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Articles in the स्मृति-शेष Category

स्मृति-शेष, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[16 Apr 2015 | Comments Off on `बीते वो दिन याद आए रे!’ | ]
`बीते वो दिन याद आए रे!’

दैनिक भास्कर के रसरंग में प्रकाशित। कॉपीराइट प्रोटेक्टेड।
याद गली से : शमशाद बेगम
बरसों-बरस शोहरत की बुलंदी देखी, कई साल गुमनाम रहीं, लेकिन कुछ तो बात है कि अपने जमाने की मशहूर सिंगर शमशाद बेगम के गले की खनक कभी पुरानी नहीं पड़ी। 1919 में अप्रैल की 14 तारीख को अमृतसर में पैदा हुईं और साल 2013 में 23 अप्रैल को 94 साल की शमशाद बेगम ने पवई (मुंबई) स्थित घर से अलविदा कह दिया। इसी आवाज़ के साथ-साथ यादों की गली में चलते हैं दो-चार कदम :
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– चण्डीदत्त शुक्ल
एक दिन …

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[6 Dec 2014 | Comments Off on मैं अयोध्या हूं…। | ]
मैं अयोध्या हूं…।

– चण्डीदत्त शुक्ल
राजा राम की राजधानी अयोध्या…। यहीं राम के पिता दशरथ ने राज किया…यहीं पर सीता जी राजा जनक के घर से विदा होकर आईं। यहीं श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ। यहीं बहती है सरयू, लेकिन अब नदी की मस्ती भी कुछ बदल-सी गई है। कहां तो कल तक वो कल-कल कर बहती थी और आज, जैसे धारा भी सहमी-सहमी है…धीरे-धीरे बहती है। पता नहीं, किस कदर सरयू प्रदूषित हो गई है…कुछ तो कूड़े-कचरे से और उससे भी कहीं ज्यादा सियासत की गंदगी से। सच कहती हूं…आज से सत्रह साल …

यादें, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[3 Dec 2014 | Comments Off on पहिला इंजेक्शन तो `डीडीएलजे’ ही दिहिस… | ]
पहिला इंजेक्शन तो `डीडीएलजे’ ही दिहिस…

दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे की रिलीज को जल्द ही 1000 हफ्ते पूरे हो जाएंगे। एक मित्र ने याद दिलाया तो मोहल्ला लाइव पर छपा एक पुराना लेख चौराहा पर साझा कर रहे हैं।
– चण्डीदत्त शुक्ल
20 अक्टूबर, 1995… पक्का यही तारीख थी। याद इसलिए नहीं कि इस दिन डीडीएलजे देखी थी। भुलाइ इसलिए नहीं भूलती, क्योंकि इसी तारीख के ठीक पांच दिन बाद सलीम चच्चा ने पहली बार इतना ठोंका-पीटा-कूटा-धुना-पीसा था कि वो चोट अब भी सर्दी में ताज़ा हो जाती है। हुआ यूं कि सलीम चच्चा बीज के लिए …

यादें, संगीत-कला, साहित्य-सिनेमा-जीवन, स्मृति-शेष »

[29 Nov 2014 | Comments Off on मरुभूमि का राग – मांड | ]

– कोषा गुरुंग
झरनों के संगीत और नई फसल की खुशी, अपने आप उगे हुए फूलों की मादक सुगंध, पक्षियों का कलरव, पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ की सफेद चादर, बच्चों की किलकारियां, सरल हृदय युवतियों का प्यार, जातीय पर्व-त्योहार, यही तो है – लोक संगीत, जो हमें मानवीय संवेदनाओं से जोड़ता है और हमें अपने आप से रू-ब-रू कराता है।
अचानक पहाड़ के पीछे से दल के दल बादल निकल आते हैं और धूप की गर्मी खत्म हो जाती है। गांवों के लोग घरों से और खेतों से बाहर चले आते …

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[18 May 2013 | Comments Off on नवरंग # दैनिक भास्कर = सिगरेट फेंको और बताओ – एक्टिंग करोगे? | ]
नवरंग # दैनिक भास्कर =  सिगरेट फेंको और बताओ – एक्टिंग करोगे?

दैनिक भास्कर में प्रकाशित सामग्री. कॉपीराइट प्रोटेक्टेड…
बल्लीमारान से ग़ालिब और ग़ज़ल का गहरा ताल्लुक है पर कौन जानता है – यहां एक शख्स ऐसा भी जन्मा, जिसे देखकर लोग गालियां देने लगते थे। ये बात और है कि उस इंसान जैसा दयालु शायद ही ढूंढने से मिले। ये हैं हिंदी सिनेमा के सबसे ख़तरनाक विलेन और खूब दुलारे चरित्र अभिनेता प्राण। प्राण को दादा साहेब फाल्के एवार्ड दिए जाने की घोषणा की गई है। यह खबर सुनते ही प्राण के कितने ही किरदार आंखों के सामने घूमने लगे हैं। उनके …