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Articles in the यादें Category

यादें, स्मृति-शेष, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[20 Jul 2012 | One Comment | ]
मैंने कहा – पंजा लड़ाओगे दारा सिंह!

दैनिक भास्कर के संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित. कृपया प्रकाशन के लिए न उठाएं!
– चण्डीदत्त शुक्ल
chandidutt@gmail.com

सबसे बुरा होता है – भरोसे का टूट जाना। यकीन चाहे प्रेम पर हो या विश्वास हो इस बात का कि हमारी हिफाजत करने वाला कोई आसपास है। कल सुबह, जब यकायक पता चला कि दारा सिंह भी नहीं रहे तो दिल से हूक-सी उठी, `अरे पहलवान! आप भी चले गए?’ लगा, जैसे- हिंदुस्तान की ताकत ही चली गई। रामायण में `हनुमान’ का किरदार जीवंत बनाने वाले दारा सिंह अपनी ज़िंदगी में किसी संजीवनी बूटी की …

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[20 Jun 2012 | Comments Off on दान सिंह की धुनों से महकी ’गीतांजलि’ | ]
दान सिंह की धुनों से महकी ’गीतांजलि’

आकाशवाणी, मुंबई के मशहूर रेडियो जॉकी यूनुस खान ने बॉलीवुड के विख्यात संगीत निर्देशक दान सिंह के निधन के बाद एक प्रतिष्ठित अखबार में लिखा था, `यदि वरिष्ठ पत्रकार ईशमधु तलवार ने दान सिंह पर फिल्म न बनाई होती तो हम उन्हें आज चलते-फिरते-गाते हुए कैसे देखते?’
सचमुच, इसी फिल्म की बदौलत जयपुर में दान सिंह को लोगों ने गाते-मुस्कराते, अपने संघर्ष और पीड़ा को बांटते और सुर-ताल के साथ पतंग उड़ाते हुए देखा। अवसर था 18 जून को दान सिंह की पहली पुण्यतिथि का, जिस पर पिंकसिटी प्रेस क्लब में …

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[28 Apr 2012 | Comments Off on कहानी / दफन नदी | ]
कहानी / दफन नदी

कथा के बारे में – ये एक कहानी है, पर महज कहानी नहीं। बचपन में बिछड़े दो दिलों की, दो मुल्कों की, यादों के एक बक्से की सच्ची दास्तां है। कहानी से एक अंश – इरशाद का कहना था कि यहां खुदाई की जाए तो जमीन के नीचे सोया हुआ पूरा एक शहर निकल सकता है। इसके लिए वे जूझ रहे हैं। पुरानी यादों को जगाना चाहते हैं। मुझे लगा मैं भी पाकिस्तान में अपनी पुरानी यादों को जगाने आया हूं, जहां की धरती से मेरे पापा जी और चाई …

दिल के झरोखे से..., यादें, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[23 Apr 2012 | One Comment | ]
मौन के शब्दकोश में हैं करोड़ों अनपढ़े पन्ने…

– चण्डीदत्त शुक्ल
उस भीगी दोपहर में
तुम्हारे भीगे हुए लफ्ज
और
मेरी सुलगी हुई कुछ सांसें
यूं ही नहीं उठा था धुआं।
रातरानी के आंचल से झांकता था चांद
लजाई हुई गौरेया दुबकी पड़ी थी शाख से सटकर
ऐसे ही थोड़े कुल्फी सी घुलती जा रही है रात
क़तरा-क़तरा घुलती है
ज़र्रा-ज़र्रा मिलती है
जिस्म से दिल तक,
बस एक सीलन है
उस पर बेअसर है याद का डिस्टेंपर।
ये सब पढ़कर
जब शब्दों में तुम हंसती हो
और अदृश्य रहते हैं तुम्हारे शरबती होंठ
कंचे जैसी कांपती आंखें
और तीखे धनुष की टंकार की तरह मिट्ठू नाक
तब,
यह तकनीक भी दुश्मन की तरह मिलती है।
फेसबुक के चैट …

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[23 Mar 2012 | Comments Off on पंख होते तो उड़ जाती रे # अहमदाबाद | ]
पंख होते तो उड़ जाती रे # अहमदाबाद

– कोषा गुरंग
ज़ेहन में जब यादों के दरीचे खुलते हैं, ख्यालों में एक पुराने शहर की तस्वीर उभर आती है। वो शहर, कोई अनजाना-भूला-बिसरा-शहर नहीं, वहां की इमारतें-रास्ते मेरे लिए अपरिचित़, अचीन्हे नहीं। मेरा शहर अहमदाबाद।इस शहर में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का स्वागत मुस्लिम किया करते, वहीं हिंदू मोहर्रम में ताजियों की रखवाली करते। यूं ही एक-दूसरे के त्योहार और सुख-दुख आपस में बांटते। कुछ मुस्लिम सहेलियां थी, जिनके साथ स्कूल आना-जाना होता था। इतना ही नहीं, परिवार वालों का एक-दूसरे पर उतना ही विश्वास था। न जाने …