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Articles in the संगीत-कला Category

दिल के झरोखे से..., संगीत-कला »

[8 Apr 2011 | 2 Comments | ]
पढ़ना-देखना एक कवि की पेंटिंग्स के शब्द

गुलाबी शहर के खूबसूरत और खूबसीरत कलाकार हैं अमित कल्ला। कवि भी हैं। बगैर दहेज के विवाह करने वाले साहसी अमित कल्ला की पेंटिंग्स और कविताओं में जीवन का जटिल पर ज़रूरी दर्शन छुपा है। शब्दों और रंगों का गठजोड़ संभवतः अंतर्मन की छटपटाहट, कौतूहल, आशा-निराशा, नाराज़गी और उत्साह का खुलासा कर सके। उनकी काव्य-रंग कृतियों को पेश करने का सौभाग्य चौराहा को मिला है, इसके लिए अमित का आभार भी : मॉडरेटर
 
किसका सगा

अपनी ही
बिछाई चौसर पर
बहुपाश में कसता
देख सकता हूँ
सन्नाटा
आखिर
किसका सगा है
अन्धकार
लगातार

लगातार
अपने साथ ले जाता
कैसा लचकीला
ज़ार – ज़ार बहुधा दिखाई देता
ताइरे – अर्श सा
सच
मोह लेता है
परिवास
जरणा जोगी बन
कागज़ के टुकड़े संग
गहरे समंदर की
यात्राओं पर निकल जाता
देखता
टकटकी लगा
उसी ध्रुव तारे को
बनाया जिसे
अपना ईश्वर
लगातार
ध्यान मग्न
कल
चले जाएंगे
धूनियों को छोड़
अस्थाई डेरे त्याग
प्रस्थान
गंतव्यों की ओर
शिप्रा
यथा ही बहेगी जब तक
महाकाल रहेंगे
ध्यान मग्न
कैसी दुविधा
कैसी दुविधा
बुदबुदाता
छूना चाहता है
बेआवाज़ ही रख देता
हर रंग, हर कहानी
कैसा
अकेला ही पाता
ऋत पर विजय
वैसे भी
किसे देखतीं
अन्दरुनी निगाहें
तह पर तह जमती जाती
सच
आग है निर्वसन
हाथ जोड़े , हिचकोले खाता
संगेमरमर पर
फिसलता है
यहाँ-वहाँ के खेलों के बीच
कभी छू लेता
आकाशीय चेतस वर्षा
अक्षीय बंध संग
कैसी दुविधा
पलक – पलक अगहरूप
आखिर कौन
लौटता  हैं वापस
उन धुरियों के बीच ,
दिखाई पड़ता जहाँ
अंतर्मन का कोलाहल
निहितार्थ ही
अधूरा नहीं
छोड़ देता
जुलाहा ,
मृत्युजेता पवन के
आस्वादन का
ताना-बाना ,
हर इक शब्द
उस
जागते अवधूत का
अविज्ञात
अध्याय हो जाता है
समानांतर ही
ठहरा समय
विराट वृक्ष की ओट ले
मलय राग गाता,
अर्धचंद्र ,
बसंत में डूबी देहर को
पंक्ति – पंक्ति मायारस
चखा
अनासक्त हो
जुगजुगाते तारे संग आँखे खोले
पलक – पलक
अगहरूप सा
बेखौफ़ ,
सीधे कदम रखने की
ज़हमत उठाता है
हिये का बैरी
अजन्मे
स्वप्न को छूकर
निरंतर लहर दर लहर
माटी के सिकोंरों में
बूढे सितारों संग
अकेला ही
तैरता हिये का बैरी
वह…
चमचमाता पुखराज !
कैसा
दीर्घकाल तक

आसुरी
आवरणों के बाहर दीर्घकाल तक
कुछ नया न जाने कैसे
विश्वसृष्टि का संवाद
अनझिप ज्योति की
निजता लिए
कल्पित रंगों के रसायन में
घुलमिल जाता
माप – माप कर
सहजवृत्त अमूर्तन की
अंतरदृष्टि
सविषयी तत्वों के
स्फुरण संग शाकम्बरी का
चेतन स्पर्श हो जाता है …

संगीत-कला, साहित्य-सिनेमा-जीवन, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[31 Mar 2011 | 4 Comments | ]
एक भटकता हुआ आत्म

कुछ लोग सचमुच `वर्सेटाइल’ होते हैं, महज कहने को ही नहीं। पंकज नारायण उनमें से एक हैं, उनका गद्य भी कविता की ख़ूबसूरती से सना-सजा होता है। पंकज फ़िल्मों से लेकर मंचों तक, पत्रकारिता से लेखन के अनगिनत विहानों तक विचरते हैं। मूलतः बिहार के रहने वाले हैं और फ़िलवक्त दिल्ली में जीवन-बसर, उन्हीं का लिखा हुआ कुछ चौराहा पर, पर इससे पहले भी बारी है उनके आत्मकथ्य की
याद नहीं, पहली बार कब अपने भीतर से ढिशुम-ढिशुम की आवाज़ आई कि तब से लड़ाई कभी थमी नहीं। रोज सोने से …

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[28 Mar 2011 | One Comment | ]
काशी कथा वाया मोहल्ला अस्सी

ज्यादा अरसा नहीं हुआ, जब चंद्रप्रकाश द्विवेदी की टीम काशी का अस्सी की शूटिंग के लिए बनारस में थी और उनके साथ मुंबई-दिल्ली के अलावा, राजस्थान से भी त्रिदेव पहुंचे हुए थे। रामकुमार सिंह उनमें शामिल थे। रामकुमार का परिचय देने के लिए ख़बरनवीस, फ़िल्म समीक्षक, साहित्यप्रेमी जैसे तमगे नाकाफ़ी हैं। सच मायने में, फ़िल्में उनके लिए हार्टबीट की तरह हैं। यही वज़ह है कि फ़िल्म भोभर में स्क्रिप्ट से लेकर गीत रचना तक उनकी कलम बोली है…मॉडरेटर
 
# रामकुमार सिंह
बनारस के घाटों की गोद में अलसायी सी लेटी गंगा को …

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[28 Mar 2011 | One Comment | ]
मोहब्बत की राहों में आके तो देखो

देवाशीष प्रसून युवा हैं। दरभंगा के हैं, जयपुर में रहकर लेखन में सक्रिय। प्रखर सोचते-समझते-बोलते-लिखते हैं। पत्रकारिता की पढ़ाई की। समाज,  संबंधों और जीवन पर उनकी खुली नज़र है। प्रेम जैसे नाज़ुक और बहु-प्रशंसनीय, महत्व के विषय पर खूब-खूब समझदारी और उतनी ही तल्लीनता से लिखा गया उनका ये आलेख नज़रें खोलने वाला है। प्रसून की ये कृति चौराहा के पाठकों के लिए

कुछ बातें
किताबों को पढ़कर
नहीं समझी जा सकती।
पनियाई आँखों में दुःख हरदम नहीं है
अपने प्रियतम से विछोह की वेदना।
फिर भी, हृदय में उठती हर हूक से
न जाने, संवेदनाओं के …

चर्चा में किताब, संगीत-कला, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[27 Mar 2011 | 10 Comments | ]
कहानी / दूसरा जीवन

प्रभात रंजन। एकेडेमिक्स के साथ लिट्रेचर में भी उल्लेखनीय दखल। परिचय लिखते समय इतना अंग्रेजियाना इसलिए हो रहा हूं, क्योंकि उनका फॉर्मल इंट्रोडक्शन प्रतिलिपि बुक्स की वेबसाइट से उड़ाया है। हाल में ही प्रभात रंजन का नया कहानी संग्रह बोलेरो क्लास आया है। इसी संग्रह से उनकी एक कहानी यहां चौराहा के पाठकों के लिए, बरास्ता त्रिपुरारि कुमार शर्मा, और अब उधार मांगा गया परिचय…PRABHAT RANJAN was born in Sitamadhi, Bihar, in 1970, and is one of Hindi’s leading young writers, editors and journalists. He did his PhD on …