस्कराते, अपने संघर्ष और पीड़ा को बांटते और सुर-ताल के साथ पतंग उड़ाते हुए देखा। अवसर था 18 जून को दान सिंह की पहली पुण्यतिथि का, जिस पर पिंकसिटी प्रेस क्लब में …