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Articles in the खेल-तमाशा Category

खेल-तमाशा, स्मृति-शेष, है कुछ खास...पहला पन्ना »

[18 May 2013 | Comments Off on नवरंग # दैनिक भास्कर = सिगरेट फेंको और बताओ – एक्टिंग करोगे? | ]
नवरंग # दैनिक भास्कर =  सिगरेट फेंको और बताओ – एक्टिंग करोगे?

दैनिक भास्कर में प्रकाशित सामग्री. कॉपीराइट प्रोटेक्टेड…
बल्लीमारान से ग़ालिब और ग़ज़ल का गहरा ताल्लुक है पर कौन जानता है – यहां एक शख्स ऐसा भी जन्मा, जिसे देखकर लोग गालियां देने लगते थे। ये बात और है कि उस इंसान जैसा दयालु शायद ही ढूंढने से मिले। ये हैं हिंदी सिनेमा के सबसे ख़तरनाक विलेन और खूब दुलारे चरित्र अभिनेता प्राण। प्राण को दादा साहेब फाल्के एवार्ड दिए जाने की घोषणा की गई है। यह खबर सुनते ही प्राण के कितने ही किरदार आंखों के सामने घूमने लगे हैं। उनके …

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[16 Jan 2013 | Comments Off on न ख़बर हैं, न गब्बर (विलेन) हैं, शायर हैं निदा फाजली! | ]
न ख़बर हैं, न गब्बर (विलेन) हैं, शायर हैं निदा फाजली!

बेबाक : खंजर ना बने खबर
– दुष्‍यंत
निदा फाजली को जिस दिन देश का बडा स्‍तम्‍भकार हमारे समय का कबीर बता रहा था, उसके अगले दिन इंटरनेट और टीवी पर एक विवादास्‍पद बयान के लिए उन्‍ही निदा को खबर बनाया जा रहा था। कबीर को भी उनके समय में कम ही लोगों ने समझा था, तो क्‍या निदा को भी कम ही लोग समझते हैं।
‘पाखी’ दिल्‍ली से प्रकाशित चर्चित मासिक साहित्यिक पत्रिका है, प्रेम भारद्वाज उसके संपादक है, पिछले सालों में कई शानदार अंकों के जरिए उन्‍होंने ‘पाखी’ की पहचान खडी …

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[20 Apr 2011 | 2 Comments | ]
नील शेखर हाडा के कुछ नए कार्टून

नील शेखर हाडा युवा हैं। राजनीति समेत देश-दुनिया के मुद्दों पर तीखी नज़र रखते हैं। इन दिनों जयपुर के एक अखबार में कार्टूनिस्ट हैं। समसामयिक मुद्दों पर उनके ब्रश-स्ट्रोक्स अनोखे होते हैं। शेखर की कार्टून कृतियां चौराहा पर पहले भी देखी गई हैं। कई दिन के अंतराल के बाद, आज फिर शेखर के कुछ ताज़ा कार्टून पेश हैं : मॉडरेटर
 

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[15 Apr 2011 | Comments Off on कुछ लम्हों के लिए रौशन जहां की ख्वाहिश… | ]

– – दीप्ति शर्मा
 
रौशन  जहां  की ही ख्वाहिश की है

मैंने अपने दिल की झूठे  बाज़ार  में

सच्चाई के  साथ आजमाइश की है |

 

मालूम है बस फरेब है यहां तो

फिर क्यों मैंने सपन भर आँखों में

अपने उसूलों की नुमाइश की है |

 

जब मेरी जिन्दगी मेरी नहीं तो क्यों?

ख्वाब ले जीने की गुंजाइश की है |

 

कुछ जज्बात हैं मेरे इस दिल के

उनको समझ खुदा से मैंने बस

कुछ खुशियों की फरमाइश की है |

 

मैनें तो बस कुछ लम्हों के लिए

रौशन जहाँ की ख्वाहिश की है |

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[8 Apr 2011 | Comments Off on वक्रदृष्टि : अन्ना ये तो खाते ही जा रहे हैं | ]
वक्रदृष्टि :  अन्ना ये तो खाते ही जा रहे हैं

नील शेखर हाडा का नया कार्टून…